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बिहार चुनाव 2020 : लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति का राजद पर पड़ेगा असर? चुनौतियों के आगे तेजस्वी कितने सक्षम?

-कारवां,

1990 के दशक के चारा घोटाला से जुड़े मामले में रांची की बिरसा मुंडा केंद्रीय जेल में सजा काट रहे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने पिछले साल 10 अप्रैल को, लोकसभा चुनाव के दौरान, बिहार के मतदाताओं को संबोधित करते हुए पत्र लिखा था. उस पत्र में, अन्य बातों के अलावा, उन्होंने पूछा था कि “क्या विध्वंसकारी शक्तियां मुझे कैद कराके बिहार में किसी षड़यंत्र की पठकथा लिखने में सफल हो पाएंगी?”

दरअसल, हाई कोर्ट से जमानत याचिका खारिज हो जाने के बाद यादव ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका डाली थी लेकिन 9 अप्रैल 2019 को सर्वोच्च अदालत ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी थी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जेल से बाहर आकर अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने की यादव की संभावना समाप्त हो गई थी और 1977 के बाद पहली बार यादव किसी चुनाव से प्रत्यक्ष रूप से दूर कर दिए गए थे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दूसरे दिन लिखे उस पत्र में यादव ने घोषणा की थी, “मैं कैद में हूं, मेरे विचार नहीं. 44 वर्षों में यह पहला चुनाव है जिसमें मैं आपके बीच नहीं हूं. इस चुनाव में सबकुछ दांव पर है.” 

करीब डेढ़ साल बाद एक बार फिर वैसा ही दृश्य इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में दिखाई देने जा रहा है. पिछले साल की मानिंद यादव की रिहाई विधानसभा चुनाव तक होती नहीं दिख रही है. बिहार विधानसभा चुनाव तीन चरणों (28 अक्टूबर, 3 नवंबर, 7 नवंबर) में होने वाले हैं. यादव के वकील प्रभात कुमार ने मुझे बताया, “लालू जी बिहार चुनाव तक बाहर नहीं आएंगे. किसी हालत में नहीं आएंगे. दुमका कोषागार मामले में जमानत याचिका रांची हाई कोर्ट में पिछले हफ्ते दायर की गई है. अभी सुनवाई की कोई तारीख नहीं मिली है. हाई कोर्ट दुर्गा पूजा के लिए 2 नवंबर तक बंद है. इसके बाद ही सुनवाई की कोई तारीख मिलेगी. जमानत मिलने के बाद भी जेल से बाहर आने में तीन-चार दिन लगते हैं.”

लेकिन क्या इस बार भी यादव के बिना चुनाव लड़ रही उनकी पार्टी के लिए नतीजे पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों से अलग होगें, जिसमें राजद अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी? यह जानने के लिए मैंने बिहार के वरिष्ठ पत्रकारों, राजद और अन्य दलों के नेताओं और जानकारों से बात की. मैंने उनसे राजद के नेता और यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर भी बात की जिन्हें महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताया जा रहा है.

बिहार और लालू प्रसाद यादव की राजनीति पर नजदीक से नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने मुझसे कहा, “यह संभव है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में यादव की गैर-मौजूदगी का असर चुनाव परिणाम पर पड़ा हो और अगर आगामी विधानसभा चुनाव में भी वह हाजिर नहीं रहते हैं तो स्वभाविक है कि फिर असर पड़ेगा.”

बिहार चुनाव में यादव के महत्व पर उन्होंने मुझे बताया, “यादव की अपनी एक शैली है. जब वह क्षेत्र में होते हैं, लोगों के बीच होते हैं, तो जाहिर है कि प्रभाव ज्यादा होता है. जनाधार पर उनका असर है. जब वह नहीं रहेंगे या ओझल रहेंगे तो उसका विपरीत असर पड़ेगा. यह स्वभाविक है.”

ठाकुर ने बताया, “अभी भी यादव के बिना राजद कुछ भी नहीं है. जब तक यादव हैं, चाहे जेल में हों या बाहर, उनसे ही पार्टी का नाम है और वही पार्टी का आधार हैं.” यादव की राजनीतिक विरासत संभाल रहे उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव क्या उनकी भरपाई करने में सक्षम हैं? इस प्रश्न के जवाब में ठाकुर ने कहा, “उनकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा. लेकिन उन्हें आधार बनाकर ही तेजस्वी आगे बढ़ना चाह रहे हैं.” ठाकुर ने यह भी बताया कि यादव चुनाव मैदान में जाएं या न जाएं, इसका उनके मुस्लिम-यादव बुनियादी आधार पर असर नहीं पड़ेगा.”

यादव चारा घोटाला के तीन अलग-अलग मामलों में सजायाफ्ता हैं जबकि एक मामले में सुनवाई चल रही है. वह 23 सितंबर 2017 से बिरसा मुंडा केंद्रीय कारावास में सजा काट रहे हैं. लेकिन मधुमेह, गुर्दा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग समेत 11 अन्य बिमारियों के कारण पिछले ढाई साल से जेल मैनुअल के नियमों के तहत रांची राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) में इलाजरत हैं. इस दौरान उन्हें इलाज के लिए 12 मई 2018 को छह सप्ताह के लिए जमानत भी मिली थी.

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