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कार्यकारी (और) संपादक

-द कारवां,

जैसे ही यह स्पष्ट हो गया कि डोनाल्ड ट्रंप सत्ता से बाहर हो गए हैं और जो बाइडन अमेरिका के नए राष्ट्रपति होंगे, अनंत गोयनका ने एक ट्वीट किया :

मैं आशा करता हूं कि बाइडन की जीत के बाद अमेरिकी समाचार मीडिया अपने पक्षपातपूर्ण तरीके के बारे में आत्मावलोकन करेगा. वह केवल अपने प्रति वफादारों और ईको-कक्ष समुदाय के पाठकों के बजाय अवश्य ही सकल आबादी के विचारों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगा.

जाहिर तौर पर यह गोयनका के पसंदीदा विषयों में से एक है. पत्रकार शोमा चौधरी को दिए एक हालिया इंटरव्यू में एक्सप्रेस ग्रुप के कार्यकारी निदेशक और वारिस गोयनका ने “एक निश्चित सरोकार, एक निश्चित भूमिका जो परिभाषित करे कि हम यह क्यों कर रहे हैं, मीडिया के इस पेशे में क्यों हैं,” की जरूरतों पर बातचीत की. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की इमरजेंसी काल से चली आ रही विरासत का उल्लेख किया, जब इस अखबार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अधिनायकवादी रवैये की मुखालफत की थी. फिर उन्होंने उस अंधेरे कालखंड द्वारा परिभाषित किए गए लक्ष्यों के बारे में कहा, “तब मुनाफे से कहीं ज्यादा बड़ा मकसद होता था : निरंकुशता को चुनौती देना, अबाध अभिव्यक्ति और लोकतंत्र की रक्षा करना.”

लेकिन इमरजेंसी के बाद एक दूसरी सरकार के अपनी मौज-तरंग में आकर अपने से असंतुष्टों को जेल में डाले जाने के बावजूद गोयनका ने आज के मीडिया के लिए उन्हीं लक्ष्यों का उल्लेख नहीं किया. इसके बजाय उन्होंने महसूस किया कि वर्तमान की त्रासदी की वजह देश में अतिवादी विचारों का ध्रुवीकरण है. गोयनका ने कहा, “आज पत्रकारिता की एकदम सटीक भूमिका उस सामान्य धरातल की खोज और उसके लिए प्रयत्न में अधिक समय लगाने का है, जो कम ध्रुवीकरण करे, एक या दूसरे अतिवादों के बारे में महज जुगाली करने के बजाए समाज को कम से कम विभाजित करे.”

गोयनका ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि सरकार भी यह समझ रही है कि मीडिया का एक हिस्सा उसके आगे मुश्किलें खड़ी कर रहा है और एक अन्य भाग वास्तव में अपना काम कर रहा है. और मैं सोचता हूं कि यह फर्क सरकार और श्रोताओं दोनों के बीच पूरी तरह स्पष्ट हो गया है. तथ्य तो यह है कि कुछ तथाकथित सत्ता विरोधी, जबरदस्त व्यवस्था विरोधी मीडिया ने कभी सरकार के नेक कामों की सराहना करने वाली कोई स्टोरी नहीं छापी, इस वजह से उन्होंने (सत्ता) से सख्त सवाल पूछने की अपनी वैधता गंवा दी है.”

उनके कहे का मतलब यह हुआ कि इमरजेंसी के समय में एक्सप्रेस का जो मकसद था, वह इस वजह से फेल हो गया क्योंकि उसने उस दौरान ट्रेनों के समय पर चलने की रिपोर्टिंग नहीं की.

