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बाढ़ के बाद खाद की कमी और कालाबाज़ारी से जूझते बिहार के किसान

-इंडियास्पेंड,

पौल के बीरपुर प्रखंड में सरकार के विरोध में प्रदर्शन करते किसान। फोटो: अमित चौधरी"धान का सीजन बाढ़ खा गया, अब डीएपी के लिए बाप-बाप कर रहे है। सिर्फ एक दिन गांव में पैक्स वाले के पास डीएपी आया था। भोर में (सुबह) 3.00 बजे से लाइन में लग गए, बावजूद इसके डीएपी और यूरिया नहीं मिला," बिहार के सहरसा जिले के बलवा गांव के सत्तन पासवान अपनी खेती की समस्याओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं।

प्रदेश के बाढ़ से प्रभावित जिलों जैसे सुपौल और सहरसा में बांध के भीतर के गाँवों के किसान खरीफ सीजन में बाढ़ और बेमौसम बारिश से नुकसान झेलने के बाद अब डीएपी की किल्लत से भारी मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। जब देश के अधिकांश राज्यों में रबी की फसल की बुआई का ज्यादातर वक्त निकल चुका है तब भी बिहार में किसानों को खाद की आपूर्ति की राह देखना पड़ रहा है। ऐसे में कई किसानों को अपनी फसलों की बुआई के लिए ब्लैक में महंगे दामों पर खाद खरीदनी पड़ रही है।

"कुछ लोग इधर-उधर से मंगाता तो है, लेकिन उसे महंगे दाम में बेच देता है। भागदौड़ के बाद भी हम किसानों को डीएपी और यूरिया के बगैर खाली हाथ लौटना पड़ता है," पासवान आगे कहते हैं।

बिहार में इफको की यूरिया और डीएपी का वितरण पैक्स (प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटी) करती है।

सुपौल जिले के मरौना गाँव के 66 वर्षीय किसान हरिशंकर मंडल कहते हैं, ''बीते 2 दिसंबर को मैंने दो बोरी डीएपी खाद काला बाजारियों से ₹1550 प्रति बोरी की दर से खरीदा, जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धार
त अधिकतम खुदरा मूल्य
 (एमआरपी) से ₹350 रुपए प्रति बोरी ज्यादा है।"

मंडल का गांव बिहार की राजधानी पटना से करीब 250 किलोमीटर दूर है जहां मंडल को अपनी करीब 60 कट्ठा (22 कट्ठा का एक एकड़) जमीन पर गेहूं की खेती के लिए औसतन तीन बोरी डीएपी की जरूरत होती है। मतलब, सिर्फ डीएपी के लिए ही उन्हें ₹1200 से ₹1300 अतिरिक्त देने पड़ते हैं।

मंडल की तरह बिहार के लाखों किसान एमआरपी से अधिक कीमत देकर यूरिया, डीएपी और पोटाश खरीद रहे हैं। सहरसा जिले की डगमारा पंचायत के अनिल मिश्र की मानें तो पूरे गांव में चार से पांच व्यापारी यूरिया का व्यापार करते हैं। लगभग दो महीनों से किसी के पास कोई खाद उपलब्ध नहीं है। अगर कोई व्यापारी डीएपी मंगवाता भी है तो वह दुकान पर रखने के बजाय उसे ब्लैक में बेच देता है। काला बाजारियों की वजह से यूरिया, डीएपी, पोटाश जैसी खादों के संकट की यह कहानी उस राज्य की है जो नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सबसे गरीब राज्यों में शामिल है।

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