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उत्तराखंड: बिगड़ते मौसम, स्मार्टफोन की कमी और खराब इंटरनेट से पहाड़ के बच्चे नहीं कर पा रहे पढ़ाई

-गांव कनेक्शन,

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 175 किलोमीटर दूर टिहरी गढ़वाल जिले के प्रतापनगर ब्लॉक के सरकारी प्राथमिक स्कूलों और जूनियर हाई स्कूलों में लगभग 6500 छात्र प्रारंभिक शिक्षा ले रहे हैं। कोरोना महामारी के दौर में देशभर के स्कूल ऑनलाइन शिफ्ट हो गए हैं। लेकिन, हिमालयी राज्य के इस ब्लॉक में केवल 38 प्रतिशत छात्र ही ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं, जबकि 60 प्रतिशत से अधिक छात्र शिक्षा से वंचित हैं। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी विनोद मातुड़ा ने गांव कनेक्शन को बताया, "6,500 बच्चों में से केवल 2,500 छात्रों को ही ऑनलाइन शिक्षा से फायदा हुआ है। शेष 4,000 छात्र स्मार्टफोन या घरों में तेज इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं होने के कारण पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। "

इसके अलावा कई पहाड़ी गांवों तक मोबाइल फोन टावर पहुंचना ही बाकी है। उन्होंने कहा कि लगातार भारी बारिश और भूस्खलन ने छात्रों की शिक्षा से जुड़ी समस्या को और बढ़ा दिया है। ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ने की समस्या उत्तराखंड के एक ब्लॉक या जिले तक ही सीमित नहीं है। बल्कि छात्रों का एक बड़ा हिस्सा इसका सामना कर रहा है। खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी, सीमित स्मार्टफोन और खराब मौसम की स्थिति ने COVID-19 महामारी में ऑनलाइन स्कूली शिक्षा को छात्रों और शिक्षकों दोनों के लिए एक चुनौती बना दिया है।

विनोद मातुड़ा के कार्यालय ने ब्लॉक में उन छात्रों की संख्या के बारे में जानकारी एकत्र की है जो स्मार्टफोन का उपयोग करके ऑनलाइन स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में बड़ी संख्या में बच्चे सीखने के अवसरों से दूर रहे हैं। उदाहरण के लिए, प्रतापनगर ब्लॉक में प्राथमिक स्तर के कुल 3,480 छात्रों में से लगभग 1,229 (35 प्रतिशत) अपने माता-पिता के स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। उच्च प्राथमिक स्कूलों के मामले में नामांकित 1,340 छात्रों में, 853 (63 प्रतिशत) ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं। कई कामों के बीच उलझे हैं शिक्षक COVID-19 महामारी के समय शिक्षक ऑनलाइन शिक्षा के अतिरिक्त भी कई काम कर रहे हैं। वे कोरोनोवायरस ट्रैकिंग ड्यूटी, सूखे राशन के वितरण आदि में शामिल हैं।

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार की निवासी अनुराधा कुकरेती को जयहरीखाल ब्लॉक के अमोला गांव के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय तक पहुंचने के लिए रोज़ाना लगभग 45 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है जहां वह गांव के बच्चों को पढ़ाती हैं। इस साल मार्च में जब लॉकडाउन लगाया गया और प्रवासी श्रमिकों ने गाँव लौटना शुरू किया, उनके स्कूल को क्वारंटीन सेंटर में परिवर्तित कर दिया गया। उन्हें स्कूल में लौट रहे श्रमिकों की निगरानी के लिए प्रतिनियुक्त किया गया। गांव कनेक्शन से हुई बातचीत में कुकरेती ने कहा, "पहाड़ी जिलों में आने-जाने का एकमात्र साधन जीप है, जो पहाड़ियों के लिए जीवनदान है। लेकिन देशव्यापी तालाबंदी के दौरान ये सड़कें बंद थीं। इसलिए, स्कूल की यात्रा करना एक कठिन कार्य था।"

जहां स्कूल अब ऑनलाइन पढ़ाना शुरू कर चुके हैं, वहीं कुकरेती को अभी भी सप्ताह में दो बार स्कूल जाना पड़ता है। मिड-डे मील के एवज में हर महीने के पहले सप्ताह में स्कूली बच्चों को सूखा राशन बांटने सहित अन्य कामों के लिए उन्हें स्कूल जाना पड़ता है। एक और शिक्षक जयमाला बहुगुणा टिहरी गढ़वाल के तीन गांवों- मेहरगांव, सुपानी और भूपानी के बच्चों की देखरेख करती हैं। उन्होंने कहा,"हमने हर विषय से संबंधित व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं। बावजूद इसके हमें अतिरिक्त अन्य कार्य भी करने पड़ते हैं। जैसे- आने वाले प्रवासियों का प्रबंधन करना या अधिकारियों को COVID-19 से जुडी जानकारी देना। ज्यादातर बार हम पुलिस चौकी, चेक पोस्ट और क्वारंटीन केंद्रों पर पोस्ट किए जाते हैं, जिस कारण शिक्षा का नुकसान होता है।"

उन्होंने बताया कि COVID 19 के कारण B.Sc., M.Sc. या स्नातक अपने गांव लौट आए हैं। हम उनके गांव के स्कूली छात्रों की मदद के लिए उनकी मदद ले रहे हैं। स्कूल में विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षकों ने स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। उत्तरकाशी जिले के रैथल के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में विज्ञान के शिक्षक नितेश बहुगुणा ने कहा कि ऑनलाइन विज्ञान के प्रैक्टिकल सेशन लेना मुश्किल है। उनके स्कूल में कक्षा 9 और कक्षा 10 के 35 छात्र हैं। इनमें से 70 प्रतिशत लड़कियां हैं। उन्होंने बताया कि शिक्षकों के लिए गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान जैसे विषयों को ऑनलाइन पढ़ाना चुनौती है। इन विषयों को पढ़ाने के लिए ख़ास करैक्टर और सिंबल की आवश्यकता होती है। गणितीय समीकरणों को ऑनलाइन नहीं पढ़ाया जा सकता है। शंभु नौटियाल राजकीय इंटर कॉलेज, बनखोली, उत्तरकाशी जिले के हाई स्कूल के बच्चों को विज्ञान पढ़ाते हैं। उन्हें फोन पर छात्रों के प्रश्नों को हल करने में समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

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