अमेरिका में न्यूज चैनलों के रसूख के बावजूद, न्यूयॉर्क टाइम्स या वॉशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार राष्ट्रीय बहस को आकार देने में आज भी दखल रखते हैं. यही बात भारत के किसी भी अखबार के बारे में कहना संभव नहीं है.
इस साल हमने भारत को एक निरंकुश राज्य के रूप में निरंतर विकसित होते देखा है, फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई व्यापक सांप्रदायिक हिंसा के प्रति संस्थाओं की प्रतिक्रियाएं इसका बड़ा उदाहरण हैं. ये हमले, जिनमें अधिकतर मुसलमानों को निशाना बनाया गया, विभेदकारी नागरिकता कानून के विरोध में जारी अहिंसक प्रदर्शनों के मुंहतोड़ जवाब में किए गए थे और जिसे दिल्ली पुलिस और भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों की सांठगांठ से अंजाम दिया गया था. साल के अंत में, पुलिस के चार्जशीट दाखिल करने और अदालतों में मामलों की सुनवाई जब शुरू हुई तो शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने वाले अनेक प्रदर्शनकारियों और हिंसा में निशाना बनाए गए लोगों ने पाया कि उन पर दंगा भड़काने की साजिश रचने और खुद पर ही हमले कराने के आरोप थोप दिए गए हैं. ये घटनाएं भारतीय नागरिकता के विचार को लेकर विधायिका से लेकर कानूनी प्रक्रियायों के जोड़-तोड़ से जुड़ीं हैं, जो अपराध के शिकार हुए लोगों पर ही खुद के खिलाफ हिंसा की साजिश रचने का इल्जाम मंढ़ देता है-यह कसौटी है कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएं किस तरह उन लोगों के ही विरुद्ध हो गई हैं, जिनकी सेवा करने और संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से वह बनाई गई हैं.

एक्सप्रेस ग्रुप के कार्यकारी निदेशक अनंत गोयनका ने इंटरव्यू के दौरान कहा, “यह हकीकत है कि कुछ तथाकथित सत्ता विरोधी, जबरदस्त व्यवस्था विरोधी खबरों की आवाजों ने सरकार को श्रेय दिए जाने लायक किसी काम के बारे में कभी कोई स्टोरी नहीं दी, इस वजह से उन्होंने (सत्ता से) कड़े सवाल पूछने कि अपनी वैधता गंवा दी है.”. एस कुमार/मिंट/हिंदुस्तान ​टा​इम्सएक्सप्रेस ग्रुप के कार्यकारी निदेशक अनंत गोयनका ने इंटरव्यू के दौरान कहा, “यह हकीकत है कि कुछ तथाकथित सत्ता विरोधी, जबरदस्त व्यवस्था विरोधी खबरों की आवाजों ने सरकार को श्रेय दिए जाने लायक किसी काम के बारे में कभी कोई स्टोरी नहीं दी, इस वजह से उन्होंने (सत्ता से) कड़े सवाल पूछने कि अपनी वैधता गंवा दी है.”. एस कुमार/मिंट/हिंदुस्तान ​टा​इम्स
एक्सप्रेस ग्रुप के कार्यकारी निदेशक अनंत गोयनका ने इंटरव्यू के दौरान कहा, “यह हकीकत है कि कुछ तथाकथित सत्ता विरोधी, जबरदस्त व्यवस्था विरोधी खबरों की आवाजों ने सरकार को श्रेय दिए जाने लायक किसी काम के बारे में कभी कोई स्टोरी नहीं दी, इस वजह से उन्होंने (सत्ता से) कड़े सवाल पूछने कि अपनी वैधता गंवा दी है.” एस कुमार/मिंट/हिंदुस्तान ​टा​इम्स
यह सब उन संस्थाओं के गलत कामों या निर्णयों का कम प्रतिरोध करने या एकदम प्रतिरोध नहीं करने की वजह से हुआ है, जिनका मकसद ही एक संवैधानिक लोकतंत्र में कार्यपालिका की निरंकुशता को रोकना था. विधायिका को दरकिनार करने और न्यायिक- प्रणाली के सह-विकल्प पर तो काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन इस प्रक्रिया में मीडिया के उकसावे ने उसको पूरी तरह उधेड़ दिया है.

