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कोरोना के कहर से लेकर कृषि कानूनों की वापसी तक, ऐसा रहा 2021 का सफर

-द प्रिंट,

हैरां हूं दिल को रोऊं या पीटू जिगर को मैं!…जी हां, ज्यादातर वक्त हमारी सासें दुश्वार किये रखकर अस्ताचल की ओर जा रहे वर्ष 2021 को जब भी और जैसे भी याद किया जाये, मिर्जा गालिब की यह पंक्ति जरूर याद आयेगी.

यह वर्ष आया तो कोरोना की पहली लहर के दिये जख्म हरे थे. भले ही उसका त्रास कम हो गया था, दूसरी लहर के अंदेशे इतने घने थे कि इसके आने की खुशी महसूस होने से पहले ही बंदिशों की कैद में चली गई थी और अब, जब यह जा रहा है, 2022 की अगवानी की खुशी नये वैरिएंट ओमीक्रॉन के साये में गुम है.

ठीक है कि इस साल हमने अपनी अदम्य जिजीविषा से सुरसा जैसी दूसरी लहर को, मध्य फरवरी से शुरू हुए जिसके चार महीने पहली लहर के पूरे साल पर भारी थे, शिकस्त दी, लेकिन उसके हाथों भारी जनहानि के बीच अस्पतालों के अन्दर-बाहर जिन्दगी की मौत से छिड़ी जंग के बीच शवदाह गृहों व नदियों के तटों पर दिखे ‘आदमी को ही मयस्सर नहीं इंसां होना’ वाले हालात अभी भूल भी नहीं पाये हैं कि तीसरी लहर डराने लग गई है.

कृषि कानूनों की वापसी

पिछले साल से ही तीन नये कृषि कानूनों को लेकर राजधानी की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों को गत एक दिसम्बर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द द्वारा विवादित कानूनों की वापसी के लिए संसद द्वारा पारित विधेयक पर मुहर लगा देने और अन्य मांगों पर केन्द्र सरकार से लिखित आश्वासन मिल जाने के बाद खुश-खुश अपने घरों व खेतों को लौटते देखने की खुशी भी अल्पकालिक सिद्ध हुई है.

जैसे उनके आन्दोलन में सात सौ से ज्यादा किसानों की जानें जाने और देश को गत तीस नवम्बर तक हुआ साठ हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा का नुकसान काफी न हो, कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कह दिया है कि सरकार निराश नहीं है और वह पुनः उक्त कानूनों की दिशा में बढ़
ेगी
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