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महंगाई और महामारी: करोड़ों के हाथ आई गरीबी

-आउटलुक,

“कोविड-19 से हर तबका प्रभावित, कोई बिजनेस बेचने तो कोई मेड का काम करने को मजबूर, लेकिन अमीरों की अमीरी भी बढ़ी”

अभी एक ही दशक हुआ जब भारतीयों ने अपने खर्च के तौर-तरीके और जीवन शैली में बदलाव लाना शुरू किया था। वे बचत की परंपरागत सोच की जगह खर्च करने पर ज्यादा जोर दे रहे थे। भारतीयों की सोच में आए इस बदलाव पर पश्चिमी देशों का स्पष्ट प्रभाव था। भारतीय स्मार्टफोन, हवाई यात्रा, एयर कंडीशनर, रेस्तरां में खाना-पीना जैसे भौतिकतावादी जीवन की आदत डाल रहे थे। लेकिन लगता है कोविड-19 महामारी ने उनकी इस उड़ान पर ब्रेक लगा दिया है। महामारी ने भारतीयों को दो वर्गों में बांट दिया है। एक वर्ग वह है जो महामारी की चुनौतियों के बावजूद अमीर बना रहा। दूसरा वह वर्ग है जिसे महामारी ने गरीबी में धकेल दिया। अमीरों में ई-कॉमर्स, अस्पताल, फॉर्मास्युटिकल आदि सेक्टर के लोग हैं जिन्होंने संकट की इस घड़ी का पूरा फायदा उठाया। गरीब वर्ग में वे हैं जिनके वेतन में कटौती हुई, नौकरियां गईं, ऐसे परिवार जिनके कमाने वाले सदस्य कोविड-19 के शिकार हो गए। वे लोग भी, इलाज के खर्च में जिनके पूरे जीवन की कमाई डूब गई।

शुरुआत एमएसएमई सेक्टर से करते हैं जो सबसे ज्यादा संकट में था। इसने अपना सब कुछ गंवा दिया है और उसे वापस पाने का कोई साधन नहीं दिख रहा है। लोकल सर्किल के एक सर्वेक्षण के अनुसार केवल 22 फीसदी छोटे कारोबारियों के पास तीन महीने से अधिक का पैसा बचा है। 41 फीसदी ऐसे हैं जिनके पास बिजनेस के लिए या तो पैसा ही नहीं बचा है या वे एक महीने तक ही जैसे-तैसे अपनी गाड़ी खींच सकते हैं।

ऑटो कंपोनेंट का बिजनेस करने वाले अंकित मिश्रा कहते हैं, ''मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का बुरा हाल है। मैंने अपना बिजनेस जारी रखने के लिए कर्मचारियों की संख्या 15 से घटाकर आठ कर दी है, लेकिन नए ऑर्डर नहीं आ रहे हैं। कर्ज पर काम करने वाला बाजार पूरी तरह चरमरा गया है। बिना भुगतान किए कच्चा मिल नहीं रहा है। हम अपने खर्चे घटाने को मजबूर हैं। जून में बेटी के पहले जन्मदिन की पार्टी नहीं की और नई कार खरीदने की योजना को भी टाल दिया है। संकट की इस स्थिति में वेतनभोगियों को तो एक निश्चित तनख्वाह मिल जाती है, लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए सब अनिश्चित है।”

अंकित की ही तरह 49 फीसदी छोटे कारोबारी जुलाई तक अपने कर्मचारियों के वेतन और दूसरे लाभ में कटौती करने की सोच रहे हैं। 59 फीसदी कारोबारी तो बिजनेस ही छोटा करने या फिर उसे बेचने या बंद करना बेहतर समझते हैं। सोशल मीडिया वेबसाइट लिंक्डइन पर ऐसे बहुत से कारोबारी मिल जाएंगे, जिनका दशकों पुराना बिजनेस बर्बाद हो गया है और वे एक अदद नौकरी की तलाश में हैं।

