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सरकार को एहसास हो रहा है कि केन-बेतवा जोड़ना एक गलत कदम है, लेकिन अब पीछे नहीं हटा जा सकता

-द प्रिंट,

पर्यावरण मंत्रालय के एक एक्सपर्ट ग्रुप ने केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले एक अहम बांध को पर्यावरणीय मंजूरी देने से मना कर दिया. यह बांध मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले के डिंडौनी में बनाया जाना प्रस्तावित था. इस मनाही का तात्कालिक और तकनीकी कारण यह है कि पर्यावरणीय मंजूरी के लिए उपयोग किए जाने वाला डाटा डेढ़ साल से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए और इसलिए दोबारा जन सुनवाई की जरूरत बताई गई है ताकि पता चल सके की स्थिति क्या है. जन सुनवाई परियोजना प्रभावित गांव वालों के लिए एक मौका है.

लेकिन, इस नामंजूरी की जद में पिछले साल सीईसी यानी केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की सिफारिशें हैं, जिसने तमाम सरकारी दवाबों के बाद भी इस परियोजना पर गंभीर प्रश्न खड़े किए.

इसके अलावा कुछ खामोश सवाल हैं जो इस परियोजना की सीटूसी यानी कॉस्ट कंट्री का अंदाज लगा रहे हैं.

पहले कुछ साधारण तथ्य जान लीजिए. भारत की पहली नदी जोड़ों परियोजना से जुड़ने वाली नदियां केन और बेतवा मध्य प्रदेश से निकलती है. केन जबलपुर के पास से निकलकर पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के बीच से बहती हुई बांदा के पास यमुना में मिल जाती है. बेतवा होशंगाबाद के पास से निकलती है और ओरछा से होती हुई हमीरपुर के पास यमुना में मिल जाती है. दोनों ही नदियां अंतिम रूप से यमुना के माध्यम से गंगा में मिलती हैं. इसमें चंबल को भी शामिल कर लीजिए. प्रयागराज के महासंगम में गंगा को मध्य प्रदेश की इन्ही नदियों से पानी मिलता है. इसका एक मतलब यह भी है कि वाराणसी की गंगा में चंबल, केन और बेतवा का पानी ही होता है. तो मध्य प्रदेश से बहने वाली इन दोनों नदियों का फ्लोरा-फोना और व्यवहार एक ही है, यानी जब गर्मियों में नदियां सूखती है तो दोनों ही नदियों में पानी कम हो जाता है और जब बरसात में नदियां उफनती है तो दोनों ही नदियों में बाढ़ आ जाती है. दोनों का कैचमेंट एरिया 90 सेंटीमीटर वर्षाजल वाला है.

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