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फरवरी-मार्च में कोविड-19 संक्रमण के मामलों में हो रही थी वृद्धि लेकिन टास्कफोर्स ने नहीं की बैठक

-कारवां,

भले ही भारत महामारी की सबसे बुरी मार झेल रहा है लेकिन कोविड-19 के लिए बनाए गए राष्ट्रीय वैज्ञानिक कार्यबल या टास्कफोर्स ने फरवरी और मार्च में एक भी बैठक नहीं की. टास्कफोर्स का काम महामारी की रोकथाम के प्रयासों पर केंद्र सरकार को सलाह देना है. राष्ट्रीय वैज्ञानिक टास्कफोर्स के दो सदस्यों, जो देश के प्रमुख वैज्ञानिकों में से हैं, और इसी टास्कफोर्स की उप समिति के एक सदस्य ने पुष्टि की है कि अप्रैल में स्थिति इस कदर विस्फोटक हो जाने से दो महीने पहले तक उनकी एक भी बैठक नहीं हुई. उन्होंने कहा कि इस साल टास्कफोर्स की बैठक 11 जनवरी को हुई थी और फिर 15 अप्रैल और 21 अप्रैल को लेकिन तब तक देश बुरी तरह महामारी की चपेट में आ गया था.

राष्ट्रीय टास्कफोर्स के एक सदस्य ने बताया, "फरवरी के मध्य में यह साफ हो गया था कि भारत विनाशकारी दूसरी लहर की ओर बढ़ रहा है." तीनों वैज्ञानिकों ने नाम न छापने की शर्त पर बात की. पहले सदस्य ने कहा, "जब महाराष्ट्र में चीजें हाथ से बाहर जाने लगीं, तो हममें से कुछ ने इस मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की." टास्कफोर्स के एक अन्य सदस्य ने मुझे बताया कि टास्कफोर्स की कोई बैठक ''नहीं बुलाई'' गई. उन्होंने बताया, “बैठक तब हुई जब सरकार हमसे चाहती थी कि हम नेताओं द्वारा पहले से ही लिए गए कुछ फैसलों पर मुहर लगा दें."

सदस्यों ने मुझे बताया कि एक और महत्वपूर्ण चूक यह रही कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने कोविड-19 के लिए उपचार प्रोटोकॉल को जुलाई 2020 से यानी 9 महीनों से अपडेट ही नहीं किया. जबकि दुनिया उभरते हुए साक्ष्यों के साथ अपने उपचार के तरीके को अपडेट करती रही भारतीय रोगियों के लिए रेमडिसीविर ही निर्धारित रही, जो अब विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित नहीं है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने 3 जुलाई 2020 को अपना अंतिम उपचार प्रोटोकॉल अपडेट जारी किया था जिसने "जांच चिकित्सा" के लिए रेमडिसीविर को स्वीकार किया गया था लेकिन इस प्रोटोकॉल को “हालात बदलने पर” और “ज्यादा डेटा उपलब्ध हो जाने पर” अपडेट किया जाना था.

नवंबर 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बयान प्रकाशित किया कि वह "कोविड-19 रोगियों पर रेमडिसीविर के प्रयोग के खिलाफ सिफारिश करता है." नोट में कहा गया है, "डब्ल्यूएचओ ने अस्पताल में भर्ती मरीजों में, रोग की गंभीरता की परवाह किए बिना, रेमडिसीविर के इस्तेमाल के खिलाफ एक सशर्त सिफारिश जारी की है क्योंकि वर्तमान में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि रेमेडिसविर इन रोगियों में जीवन प्रत्याशा और अन्य परिणामों में सुधार करता है." लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय के उपचार प्रोटोकॉल को अपडेट नहीं किया गया और देश भर के निजी अस्पतालों ने रेमडिसीविर का बेशुमार इस्तेमाल करना जारी रखा. वैश्विक मानकों के अनुरूप उपचार दिशानिर्देशों को अपडेट करने में आईसीएमआर की विफलता के चलते रेमडिसीविर की काला बाजारी बढ़ गई जिसका शिकार कमजोर परिवार बन रहे हैं.

