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ग्राउंड रिपोर्ट: ‘लॉकडाउन ने हमें बर्बाद कर दिया, स्थिति नहीं बदली तो आत्महत्या करनी पड़ेगी’

-न्यूजलॉन्ड्री,

‘‘10 दिन हो गए हैं काम नहीं मिला. आज भी सुबह सात बजे यहां आ गया था, लेकिन अब दस बज गए. एक-दो घंटे और इंतज़ार करेंगे फिर कमरे पर चले जाएंगे.’’ यह कहना है पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के रहने वाले 22 वर्षीय सुखसागर मंडल का. लॉकडाउन लगने के बाद मंडल आठ दिन पैदल चलकर अपने घर पहुंचे थे. इनसे हमारी मुलाकात नोएडा के हरौला मार्केट स्थित लेबर चौक पर हुई.

सुखसागर मंडल के पास में ही खड़े उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले प्रकाश उपाध्याय बीते ढाई साल से अपने गांव नहीं गए. वे हाथ जोड़कर कहते हैं, ‘‘मैं तो भगवान से मनाता हूं कि ये सरकार (बीजेपी) दोबारा न आए. जब से ये सरकार आई है तब हम भूखे मरने को मज़बूर हो गए हैं. यहां सुबह सात बजे आता हूं. काम मिले या न मिले रात को दस-ग्यारह बजे ही घर जा पाता हूं. ऐसा इसीलिए करना पड़ता है क्योंकि लॉकडाउन में कई लोगों का कर्ज हो गया है. कमाई होती नहीं तो वापस नहीं कर पाता. ऐसे में उनके सामने नहीं आना चाहता. डर-डर के जीना पड़ रहा है. ऐसा ही रहा तो किसी दिन मज़बूर होकर आत्महत्या न करनी पड़े.’’

लॉकडाउन की घोषणा के एक साल पूरे होने पर बुधवार की सुबह छह बजे न्यूज़लॉन्ड्री की टीम लेबर चौक पहुंची. एक समय था जब इस लेबर चौक पर सैकड़ों की संख्या में मज़दूर काम की तलाश में आते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद यहां की स्थिति बदल गई है. यहां काम की तलाश में आने वालों के साथ-साथ काम देने वालों की संख्या बेहद कम हो गई.

नोएडा और दिल्ली में कई लेबर चौक बने हुए हैं. जहां मज़दूर काम की तलाश में और काम देने वाले मज़दूरों के लिए पहुंचते हैं.

नोएडा और दिल्ली में कई लेबर चौक बने हुए हैं. जहां मज़दूर काम की तलाश में और काम देने वाले मज़दूरों के लिए पहुंचते हैं.

13 मार्च 2020 तक भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी कह रहे थे कि कोरोना वायरस हेल्थ इमरजेंसी नहीं है. सरकार के मंत्री बार-बार दावा कर रहे थे कि कोरोना महामारी को रोकने के लिए देश पूरी तरह से तैयार है. हालांकि उसके कुछ दिनों बाद ही 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा की गई. जनता कर्फ्यू के दो दिन 24 मार्च की रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में सम्पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी. पहले 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा हुई. फिर इसे कई बार बढ़ाया गया. कुछ मिलाकर 68 दिन भारत में लॉकडाउन लगा रहा.

हाल ही में बीबीसी की एक रिपोर्ट में सामने आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा के लिए किसी दूसरे मंत्रालय से सलाह नहीं ली थी. ना ही अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों से ही सलाह-मशविरा किया गया. इस बात का खुलासा आरटीआई के जरिए हुआ है.

आनन-फानन में लिए गए इस फैसले के बाद लाखों लोग अपने घरों के लिए पैदल ही निकल गए थे. सरकार ने खुद ही लोकसभा में बताया कि लॉकडाउन के दौरान 1.04 करोड़ प्रवासी अपने घर लौटे. इसमें सबसे ज़्यादा प्रवासी उत्तर प्रदेश के थे.

पैदल अपने घरों को लौट रहे कई प्रवासियों की मौत हो गई. मौत भूख, सड़क हादसा और दूसरे अलग-अलग कारणों से हुई. हालांकि जब लोकसभा में मौत के आंकड़ें को लेकर सवाल किया गया तो सरकार ने कहा हमने ऐसा कोई आंकड़ा इकठ्ठा नहीं किया है.

लॉकडाउन लगने के बाद जब लाखों प्रवासी अपने घर लौटे तो उत्तर प्रदेश और बिहार समेत देश की कई राज्य सरकारों ने कहा कि लौटे मज़दूरों को उनके घर पर ही काम दिया जाएगा. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. उन्हें वापस काम की तलाश में शहरों की तरफ भागना पड़ा.

‘सात दिन पैदल चलकर पहुंचे घर, 1.50 लाख का कर्ज हो गया’

मध्य प्रदेश के टीमकगढ़ जिले के रहने वाले परमलाल दीवार पर प्लास्टर करने वाली मशीन लिए खड़े हैं. पास में ही उनकी पत्नी सुनीता देवी भी खड़ी हैं. नोएडा सेक्टर आठ की झुग्गी में दोनों 1500 रुपए किराए के कमरे में रहते हैं. सुबह सात बजे दोनों काम की तलाश में लेबर चौक पहुंच गए थे, लेकिन दस बज जाने के बाद भी उन्हें काम देने वाला कोई नहीं है.

45 वर्षीय परमलाल न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, ‘‘लॉकडाउन के बाद परेशानी बहुत है. काम मिल ही नहीं रहा. जब पहली बार लॉकडाउन लगा तो हम दोनों पैदल ही गांव के लिए निकल गए. सात दिन पैदल चलकर हम गांव पहुंचे थे. रास्ते में कुछ खरीदकर तो कुछ लोगों ने दिया वहीं खाए.’’

परमलाल आगे कहते हैं, ‘‘लॉकडाउन लगने से पहले से ही काम कम हो गया था. जो कुछ बचा था वो खर्च किए. गांव में जाकर कर्ज लेकर रहना पड़ा. डेढ़ लाख रुपए का कर्ज हो गया है. वहां जब कोई काम नहीं मिला तो वापस लौट आए ताकि जिससे कर्ज लिया है वो तो उतार दें लेकिन अब काम ही नहीं मिल रहा है.’’

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