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आवरण कथाः कहीं डूब न जाए पूरा वित्तीय तंत्र

-इंडिया टूडे,

लगातार देश का बैंकिंग क्षेत्र अमूमन बुरी खबरों से ही सुर्खियों में उछला रहता है. वजहें: डूबत कर्ज (जिसे बैंकों की शब्दावली में गैर-निष्पादित संपत्तियां या एनपीए कहा जाता है) के बढ़ते अंबार से लेकर निपट धोखाधड़ी, क्रोनी कैपिटलिज्म और न जाने क्या-क्या. यह बीमारी तेजी से फैलती जा रही है, जिसमें छोटे-बड़े और कुछ नामधारी बैंक भी हैं. तो, यह सड़न सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तक सीमित नहीं रह गई है. पंजाब नेशनल बैंक और पंजाब तथा महाराष्ट्र सहकारी बैंक (पीएमसी बैंक) जैसे सरकारी बैंकों ने अपने नाम धुमिल किए तो येस बैंक और आइसीआइसीआइ जैसे निजी क्षेत्र के बैंक भी बुरी वजहों से सुर्खियों में आए.

संदिग्ध नाम वाले बैंकों की फेहरिस्त लंबी है, जिसमें ताजातरीन मिसाल लक्ष्मी विकास बैंक (एलवी बैंक) है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) को उबारना पड़ा. कोविड-19 महामारी ने इस संकट को और घना किया. सितंबर में खत्म हुआ ब्याज पर मोरेटोरियम और सरकारी गारंटी के कर्ज से एनपीए ढेर बेहिसाब बढ़ जाने का खतरा है, जो पहले ही विकराल है (जून 2019 में यह 9.4 लाख करोड़ रु. हो चुका था, यानी देश के स्वास्थ्य बजट का तकरीबन चार गुना). इससे बैंकिंग व्यवस्था में पूंजी का अप्रत्याशित संकट खड़ा हो गया है.

इस संकट से सरकार या केंद्रीय बैंक न अनजान है, न आंखें चुराई गई हैं. लेकिन कई विशेषज्ञों को आशंका है कि प्रस्तावित समाधान मौजूदा संकट से भी बुरे हैं. आरबीआइ के एक अंदरूनी कार्यकारी समूह बैंकिंग नियमन कानून, 1949 में संशोधन का सुझाव दिया है, ताकि बड़े कॉर्पोरेट घराने बैंकों के प्रमोटर बन सकें. मोटे तौर पर इसके पैरोकारों की दलील है कि यही बैंकिंग व्यवस्था में पूंजी डालने का तरीका है और शायद देश में वृद्धि की आकांक्षाओं को पूरा करने का इकलौता तरीका है.

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