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‘अर्थ में छिपा है अनर्थ’ जैसे 5 कारण जो गंगा को साफ नहीं होने देते

-द प्रिंट,

गंगा की अविरलता और निर्मलता का मुद्दा, गगनभेदी नारों, दावों और वादों में उलझ कर रह गया है. सच के लगातार निर्माण के बावजूद गंगा साफ नहीं हो पा रही. हम यहां उन कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जो गंगा को बहने नहीं देते.

1- क्योंकि अर्थ में छिपा है अनर्थ– जब आप गंगा के लिए ‘अर्थ गंगा’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो इसका सीधा मतलब होता आप गंगा का अर्थ नहीं समझते. गंगा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर 40 करोड़ लोगों की जीविका को प्रभावित करती है लेकिन उसे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में कहीं भी अर्थ गंगा के तौर पर पारिभाषित नहीं किया गया है. ‘अर्थ गंगा’ कहने का एक तात्पर्य यह भी है कि गंगा के बेटों ने उसके अध्यात्मिक स्वरूप की स्वर्ग वापसी को तय मान लिया है और अब उसे रेवेन्यू की दृष्टि से ही देखा जा रहा है. वाटर वेज, डाल्फिन पर्यटन, ब्लू रेवोल्यूशन ऐसे तमाम वादे यह साफ संकेत करते हैं कि सरकार का ध्यान अब गंगा से पैसे कमाने पर है न कि उसका प्राचीन स्वरूप लौटाने पर.

सीपीसीबी यानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वाटर क्वालिटी पैमाने में फंसी सरकार गंगा के गंगत्व को जानना और समझना ही नहीं चाहती. यह स्वीकार करना उसके लिए मुश्किल है कि गंगत्व का मतलब ‘साफ पानी’ नहीं होता. सरकार और वैज्ञानिक गंगत्व को ‘तत्व’ के तौर पर तो मानते हैं लेकिन इसे किसी कानून का हिस्सा नहीं बना सकते. क्योंकि गंगत्व को पाने या बचाने की कोशिश का मतलब है गंगा के साथ पवित्र व्यवहार सुनिश्चित करना यानी उससे राजस्व उगाहने का विचार छोड़ना. यही कारण कि प्रशासनिक मशीनरी गंगा की व्यावहारिक परिभाषा पर जोर देती है. इस व्यावहारिक सरकारी परिभाषा में गंगा के अर्थ का मतलब बैक्टेरियोफाज, औषिधीय गुण, नैसर्गिक प्रवाह और इकोलॉजी नहीं है, उनके अनुसार गंगा के अर्थ का मतलब होता है गंगा का अर्थशास्त्र. इस अर्थशास्त्र में इस वैज्ञानिक तथ्य को दरकिनार कर दिया जाता है कि टिहरी के बाद भागीरथी में मात्र 10 फीसद ही बैक्टेरियोफाज बचता है. भूगोल की किताबों में बच्चों को यह पढ़ाया जा सकता है कि गंगा की कुल लंबाई 2525 किलोमीटर है लेकिन इस तथ्य का कोई मतलब नहीं कि गंगा का नैसर्गिक प्रवाह मात्र 80 किलोमीटर ही बचा है. इसे बचाने के लिए इको सेंसटिव जोन का दायरा बढ़ाना होगा जो कि अर्थशास्त्र के आड़े आएगा.

2- क्योंकि नदी डाटा आपके चश्में पर निर्भर करता है- सीपीसीबी कहता है कि उत्तराखंड में 18 बड़े नाले गंगा में सीधे गिरते हैं जबकि नमामि गंगे का मानना है कि इन नालों की संख्या 141 है. सिर्फ हरिद्वार की गंगा में ही 22 नाले गिरते हैं पर सीपीसीबी मानता है कि हरिद्वार में सिर्फ तीन बड़े नाले गंगा में गिरते हैं. अब इस गणित को समझिए, जब सीपीसीबी बड़े यानी मेजर नालों की बात करता है तो इसे स्पष्ट नहीं करता कि बड़ा माने कितना बड़ा. वहीं नमामि गंगे गंगा में गिरने वाले हर छोटे-बड़े नाले को भी गिनता है. यह भी समस्या है कि इस गिनती में प्राकृतिक झरने और गदेड़ भी आ जाते हैं. सीपीसीबी अपनी गिनती में कैनाल को नहीं रखता यानी हर की पौड़ी उसकी नजर में गंगा नहीं है इसलिए वह हर की पौड़ी में गिरने वाले नालों की गिनती नहीं करता. यह अलग बात कि हरिद्वार में आस्था का स्नान इसी जगह यानी अपर गंगा कैनाल में ही होता है. चूंकि सीपीसीबी नालों पर नजर रखने वाली मुख्य संस्था है, उसके डाटा को ही मुख्य माना जाता है और नालों के टैपिंग जैसी जरूरी कोशिशें सफल नहीं हो पाती.

इसके अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण बात नमामि गंगे को समझनी चाहिए वह यह कि नाले का मतलब विलेन नहीं होता खासकर उत्तराखंड में. मात्र दो दशक पहले तक नाले को नदी के साथ जोड़कर बोला जाता था, नदी-नाले. जब नाले में शहरी सीवेज सिस्टम को जोड़ दिया तो नाले देखते ही देखते नेगेटिव हो गए. पहाड़ी इलाकों में शहरी नालों और हिमालयी नालों को पहचाने जाने की जरूरत है.

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