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कर्नाटक के नए पशुवध कानून से आती रोज़गार में कमी

-इंडियास्पेंड,

तमाम परेशानियों के बावजूद शाहिद कुरैशी की सुरमा लगी आंखों में उम्मीदों के कुछ निशान अभी बाकी थे। यह जानते हुए भी कि वह अब कभी अपने पुराने काम पर नहीं लौट पाएंगे।

पूर्वी बेंगलुरु के टेनरी रोड के बूचड़खाने में दशकों से उनके हाथ मांस के इस मुश्किल और मेहनत से भरे काम को अंजाम देते आ रहे थे। काम करते-करते उनकी हथेलियां सख्त और खुरदरी हो गईं हैं। ये उनका पारिवारिक पेशा है, जिसे पहले उनके पिता किया करते थे। जब कुरैशी ने किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखा तो उन्होंने भी इसे अपना लिया।

शिवाजीनगर में शाहिद और कुरैशी समुदाय (एक मुस्लिम उपसमूह) के लिए गोमांस व्यापार आमदनी का एकमात्र जरिया था। एक यही काम है जिसे वह करना जानते हैं। लेकिन 2021 की शुरुआत में कर्नाटक में मवेशियों की हत्या पर पाबंदी लगाने वाले नए कानून के लागू हो जाने के बाद से शाहिद जैसे ज्यादातर लोग बेरोजगार हो गए हैं। कुछ खुशकिस्मत रहे जिन्हें मीट की दुकान पर काम मिल गया है। छह बच्चों के पिता 55 साल के शाहिद ने कहा - "मुझे नहीं पता कि हम कैसे अपना गुजारा करेंगे।"

आमदनी न होने की वजह से उन्होंने अपने तीन बच्चों की पढ़ाई बंद करा दी है।

शाहिद के हमउम्र चचेरे भाई बदर कुरैशी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह कहते हैं, "घर के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं।" उन्होंने आगे कहा, " मेरे पास कोई काम नहीं हैं। मैं खाली बैठा हूं। मेरा बेटा एक मीट स्टॉल में काम करता है। बस उसकी कमाई से गुजारा चल रहा है।" उनके परिवार में एक पत्नी, बेटा, दो बेटियों और एक बड़ी बहन सहित छह लोग हैं, जो अब पूरी तरह से बेटे पर निर्भर हैं।

फरवरी 2021 में कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने कर्नाटक पशु वध रोकथाम और संरक्षण विधेयक- 2020 को लागू किया था। इसने गोमांस में लगे उन लोगों के व्यवसाय को पूरी तरह से खत्म कर दिया जो पहले से ही महामारी की मार झेल रहे थे। पहले भी गोहत्या पर प्रतिबंध था, लेकिन नए कानून में गाय, बछड़े, बैल, सांड और 13 साल से कम उम्र की भैंस की हत्या पर भी रोक लगा दी है।

गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत गायों की हत्या पर पूरी तरह से पाबंदी लगी हुई है। अरुणाचल प्रदेश, केरल, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी गोहत्या पर कानून हैं। लगभग आधे राज्यों में गोहत्या पर रोक लगाने वाले ये कानून तकरीबन 50 साल पुराने हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकाल के समय से चले आ रहे हैं। जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग (राष्ट्रीय गाय आयोग) के अध्यक्ष वल्लभ कथिरिया ने 2019 में इंडियास्पेंड से कहा था, "हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि उन राज्यों में जहां गोहत्या अभी भी वैध है, उन्हें बंद कर दिया जाए।"

भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने 2010 और 2012 (1964 के अधिनियम में संशोधन) में दो विधेयक पेश किए थे। राज्य में सरकार बदलने के बाद 2014 में बिल वापस ले लिए गए थे। वर्तमान में प्रभावी कानून 2012 में पारित किया गया था। कर्नाटक के 1964 के अधिनियम में बैल, सांड और भैंसों के हत्या की अनुमति थी, लेकिन नया कानून ठीक इसके उलट "गाय, गाय के बछड़े और बैल, सभी उम्र के बैल (पूरी तरह से), और तेरह वर्ष से कम उम्र की भैंस की हत्या पर प्रतिबंध लगाता है।"