रत्नेश ठाकुर इसका उदाहरण हैं। लिंक्डइन पर ठाकुर की पोस्ट से उनकी बेबसी साफ झलकती है। वे लिखते हैं, “पहले लॉकडाउन में मेरा 25 साल का बिजनेस तबाह हो गया और दूसरे लॉकडाउन में पत्नी को खो चुका हूं। वह केवल 47 साल की थी॒। एक साल से मैं उधार के सहारे परिवार का भरण-पोषण कर रहा हूं। मैं हाथ जोड़कर आप सबसे प्रार्थना करता रहा हूं कि मेरी मदद करिए ताकि दो बच्चों और बूढ़ी मां की थाली में खाने का इंतजाम कर सकूं। मैं कोई भी काम करने को तैयार हूं।”

इस तरह के लाचारी भरे संदेशों से लिंक्डइन भरा पड़ा है। लोकल सर्किल के संस्थापक और चेयरमैन सचिन तपरिया कहते हैं, “हमारे सर्वेक्षण के अनुसार अगले छह महीने में केवल 22 फीसदी छोटे कारोबारियों को अपने बिजनेस में ग्रोथ दिख रही है। हमने वित्त मंत्रालय को सुझाव दिया है कि लॉकडाउन में श्रमिकों और अन्य दिक्कतों को देखते हुए सरकारी कंपनियों और विभागों के साथ काम करने वाली एमएसएमई पर पेनाल्टी के प्रावधान को तीन से छह महीने तक टाल देना चाहिए।” स्टील, तांबा जैसी कमोडिटी के दाम छह महीने में 50 फीसदी बढ़े हैं, जिसे देखते हुए सरकारी कंपनियों के साथ अनुबंधों को संशोधित करते हुए नए सिरे से कीमतें तय की जानी चाहिए।

ऐसा नहीं कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ही खून के आंसू रो रहा है, खुदरा विक्रेताओं को भी खास उम्मीद नहीं है, क्योंकि लोग खर्चे घटा रहे हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक बड़ी इलेक्ट्रॉनिक रिटेल चेन के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''हम हर तरफ से पिट रहे हैं। ई-कॉमर्स सेक्टर के साथ हम कीमतों की लड़ाई नहीं लड़ सकते, क्योंकि हमारे पास उतना कैश नहीं है। न ही नए उत्पाद खरीदने के लिए ज्यादा क्रेडिट की गुंजाइश है।” उन्होंने बताया कि कई बड़े ब्रांडों ने इस साल नए उत्पाद लॉन्च न करने का फैसला किया है। वेतन और अन्य लाभों में कटौती के बावजूद कर्मचारियों की संख्या 15-20 फीसदी तक घटानी पड़ी। फरवरी-मार्च से वेतन कटौती वापस लेने के संकेत दिखने लगे थे। कई बड़ी कंपनियां न केवल पुराने वेतन स्तर पर लौट आईं, बल्कि वेतन बढ़ाना भी शुरू कर दिया था। लेकिन दूसरी लहर ने फिर इन पर पानी फेर दिया।

इंटरसिटी रेलयात्री स्टार्टअप के सह-संस्थापक और सीईओ मनीष राठी ने बताया कि उनकी कंपनी में सबके वेतन में कटौती करनी पड़ी। हालांकि अब ज्यादातर कर्मचारियों का वेतन बहाल कर दिया गया है, लेकिन मनीष सहित प्रबंधन के कुछ लोगों ने एक साल से अधिक समय से अपने वेतन में कटौती को जारी रखा है। मनीष की पत्नी ने कहा, “सौभाग्य से हमारे पास संकट से निपटने के लिए पर्याप्त पैसे थे। हमने पिछले साल दो बड़ी योजनाएं बनाई थीं। पहला, मनीष के 50वें जन्मदिन की पार्टी बड़े स्तर पर करना और दूसरा, यूरोप की यात्रा। लेकिन सब टालना पड़ गया। अब हम सबसे पहले स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं।”

सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के एमडी एवं सीईओ महेश व्यास कहते हैं, “रोजगार संख्या अप्रैल 2021 के 39.08 करोड़ से गिरकर मई में 37.55 करोड़ रह गई। इसमें जनवरी 2021 के मुकाबले 2.53 करोड़ की कमी आई थी।” महेश के इस आकलन में वे लोग शामिल नहीं जिनकी कमाई घट गई है। इस वर्ग में घरों में काम करने वाली मेड, ड्राइवर, कार क्लीनर, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन जैसे कम आय वाले शामिल हैं।

ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली पूजा ने अब मेड का काम करना शुरू कर दिया क्योंकि उनका पार्लर बंद हो गया और वेतन भी कम हो गया था। लेकिन यहां भी उनकी परेशानी कम नहीं हुई। वे बताती हैं, “मैंने तीन घरों में काम शुरू किया, लेकिन कोविड-19 के मामले बढ़ने लगे तो दो घरों में काम बंद हो गया। कुछ खर्चे नियमित होते हैं और उन्हें रोका नहीं जा सकता। इस बीच मेरी मां के गॉल ब्लैडर में पथरी हो गई और डॉक्टरों ने ऑपरेशन के लिए एक लाख रुपये का खर्च बताया। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, तो मां दर्द की गोलियों के सहारे बीमारी को झेल रही हैं।”

महामारी से आर्थिक विकास भी प्रभावित है। 2020-21 की अंतिम तिमाही में भारत की जीडीपी 1.6% बढ़ी है, लेकिन पूरे वर्ष में यह 7.6% गिर गई। यह चार दशकों में सबसे बड़ी गिरावट है। आरबीआई ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए भी भारत के विकास अनुमान को कम किया है। विश्व बैंक ने इसे 8 जून को घटाकर 8.3% कर दिया था। विशेष रूप से तीसरी लहर के दो महीने के भीतर आने की आशंका को देखते हुए रिकवरी के संकेत कम हैं। यानी इन दो महीने में बड़े रिवाइवल की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में अनेक परिवार पुरानी बचत के सहारे हैं।

केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, “बचत अलग-अलग तरीके से प्रभावित हो रही है। परिवारों ने पिछले कुछ महीने स्वास्थ्य पर अधिक और गैर जरूरी वस्तुओं पर कम खर्च किया है।” सबनवीस के अनुसार खर्च के साधन बंद होने के कारण बचत करने के अलावा कोई चारा नहीं है। यह बचत नकद के साथ वित्तीय साधनों के रूप में भी हो रही है। ज्यादा महंगाई और बैंक जमा पर कम रिटर्न के कारण लोग स्टॉक और म्यूचुअल फंड में निवेश बढ़ा रहे हैं। इसी वजह से निफ्टी और सेंसेक्स लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग इसका लाभ उठा रहे हैं?

नाइट फ्रैंक इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक शिशिर बैजल के अनुसार, “वैश्विक बाजार में अनिश्चितता के बावजूद 2020 में भारत के 60 फीसदी बड़े अमीरों की संपत्ति बढ़ गई। 2021 में 91 फीसदी बड़े अमीरों को अपनी संपत्ति बढ़ने की उम्मीद है। नाइट फ्रैंक का आकलन है कि 2020 से 2025 के बीच दुनिया में बड़े अमीरों की संख्या 39 फीसदी बढ़ जाएगी। इंडोनेशिया में 67 फीसदी और भारत में 63 फीसदी की सबसे ज्यादा बढ़ोतरी होगी। भले ही इंडोनेशिया की दर सबसे ज्यादा हो, भारत के बड़े अमीरों की संख्या उसके मुकाबले 10 गुना ज्यादा होगी।

नाइट फ्रैंक ने अपनी ‘वेल्थ रिपोर्ट 2021’ में बताया है कि भारत में तीन करोड़ डॉलर या उससे अधिक संपत्ति वाले बड़े अमीरों की संख्या 2025 तक 11,198 हो जाने की उम्मीद है। अभी भारत में ऐसे 6,884 सुपर रिच और 113 अरबपति हैं। भारत में अरबपतियों की संख्या 2025 तक 43 फीसदी बढ़कर 162 हो जाने की उम्मीद है। इस दौरान दुनिया में अरबपतियों की संख्या 24 फीसदी और एशिया में 38 फीसदी बढ़ेगी। यानी भारत की रफ्तार इनसे अधिक होगी। रिपोर्ट के अनुसार अभी भारत के सबसे धनी एक फीसदी लोगों में शामिल होने के लिए 60,000 डॉलर की जरूरत पड़ती है। अगले पांच वर्षों में यह सीमा दोगुनी हो जाएगी।