इस वर्ष दैनिक मामलों में भारी वृद्धि हुई है. भारत के टास्कफोर्स के शीर्ष वैज्ञानिक इसे देखते रहे लेकिन बैठक नहीं हुई. 1 फरवरी को भारत में 11427 नए मामले दर्ज किए गए, जो 1 मार्च तक 15510 हो गए और 1 अप्रैल तक 72330 नए मामले दर्ज हुए. 5 अप्रैल तक रिकॉर्ड 103558 नए मामले सामने आए, जो हर दिन खतरनाक हद तक बढ़ रहे थे. 21 अप्रैल तक यह तीन गुना होकर लगभग 295041 हो गए और उसी दिन जब भारत ने लगभग तीन लाख नए कोविड-19 मामले दर्ज किए तब राष्ट्रीय वैज्ञानिक कार्यबल ने उपचार प्रोटोकॉल को लेकर एक बैठक की. बैठक में लिए गए निर्णय अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं.

इस दौरान केंद्र सरकार ने अपनी टीकाकरण नीति और उसे संशोधित करने की घोषणा की, जो शायद बिना कार्यबल की बैठक के महामारी से निपटने में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था. देश के शीर्ष वैज्ञानिकों की राय के प्रति केंद्र सरकार की स्पष्ट उपेक्षा महामारी की शुरुआत से ही रही है. इससे पहले भी पिछले साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन को बढ़ाते हुए कार्यबल से परामर्श नहीं किया गया था. वैज्ञानिक टास्क फोर्स के चेयरपर्सन और नीती अयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल और आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने मेरे प्रश्नों का जवाब नहीं दिया.

महाराष्ट्र उन पहले राज्यों में से एक था जहां फरवरी के मध्य से ही गंभीर उछाल दिख रहा था. "हमें पता था कि अलग प्रकार के संक्रमण के मामले थे, जो तेजी से नौजवानों की जान ले रहे थे," पहले सदस्य ने कहा. इस अवधि के दौरान, कोरोनावायरस के दो या तीन उपभेदों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वायरस के डबल- और ट्रिपल-उत्परिवर्ती वेरिएंट पूरे देश में फैल गए थे जबकि संक्रमण को फैलाने वाले राजनीतिक और धार्मिक कार्यक्रम चलते रहे. कम से कम फरवरी की शुरुआत में आसन्न स्वास्थ्य संकट की गंभीरता को जानने के बावजूद चुनावी रैलियों और हरिद्वार में कुंभ मेले जैसे धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन जारी रहा और सार्वजनिक स्वास्थ्य की कीमत पर राजनीति हावी रही.

ऐसी घटनाओं के खिलाफ बहस करने में महामारी विज्ञानी और वैज्ञानिक मुखर रहे हैं. द हिंदू को दिए एक साक्षात्कार में पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के एक महामारी विशेषज्ञ डॉ. गिरिधर बाबू ने कहा है कि सरकार को "3 सी रणनीति" को प्राथमिकता देनी चाहिए. उन्होंने समझाया, "इनमें किसी भी तरह की भीड़ को रोकना, खासकर खराब वेंटिलेशन वाली बंद जगहों में प्रसार को कम करना और मास्क पहनने को सख्ती से लागू करने के माध्यम से निकट-संपर्क में संक्रमण को रोकना शामिल है." इसी तरह पीएचएफआई के अध्यक्ष के. श्रीनाथ रेड्डी ने चुनावी रैलियों और कुंभ मेले के संदर्भ में न्यूजक्लिक को बताया, "शायद, इस तरह के आयोजनों की योजना गलत आधार पर बनाई गई थी कि भारत में महामारी खत्म हो गई है और ब वापस नहीं आएगी."

रेड्डी के अनुसार, समय की जरूरत है कि "प्रतिक्रिया का विकेंद्रीकरण जिला स्तर तक हो." उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार द्वारा सहायता और अंतर-राज्य समन्वय की पेशकश की जा सकती है, योजना और संसाधन आवंटन राज्य की राजधानी स्तर पर किया जा सकता है. लेकिन डेटा-संचालित विकेंद्रीकृत निर्णय लेने का काम जिला स्तर पर किया जाना चाहिए.” इसके बजाय सरकार ने देश भर में बड़े पैमाने पर चुनावी रैलियां कीं.