शोधकर्ता सिल्विया करपगम और सिद्धार्थ के. जोशी ने अपनी नवंबर 2021 की रिपोर्ट में कहा था, "हालांकि अधिनियम में मवेशियों की स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और सुधार का ध्यान रखा गया है। लेकिन 2020 अधिनियम के प्रावधान न केवल राज्य में मीट उद्योग को अपरिवर्तनीय रूप से बरबाद कर देंगे, बल्कि स्वदेशी मवेशियों की आबादी में गिरावट को भी तेज करेंगे।"

बेंगलुरु में इस व्यवसाय से जुडे लोगों ने इंडियास्पेंड को बताया कि कानून के उल्लंघन के लिए सजा और दंड बढ़ाने, गोमांस की परिभाषा का विस्तार करने, अंतरराज्यीय परिवहन पर प्रतिबंध लगाने और पुलिस और अन्य अधिकारियों को मिले विशेष अधिकारों से उनकी आजीविका प्रभावित हुई है। नए कानून से मवेशियों के मांस के कारोबार का अपराधीकरण किया जा रहा है।

भैंस के मीट की कम मांग

नया कानून पारित होने के बाद, कुछ समय तक, शाहिद ने शिवाजीनगर में एक मीट स्टॉल पर काम किया था, जहां उन्हें रोजाना ₹300 से ₹400 मिल रहे थे। लेकिन यह बूचड़खाने में उनकी रोजाना होने वाली कमाई के आधे से भी कम था। कम आमदनी की वजह से उन्हें महीने का ₹2,000 किराया दे पाना भी मुश्किल हो रहा है। वह कहते हैं, "पहले बैल और सांड की हत्या पर कोई रोक नहीं थी। हम मांग के आधार पर एक दिन में लगभग दो जानवरों और कई बार इससे भी ज्यादा का मांस बेच देते थे।"

पशुचिकित्सा विज्ञानी सागरी आर. रामदास कहते हैं कि तमिलनाडु और केरल जैसे कुछ राज्यों में उम्र की पाबंदी है कि गायों और भैंसों को कितने साल का होने पर मांस के लिए काटा जा सकता है, जबकि ज्यादातर राज्यों में भैसों को लेकर ऐसी कोई पाबंदियां नहीं हैं। वह कहते हैं कि कर्नाटक में भैंसों को काटने की उम्र बढ़ाकर 13 साल करना बिल्कुल ही "समझ से परे" है क्योंकि इस उम्र तक पहुंचने से काफी पहले ही भैंस अपनी उपयोगिता खो देती हैं। उनके अनुसार, "जिन राज्यों में गायों को काटने पर सबसे सख्त नियम हैं, वे भैंसों के बारे में कुछ भी नहीं कहते। असल में पंजाब, यूपी, राजस्थान और हरियाणा में तो भैंसों को बिना किसी परेशानी के काटा जा सकता है।"

कुरैशी समुदाय के संगठन, ऑल इंडिया जमीयतुल कुरैश (एआईजेक्यू), कर्नाटक के अध्यक्ष खासिम शोएब-उर-रहमान कुरैशी के अनुसार, कर्नाटक और खासकर बेंगलुरु में भैंस के मीट की कोई मांग नहीं है, जिसे कैराबीफ कहते हैं। उन्होंने कहा," रातों-रात हमारे समुदाय का काम प्रभावित हो गया। रोजाना खाने-कमाने वाले लोग संघर्ष कर रहे हैं।"

साल 2021 में, भारत में 2.41 मिलियन टन गोजातीय मांस का उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया था। ये एशिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा गौमांस निर्यात करने व
ला देश
 है। भारत में, 2019-20 में हुए कुल मीट उत्पादन में गोमांस की हिस्सेदारी 3.6% रही जबकि इसमें भैंस के मीट का योगदान 18.4% रहा। कर्नाटक में कुल मीट उत्पादन में गोमांस की हिस्सेदारी 6.8% और भैंस के मीट की हिस्सेदारी 2% रही।

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