हुरुन इंडिया के संस्थापक और वेंचर कैपिटलिस्ट अनस रहमान जुनैद इस बात से सहमत हैं कि महामारी ने भारत में आर्थिक विभाजन को और गहरा कर दिया है। फार्मास्युटिकल्स, आइटी, हेल्थकेयर और एफएमसीजी जैसे क्षेत्रों में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई, जबकि यात्रा और पर्यटन, रेस्तरां, कपड़ा, ऑटो जैसे क्षेत्र सुस्ती के शिकार हैं। उनका दावा है कि सुस्ती समाप्त हो जाने के बाद, इन क्षेत्रों में विकास की गति तेज होगी क्योंकि ग्रोथ में लोगों की ललक एक प्रमुख भूमिका निभाएगी। जुनैद खुद को भाग्यशाली मानते हैं क्योंकि महामारी के दौरान उनके सभी निवेश संपत्ति बढ़ाने वाले साबित हुए।

‘हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट 2021’ में 2,402 कंपनियों और 68 देशों के 3,228 अरबपतियों को स्थान मिला है। इन अरबपतियों में से 2,312 की संपत्ति इस दौरान बढ़ी है। इनके अलावा 620 नए चेहरे हैं, जबकि 635 की संपत्ति में कमी आई और 194 सूची से बाहर हो गए। इस दौरान 32 अरबपतियों की मौत भी हो गई। 282 अरबपतियों की संपत्ति स्थिर रही। इस सूची में अरबपतियों की औसत उम्र 65 वर्ष है।

भारत 177 अरबपतियों के साथ विश्व रैंकिंग में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। पिछले साल की तुलना में अरबपतियों की संख्या 40 बढ़ गई है। लॉकडाउन, मृत्यु और निराशा के बीच यह नई हकीकत है। 83 अरब अमेरिकी डॉलर की संपत्ति के साथ रिलायंस के मुकेश अंबानी भारत के सबसे अमीर व्यक्ति हैं। सबसे ज्यादा 37 अमीर हेल्थकेयर, 26 अमीर कंज्यूमर गुड्स और 19 अमीर केमिकल्स सेक्टर के हैं। मुंबई अब तक 61 लोगों के साथ अरबपतियों की राजधानी है, इसके बाद दिल्ली है जहां 40 अरबपति हैं। सूची में शामिल 150 अरबपतियों की संपत्ति बढ़ी है, इनमें 50 नए चेहरे हैं। 16 की संपत्ति कम हुई तो 10 सूची से बाहर हो गए हैं। 12 की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। हुरुन के अनुसार महामारी के दौरान गौतम अदाणी और उनके परिवार की संपत्ति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। उनकी संपत्ति लगभग दोगुनी, 32 अरब डॉलर हो गई। इस सूची में एक और अहम नाम शिव नादर और उनका परिवार है जिनकी संपत्ति 10 अरब डॉलर बढ़कर 27 अरब डॉलर हो गई। वहीं एन.आर. नारायणमूर्ति की संपत्ति 35 फीसदी बढ़कर 3.1 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई।

एक और बड़ा आश्चर्य हीरो साइकिल्स वाले पंकज मुंजाल और उनके परिवार की इस सूची में पहली बार एंट्री है। भारत में ई-बाइक की बढ़ती मांग के कारण उनकी संपत्ति बढ़कर 1.2 अरब डॉलर हो गई है। सूची में शामिल अन्य भारतीयों में डिवीज लैबोरेटरीज के मुरली दिवि और उनका परिवार है। उनकी संपत्ति 72 फीसदी बढ़कर 7.4 अरब डॉलर हो गई। कुमार मंगलम बिड़ला परिवार की संपत्ति 61 फीसदी बढ़कर 9.2 अरब डॉलर हो गई है।

महामारी की वजह से प्रभावित होने वाले अमीरों में ओयो रूम होटल चेन के संस्थापक रितेश अग्रवाल भी हैं। वे अरबपतियों की इस सूची से बाहर हो गए हैं। इसी तरह 2018 में सबसे अधिक संपत्ति अर्जित करने वाले फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी ने भी अरबपति का तमगा खो दिया है। दूसरी तरफ, महामारी की वजह से गरीबों का एक नया वर्ग सामने आ रहा है। ये वे लोग हैं जो अस्पतालों का बिल भरने की वजह से गरीब हो गए हैं। वित्त आयोग का अनुमान है कि कमाई का 70 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च होने के कारण हर साल लगभग छह करोड़ भारतीय गरीब हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी के कारण यह संख्या और अधिक बढ़ेगी, हालांकि इस समय संख्या का पता लगाना बहुत मुश्किल है।

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