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भारतीय सेंटीमेंट्स और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता ओडीओपी

-आउटलुक,

भारत ने विकासक्रम में अपनी संस्कृति और अध्यात्म की वृहत परम्परा का विकास तो किया ही साथ ज्ञान, विज्ञान, कला तथा उद्यम की ऐसी शैलियों का निर्माण किया जो भारत की विशिष्ट पहचान बनीं। इन शैलियों का उद्भव देशज था लेकिन पहुंच राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय। इसी निर्मित हुयी अर्थव्यवस्था ने भारत में नगरीय क्रांतियों को संपन्न किया और गांवों को भी रिपब्लिक की हैसियत तक पहुंचाया। शायद यही वजह है कि विजेताओं ने उत्पादन की स्थानीय तकनीकों व शैलियों का नष्ट किया और भारत के गांवों को जीतने की निरंतर कोशिश की। अभी हाल ही में जब प्रधानमंत्री मोदी जी ने आत्मनिर्भर भारत के लिए ‘वोकल फार लोकल’ की अनिवार्यता पर बल दिया तो अकस्मात इतिहास के पन्ने मस्तिष्क में पलटते चले गये और आने वाले समय में भारत की वही तस्वीर फिर आकार लेने लगी जिसके लिए महाकवि तुलसी ने कह रहे थे-‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना। आधुनिक आर्थिक शब्दावली में कहें तो सही अर्थों में भारतीय अर्थव्यवस्था के सर्वसमावेशी विकास का माॅडल यही था और यही भारतीय हैपीनेस का आधार।

भारतीय इतिहास के पृष्ठों में प्राचीन की काल के आर्थिक ढांचे को झांक देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि उस दौर में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप सुनिश्चित न होने के बावजूद भारत की गिल्ड्स (शिल्प अथवा व्यवसायिक संघों या श्रेणियों) ने अपने कौशल, अपनी तकनीक और अपने उत्पादों के जरिए विदेशी बाजार में इतनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करायी थी कि पश्चिम के व्यापारी और विचारक विलाप करने के लिए विवश हो गये थे। भारत के सूती वस्त्रों, मोतियों, मणियों से लेकर अस्थियों व धातुओं से बने विभिन्न प्रकार के उत्पादों ने पश्चिमी दुनिया में ऐसी हनक जमायी कि पहली सदी ईसवी के आसपास प्लिनी जैसे यात्रियों को विलाप करते हुए लिखना पड़ा था कि प्रत्येक वर्ष 55 करोड़ सेस्टर्स (रोमन मुद्रा) रोम से भारत की ओर बह जाते हंै। यही व्याकुलता 18वीं-19वीं शताब्दी के कई पाश्चात्य विचारकों व अर्थशास्त्रियों में भी देखी गयी जो अफसोस जताते हुए लिख रहे थे कि यूरोपीय लोगों की भारतीय कपड़ों व वस्तुओं के प्रति आशक्ति यूरोप को कंगाल बना रही है। इस संदर्भ में एक और बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है, वह यह कि अपनी माटी, मां का दिया हुआ मोटा कपड़ा और मोटे अनाज की रोटी ने ही भारत को पूरी तरह से गुलाम नहीं होने दिया। आज की विश्वव्यवस्था और बाजार की प्रतिस्पर्धा को देखते हुए यह आवश्यक हो चुका है कि देशज और पारम्परिक कलाओं, शिल्पों व उत्पादों को भारतीयों के सेंटीमेंट्स से जोड़ते हुए आधुनिक तकनीक व कौशल से सम्पन्न कर गुणवत्तापूर्ण प्रतिस्पर्धी बनाया जाए। यह भारत की मौलिक विशेषता के अनुकूल तो है ही लेकिन कोविड 19 जैसी वैश्विक आपदा ने हमें यह सिखा दिया है कि इकोनाॅमी का यह माॅडल भारतीय लोकजीवन के निकट होने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता व खुशहाली की बुनियादी विशेषताओं से सम्पन्न भी। यहां पर सबसे अहम बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इसे सबसे पहले समझा और वर्ष 2018 में  यूपी दिवस के अवसर पर ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट’ (ओडीओपी) कार्यक्रम के माध्यम से इस इकोनाॅमिक माॅडल की आधारशिला रखी।

ओडीओपी कार्यक्रम क्लासिकल इकोनामिक माडल के नजरिए से देखने से भले ही कुछ खास न लगे लेकिन यह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। दरअसल क्लासिकल इकोनामी दरअसल प्राइस मैकेनिज्म पर चलती है जहां मांग और पूर्ति की शक्तियां केवल लाभ के उद्देश्य से काम करती हैं। जबकि ओडीओपी का मूल सरोकार भारतीय सेंटीमेंट्स से है, इसके बाद पारम्परिक शिल्पों के पुनरुद्धार से और अंत में मार्केट मैकेनिज्म से। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से दिए गये अपने भाषण में ओडीओपी को जगह दी। वित्त मंत्री ने इसे संघीय बजट में स्थान दिया और केन्द्रीय रेल एवं वाणिज्य व उद्योग मंत्री ने स्टेट मिनिस्टर्स के साथ बैठक में इस क्षेत्र में मिशन मोड काम करने की सलाह दी।

अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो यह प्रदेश न आबादी के लिहाज से तो यूरोप के कई विकसित देशों का संयुक्त रूप तो है ही लेकिन भौगोलिक, सांस्कृतिक व एथनिक दृष्टि से भी एक विशिष्ट पहचान रखता है। ये विशिष्टताएं अपनी परम्पराओं, अपनी कलाओं, अपने शिल्पों, उत्पादों आदि के जरिए अपनी निरन्तरता को बनाए रखने के साथ-साथ स्वयं को समृद्ध करती हैं। किसी भी राष्ट्र या उसकी राजनीतिक इकाई के विकास की पटकथा लिखते समय इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि ये लोकजीवन की समरसता और खुशहाली का मूलाधार होती हैं। तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार का ओडीओपी कार्यक्रम आर्थिक समावेशिता के साथ-साथ ईज ऑफ लाइफ का भी आधार बन सकता है? अवश्य।

ओडीओपी कार्यक्रम की सफलता के लिए जरूरी था कि ओडीओपी उत्पादों को मार्केट मैकेनिज्म से जोड़ा जाए। इसके लिए फैसलिटेशन, मार्केटाइजेशन यानि डिजाइनिंग, पैकेजिंग, ब्राण्डिंग की जरूरत थी। इन सबके साथ ही एक जो और सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि इससे जुड़े प्राडक्ट्स को लोगों के सेंटीमेंट्स से जोड़ा जाए जैसे यूरोप में देखा गया है जहां इस तरह के प्रोडक्ट को यूरोपीयों द्वारा सेंटीमेंट के साथ खरीदा जाता है। उदाहरण के तौर पर इस समय बहुत अच्छा अवसर है जब हम चीनी उत्पादों से परहेज कर रहे हैं तब प्रदेश के टेरोकोटा गणेश और लक्ष्मी की मूर्तियों तथा अन्य प्राडक्टस को राष्ट्रीय सेंटीमेंट्स से जोड़ा जा सकता है और चीनी उत्पादों को भारत के देशज उत्पादों द्वारा विस्थापित किया जा सकता है। आने वाली दीवाली इन उत्पादों के लिए बेहतर ‘प्वाइंट आॅफ टाइम’ साबित हो सकती है।

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