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मनरेगा : पांच महीनों में ही खत्म हो गया आधे से ज्यादा बजट, 'गांवों में काम की मांग बहुत ज्यादा है, लोग काम मांग रहे हैं'

-गांव कनेक्शन,"एक महीने से हमें काम नहीं मिला है, मेरे अल्लीपुर गाँव में ही कम से कम 250 लोग मनरेगा में काम करते हैं, मगर अभी कहीं काम नहीं चल रहा, लोग पंचायत में काम मांगने जाते हैं, मगर कहीं कुछ नहीं, गांवों में अभी भी मनरेगा में काम की मांग बहुत ज्यादा है, लोग काम मांग रहे हैं," सालों से मनरेगा में मजदूरी करती आ रहीं रामबेटी बताती हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के पिसावां ब्लॉक की रहने वाली मनरेगा मजदूर रामबेटी को शुरुआत में अपनी ग्राम पंचायत में मनरेगा में तालाब खुदाई और भूमि समतलीकरण का काम मिला था, मगर पिछले एक महीने से रामबेटी जैसे सैकड़ों मजदूर खाली हाथ बैठे हैं। रामबेटी के मुताबिक, पिसावां ब्लॉक में 40 गाँव आते हैं और अभी किसी ग्राम पंचायत में कोई योजना न होने की वजह से मनरेगा में काम नहीं चल रहा है। वर्ष 2004 में मनरेगा योजना की सरकारी वेबसाइट की एमआईएस रिपोर्ट को ट्रैक करने के लिए बनाए गए कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और जन संगठनों के सदस्यों का एक समूह पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी (पीएईजी) ने हाल में मनरेगा पर अपनी रिपोर्ट जारी की है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, सितम्बर तक 1.55 करोड़ लोगों को मनरेगा में काम मांगने के बावजूद काम नहीं मिल सका है। जबकि मनरेगा के तहत आवंटित राशि का 64 फीसदी सरकार खर्च कर चुकी है। सिर्फ पांच महीनों में ही मनरेगा में इतनी तेजी से खर्च हो रही राशि से साफ़ होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा में काम की मांग अभी भी बहुत ज्यादा है। पीएईजी रिपोर्ट के मुताबिक, आठ सितम्बर तक मनरेगा में रोजगार की मांग कर रहे उत्तर प्रदेश के 35.01 लाख ग्रामीणों को काम नहीं मिला। यह आंकड़ा मध्य प्रदेश में 19.38 लाख, पश्चिम बंगाल में 13.03 लाख, छत्तीसगढ़ में 11.74 लाख, राजस्थान में 13.78 लाख और बिहार में 9.98 लाख रहा यानी इतने ग्रामीणों को मनरेगा में काम मांगने के बावजूद रोजगार नहीं मिल सका।

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