चुनाव आयोग ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए बहुत कम प्रयास किया. पश्चिम बंगाल में आठ चरण के चुनाव की घोषणा की और बीजेपी का पक्ष लेने के लिए इसकी आलोचना हो ही रही है. स्वास्थ्य संकट के मद्देनजर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अंतिम तीन चरणों के चुनावों को एक साथ करने के लिए कहा था लेकिन चुनाव आयोग ने इसे खारिज कर दिया. पश्चिम बंगाल में मतदान 27 मार्च को शुरू हुआ था. दो हफ्तों के भीतर 14 अप्रैल को राज्य में संक्रमण के 5892 नए मामले दर्ज किए गए. यह अब तक की सबसे अधिक एक दिवसीय वृद्धि थी. एक सप्ताह बाद राज्य में कोविड​​-19 के नए मामलों की संख्या बढ़कर 10784 हो गई.

जनवरी के बाद से देश को दूसरी लहर को लेकर तैयार करने के लिए सरकारी तंत्र ने बहुत कम किया है. मध्य अप्रैल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने मंत्रालय के अधिकारियों से उन शोध परियोजनाओं पर "उल्लेखनीय प्रगति" कर दिखाने का आह्वान किया जो देशी गायों के लाभों को वैज्ञानिक रूप से मान्यता देते हैं. उन्होंने कहा कि "इसमें हुई किसी भी देरी के लिए कोविड-19 महामारी का बहाना नहीं चलेगा.”

इस दौरान देश भर में ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच वाणिज्य और उद्योग के केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यों से उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने के उपायों के बजाय "मांग को नियंत्रण में" रखने के लिए कहा. इस महीने की शुरुआत में स्क्रॉल वेबसाइट ने बताया कि भारत में ऑक्सीजन पैदा करने वाले प्लांटों के लिए निविदाएं जारी करने में केंद्र सरकार को आठ महीने का समय लग गया.

21 अप्रैल को रात 8 बजे दिल्ली उच्च न्यायालय ने मैक्स समूह द्वारा दायर एक तत्काल याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उसने अपने दो अस्पतालों में आए संकट पर ध्यान दिलाया जहां ऑक्सीजन की आपूर्ति खतरनाक रूप से कम चल रही थी. उच्च न्यायालय की विपिन सांघी और रेखा पल्ली की बेंच ने आवश्यक ऑक्सीजन की आपूर्ति करने में विफल रहने के लिए केंद्र सरकार पर तीखा तंज कसा.

पीठ ने टिप्पणी की, "हम हैरान और निराश हैं कि सरकार गंभीर कोविड ​रोगियों का इलाज कर रहे अस्पतालों की मेडिकल ऑक्सीजन की अत्यधिक और उभरती जरूरतों के लिए पर्याप्त रूप से ध्यान देती नजर नहीं आ रही है. यह गंभीर किस्म का आपातकाल है. लगता है राज्य के लिए मानव जीवन महत्वपूर्ण नहीं है.” पीठ ने प्रस्ताव दिया कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि स्टील और पेट्रोलियम उद्योगों में उत्पादित ऑक्सीजन अस्पतालों को मिल जाए. अदालत ने कहा, "आप उद्योगों के बारे में चिंतित हैं जबकि लोग मर रहे हैं. उद्योग एक या दो सप्ताह इंतजार कर सकते हैं. आपने इस तरह से सोचा तक नहीं, यही समस्या है. ”

लेकिन महाधिवक्ता तुषार मेहता रात 9.20 बजे सुनवाई में शामिल हुए और अदालत से इस तरह के आदेश को पारित करने से परहेज करने और अगले दिन तक के लिए स्थगित करने की मांग की. सुनवाई के दौरान दोनों मैक्स अस्पतालों को ऑक्सीजन-निर्माता आईनॉक्स से अतिरिक्त ऑक्सीजन प्राप्त हुई और पीठ ने मेहता के अनुरोध पर, यह आश्वासन मिलने के बाद कि केंद्र दिल्ली को 480 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति की सुविधा प्रदान करेगा, सुनवाई स्थगित कर दी.

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