मीडिया की सबसे ज्यादा आलोचना अकेले प्राइम टाइम की की जाती है लेकिन वह रवैया इस असफलता को पूरे विस्तार से दर्ज नहीं करता. मुख्यधारा के प्रेस ने भी अपनी जवाबदेही को बिल्कुल ही तज दिया है. इनमें से कोई भी अखबार इसका उदाहरण हो सकता है : दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, द टाइम्स ऑफ इंडिया और दि हिंदुस्तान टाइम्स. यहां केवल उन अखबारों के नाम गिनाए गए हैं जिनकी पाठकों तक व्यापक पहुंच है. किंतु यह बात विशेष रूप से निर्भीक, निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता करने की ऐतिहासिक प्रसिद्धि-प्रतिष्ठा वाले इंडियन एक्सप्रेस के संदर्भ में कही जा रही है कि उस जैसे संगठनों में, जो सत्ता को परेशान करने का बीड़ा उठाता है,यह बदलाव किस तरह दिखाई देता है.

बिना किसी गंभीर जांच-परख के गोयनका का तुलना के साथ अमेरिकी मीडिया को मशविरा देना, यहां (देशी) के मीडिया को मक्खन लगाने से ज्यादा कुछ नहीं है. अलबत्ता, ट्रंप के पूरे कार्यकाल में अमेरिकी मीडिया के अधिकांश हिस्से में एक स्पष्ट विभाजन रहा है. किंतु, पक्षपात और ट्रंप द्वारा घृणा-द्वेष के माहौल को खुराक देने तथा उसे बढ़ावा देने की असल वजह बताने में पक्षपाती नहीं होना चाहिए. गोयनका के अमेरिकी मीडिया की भर्त्सना में यह अंतर गायब दिखा है, जब ट्रंप सत्ता से बेदखल किए जा रहे थे, तो अमेरिकी मीडिया का छोटा-मोटा हिस्सा नहीं बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा उनकी छानबीन, उनकी समीक्षा का काम कर रहा था. इसकी तुलना में भारतीय मीडिया, जो अपने विभिन्न संस्करणों और इकाइयों की फौज के साथ मौजूदा सरकार के पक्ष में बैटिंग कर रहा है, वह कम “पक्षपाती” है, जिसने नरेन्द्र मोदी और उनके समर्थकों के सामने खड़े होने में लगभग पूरी तरह से अपनी उदासीनता या अनिच्छा जताई है. अमेरिका में न्यूज चैनलों के रसूख के बावजूद, वहां के न्यूयॉर्क टाइम्स या वॉशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार राष्ट्रीय बहस को आकार देने में आज भी अपनी दखल रखते हैं. यह बात आज भारत के किसी भी अखबार के बारे में नहीं कही जा सकती.

विफलता मीडिया के लिए प्राय: वित्तीय गिरावट ला देती है राजस्व के रूप में लंबे समय से चले आ रहे उस रुझान में गिरावट आयी है, जिसमें कई मीडिया हाउस इस उद्योग पर अपनी शक्ति के विस्तार में लगी सरकार से मिलने वाले विज्ञापन पर निर्भर रहे हैं. यह बात खास कर के इस साल भी सच है क्योंकि कोरोनावायरस से आई इस वैश्विक महामारी के चलते अर्थव्यवस्था पर कड़ी मार पड़ी है. इसने निजी विज्ञापनों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री को भी बहुत नुकसान पहुंचाया है. लेकिन सरकार से सवाल पूछने की मौजूदा समय में मीडिया की यह विफलता वित्तीय दबाव के तहत आई बताई जाती है लेकिन मीडिया ने तब भी अपना यह काम बेहतर तरीके से नहीं किया था, जब उस पर इस तरह का कोई दबाव नहीं था. देश के सबसे बडे मीडिया घरानों ने वर्षों तक सरकार की दरियादिली से अकूत मुनाफा कमाया है.

