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कैसे पंचवर्षीय योजनाओं ने हिंदुस्तान की आर्थिक बुनियाद को टेढ़ा कर दिया

-सत्याग्रह,

अब तक हमने जाना कि कैसे आजादी के बाद 1948 में राज्यों का एकीकरण हुआ - हैदराबाद, जूनागढ़ की ना-नुकर और कश्मीर का एक लड़ाई और कुछ शर्तों के साथ हिंदुस्तान में विलय. 1949 में आरबीआई का राष्ट्रीयकरण हुआ और 1950 में देश अपने नये संविधान के साथ गणतंत्र बना. देखा जाए तो इसके साथ देश का भौगोलिक और संवैधानिक ढांचा बनकर तैयार हो गया था. अब बारी थी आर्थिक नीतियों के बनने और उनके क्रियान्वयन की. इसकी ज़िम्मेदारी थी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की.

नेहरु स्वप्नदृष्टा और फेबियन यानी ऐसे समाजवाद के हामी थे जो धीरे-धीरे लोकतांत्रिक तरीकों से समाज में समानता लाने की बात करता है. गांधी के स्वराज और विकास के मॉडल से उनका भावनात्मक जुडाव तो था, पर शायद उनमें यकीन उतना नहीं था. अंग्रेजों द्वारा खोखले कर दिए गये देश के आर्थिक पहिये को घुमाने के लिए उन्हें कुछ अलग और बड़ा करना था.

नेहरु रूस के तानाशाह जोसफ स्तालिन को तो नापसंद करते थे पर उनके आर्थिक मॉडल की कुछ चीजें उन्हें समझ में आती थीं. स्तालिन के आर्थिक मॉडल में सरकार उत्पादन से लेकर विपणन तक हर कदम पर ज़िम्मेदार थी. आर्थिक विकास निजी लोगों के हाथों में नहीं दिया जा सकता था. स्तालिन ने रूस में पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं. नेहरु ने भी यही मॉडल हिंदुस्तान के लिए इख़्तियार किया.

साल 1951 में हिंदुस्तान में पहली पंचवर्षीय योजना लागू की गयी. इसे लागू करने में काफी मशक्कत की गयी थी जो कुछ-कुछ ‘सब दिन चले अढ़ाई कोस’ जैसी साबित हुई. आइये देखते हैं कैसे! इसे और पंचवर्षीय योजानाओं को समझने के लिए हम शुरुआत की दो योजनाओं को देखेंगे - 1951-1956 और 1956-1961.

नेशनल प्लानिंग कमेटी का गठन और बॉम्बे प्लान

1938 में कांग्रेस पार्टी ने नेशनल प्लानिंग कमेटी(एनपीसी) का गठन किया था जिसे आज़ाद हिंदुस्तान की आर्थिक प्लानिंग का ढांचा तैयार करने का ज़िम्मा दिया गया था इसके पहले अध्यक्ष एम विस्वेसरैया थे और दूसरे खुद जवाहरलाल नेहरू. यह कमेटी पूरी तरह से तो कोई रिपोर्ट नहीं बना सकी लेकिन आजादी के तुरंत बाद इसके कुछ विचार जरूर देश के सामने आये.

भारत की आर्थिक नीति को लेकर एनपीसी की सोच यह थी कि देश में रूस जैसे देशों का मॉडल लागू किया जाए. वहां औद्योगीकरण देर से शुरू हुआ था और सरकार की भागीदारी इंजन बनकर विकास की रेलगाड़ी खींच रही है. साफ सी बात है कि कमेटी का अध्यक्ष होने के नाते कमोबेश यही सोच नेहरू की भी थी.

ये बड़े ताज्जुब की बात है कि देश के जाने-माने उद्योगपति जैसे घनश्याम दास बिरला, जेआरडी टाटा, लाला श्रीराम सरीखे लोग भी नेहरु के इस केंद्रीय प्लानिंग के विचार से सहमत थे. इन सबने मिलकर भी 1944 में एक ‘बॉम्बे प्लान’ नेहरु को पेश किया. इसके तहत 15 सालों में देश की आय को तिगुना और इसकी प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करने का लक्ष्य था.

पहली पंचवर्षीय योजना का मंज़ूर होना

15 मार्च 1950 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में देश में योजना आयोग का गठन हुआ और 1951 की गर्मियों में इसने देश को पहली पंचवर्षीय योजना सौंपी. इसमें कृषि को सबसे ज़्यादा महत्व दिया गया. रामचन्द्र गुहा, ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि चूंकि विभाजन से उपजे हालातों की वजह से कृषि उत्पादन पर सबसे ज़्यादा असर हुआ था, इसलिए पहली योजना में इस पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की बात कही गयी. इसके अलावा इसमें ट्रांसपोर्ट व्यवस्था, संचार और सामाजिक सेवाओं के विस्तार की बात भी थी.

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