फिर यह टूटन भी अन्य कारकों पर प्रभाव डालती है. गहरा संकट है लेकिन इस पर कम ही चर्चा की जाती है. इसने उन लोगों के विचारों को ग्रसित कर लिया है, जिनके खुद के मीडिया हाउस हैं और जो इस सरकार को चला रहे हैं. यह सूरतेहाल दिखाता है कि मीडिया को सहअपराधिता का उत्पाद होना है, मात्र जोर-जबरदस्ती या धौंस का नहीं.

यह जो घालमेल है, महज राजनीतिक अवधारणा तक ही नहीं अटका पड़ा है बल्कि उसने मीडिया की भूमिका को भी अपने दायरे में समेट लिया है.

एक्सप्रेस ने जब 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक इंटरव्यू, जो एक दुर्लभ चीज है, लिया तो उन्होंने इस मौके का फायदा इस अखबार के कवरेज में रह गई कसर का बिंदुवार जिक्र करते हुए आरोप लगाने में उठाया. उन्होंने जम्मू-कश्मीर का जिक्र करते हुए सवाल किया,“क्या इंडियन एक्सप्रेस ने, जो खोजी पत्रकारिता करता है, राज्यपाल के शासनकाल में 100 फीसद विद्युतीकरण के हासिल लक्ष्य के बारे लिखा? क्या यह खबर नहीं है?” उन्होंने आगे कहा :

जम्मू-कश्मीर में चुनावों के दौरान हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई. पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनावों के दौरान 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे. वहां कोई भी चुनाव बिना खून-खराबे के नहीं होता. मेरी देशभक्ति जम्मू-कश्मीर में दिखती नहीं आपको क्या? पूर्वोत्तर, जो कब से उग्रवाद से जूझ रहा था, अब अमन-चैन से है. क्या हमने वहां राष्ट्रवाद की समझ नहीं रोपी है? उन्हें मुख्यधारा में नहीं लाया है?

यह पूछने पर कि ऐसी कोई चीज जिसको उनकी सरकार हासिल करने से चूक गई हो, मोदी ने ठहाकों के साथ जवाब दिया, “मोदी की आलोचना करने में इंडियन एक्सप्रेस को वस्तुनिष्ट बनाने से.”

जब देश के सबसे निर्भीक मीडिया संगठनों में से एक में पत्रकारिता का मिशन, जैसा कि उसको नियंत्रित करने वाले परिवार के वारिस के शब्दों में झलकता है, उसी संदर्भ में इसे परिभाषित करता है, जिस रूप में मोदी भारतीय मीडिया को पसंद करेंगे, तो वह सरकार के एक अंग के रूप में काम करने लगता है.

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जब बात टीवी न्यूज चैनलों की आती है, तो यह तथ्य पहले से ही संदेह के बिल्कुल परे है. लेकिन जिन वजहों से गड़बड़ी हुई है उन पर गहराई से ध्यान दिए जाने की जरूरत है. कई सारे उदाहरणों में सबसे स्पष्ट उदाहरण अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी का है. इस चैनल पर होने वाली ज्यादतर बहस यहीं तक सिमट कर रह गईं. लेकिन इस समय जो स्पष्ट है,वह यह कि यह जिन चीजों को अंजाम देने में सक्षम है,जो वह कर भी रहा है, वह पत्रकारिता से जुड़ी प्रक्रियाओं का उल्लंघन करके ही किया जाता है.

तेजिंदर सिंह सोढ़ी अगस्त में इस्तीफा देने के पहले तक जम्मू-कश्मीर में रिपब्लिक टीवी के ब्यूरो चीफ थे. उन्होंने चैनल में काम करने के दौरान मिले अनुभवों के बारे में अपने इस्तीफे में लिख कर इसे रिकॉर्ड पर ला दिया. उनका इस्तीफा जल्द ही पब्लिक डोमेन में भी आ गया. सोढ़ी ने अपने इस्तीफे में कांग्रेसी नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की 2014 में मौत के बाद की एक घटना का जिक्र किया है. यह मामला अब तक अनसुलझा है. उन्होंने लिखा है :

एक दिन डेस्क से किसी का (मैं उसका नाम नहीं लूंगा लेकिन अर्नब गोस्वामी ने इस कदर प्रताड़ित किया कि उसे दफ्तर की मेज पर ही मेजर हार्ट अटैक हो गया) मेरे पास फोन आया कि सुनंदा पुष्कर के पिता के घर जाइए और उनके नजदीक छिप जाइए. निश्चित समय पर आपको बताया जाएगा कि आगे क्या करना है? मैं क्यों छिपूं? उन्होंने अपने स्टाफ पर कभी भरोसा नहीं किया इसलिए अंतिम क्षण तक, हम लोगों को कुछ नहीं बताया जाता था. मैं उनके घर गया और तभी मुझे कहा गया कि अब घर में दाखिल हो जाऊं और श्रीमती पुष्कर के बुजुर्ग पिता के मुंह में माइक ठूंस दूं और उन्हें “अपनी बेटी की हत्या” का दोष शशि थरूर पर मंढने के लिए मजबूर कर दूं. मैंने ऐसा करने की कोशिश की लेकिन मैंने जब सुनंदा के पिता को देखा तो मुझे आंसू आ गए. वह बहुत कमजोर थे और मानसिक रूप से स्थिर नहीं थे. मैंने इस बारे में डेस्क को बताया किंतु उन्होंने मुझसे कहा कि अर्नब मुझ पर आग-बबूला हो रहे हैं और वह चाहते हैं कि पिता कैमरे पर बोलें कि “थरूर ने उनकी बेटी को मारा” है.

मैंने यह करने से इनकार कर दिया और वहां से निकल पड़ा. इसके पहले मैंने उनके नौकर से बातचीत की जिसमें उसने श्री थरूर और श्रीमती पुष्कर के रिश्ते के बारे में अच्छा बताया, लेकिन इसको चैनल पर कभी प्रसारित नहीं किया गया. अगले दिन अर्नब ने मुझे कॉल किया और मुझ पर बेतहाशा चीखे-चिल्लाए. उन्होंने मुझे कहा, “कैमरे के सामने श्रीमती सुनंदा पुष्कर के पिता से उनकी बेटी की मौत के लिए थरूर को कसूरवार न ठहरा कर मैंने उनको शर्मसार कर दिया है.” यह वह जर्नलिज्म नहीं था, जिसके लिए मैंने रिपब्लिक टीवी ज्वाइन किया था. यहां रिपोर्टर्स को अर्नब की तरफ से हिटमैन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था.

इसके एक महीने बाद, रिपब्लिक में काम करने वाली शांताश्री सरकार भी नोटिस अवधि खत्म करने के बाद चैनल से बाहर आ गईं. उन्होंने भी एक के बाद एक कई सारे ट्वीट करके ठीक इसी तरह के आरोप लगाए. सुशांत सिंह के खुदकुशी कर लेने के बाद, रिपब्लिक टीवी उनकी दोस्त रिया चक्रवर्ती के चरित्र हनन में लग गया. बिना पर्याप्त सबूत के ही रिया पर सुशांत को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए जाने लगे थे. सरकार ने लिखा कि वह देख रही थी कि “किस तरह मेरे साथी-सहयोगियों ने रिया के अपार्टमेंट में आने वाले किसी भी व्यक्ति को तंग करना शुरू कर दिया था. वे पुलिस और यूं ही सामने टकरा गए किसी भी डिलिवरी ब्वाय से असुविधाजनक सवाल पूछने से बाज नहीं आते थे. वे सोचते थे कि महिलाओं के कपड़े खींचने और उन पर चीखने-चिल्लाने से वे चैनल के लिए मौजू बने रहेंगे!”

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