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साहित्य में विद्धता और रसिकता को अलग करके देखने का पूर्वाग्रह व्यापक है

-सत्याग्रह,

विद्वत्ता और रसिकता

साहित्य में, साहित्य की आलोचना और अध्यापन में विद्वत्ता को अक्सर सूखी और रसिकता को आर्द्र मानने का पूर्वाग्रह व्यापक है. पर ऐसे मुक़ाम, सौभाग्य से हमारे यहां रहे हैं जब विद्वत्ता और रसिकता किसी एक ही व्यक्ति में, लगभग आवयविक रूप से संलग्न, प्रगट हुए हैं. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आधुनिक आलोचना के परिसर में सबसे पहले हैं. वे अधीत (शिक्षित) विद्वान थे और गहरे रसिक भी. दशकों पहले महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ने ‘कविता का शुक्ल पक्ष’ नाम से डॉक्टर बच्चन सिंह के संपादन में शुक्ल जी द्वारा अपनी आलोचना में उद्धृत कविताओं का एक संचयन प्रकाशित किया था. उसे इधर पलट रहा था तो लगा कि उनकी विद्वत्ता उनकी रसिकता से ही उपजी थी. वे रसिक विद्वान् थे, विद्वान् रसिक थे. यह कहना एक अवांछित सरलीकरण होगा कि शुक्ल जी के बाद विकसित हिन्दी आलोचना अक्सर विद्वत्ता और रसिकता की फांक दिखाती रही है. पर ऐसी फांक है यह सही है. आलोचना में निरी विद्वत्ता से कुछ नयी अवधारणाएं विकसित हुई हैं, जैसे मुक्तिबोध की कई स्थापनाएं. और रसिकता से भी ऐसा हुआ है जैसे विजयदेव नारायण साही की आलोचना में.

इन दिनों क्या, पहले भी विद्यानिवास मिश्र को आलोचक मानने में कुछ संकोच रहा है क्योंकि आलोचना में पिछले आठेक दशक से नितान्त समसामयिक से प्रतिकृत आलोचना ही मान्य और विचारणीय रही है. विद्यानिवास जी ने संस्कृत साहित्य और मध्यकाल पर ही मुख्यतः लिखा. यह काफ़ी था उन्हें हाशिये पर डाल देने के लिए. बालकृष्ण शर्मा नवीन, अज्ञेय आदि पर भी उन्होंने विस्तार से विचार किया है पर इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ा. लगभग 13 वर्ष पहले प्रकाशित उनके लेखों और टिप्पणियों का एक संग्रह देख रहा हूं ‘साहित्य के सरोकार’. उसमें विद्वत्ता और रसिकता का अद्भुत मेल है. उसमें ‘आधुनिक साहित्य का आस्वाद’ शीर्षक लेख में भारतेन्दु हरिश्चन्द के एक निबन्ध ‘अद्भुत अपूर्व स्वप्न’ का विवरण और विवेचन है.

भारतेन्दु इसमें एक अपूर्व पाठशाला स्थापित करने की बात करते हैं जिसमें वे कहते हैं कि ‘हम अपने इष्टमित्रों की सहायता को कभी न भूलेंगे कि जिनकी कृपा से इतना द्रव्य आया कि पाठशाला का सब ख़र्च चल गया और दस-पांच पीढ़ी तक हमारी संतान के लिए बच रहा. हमारे पुत्र-परिवार के लोग चैन से हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे.’

‘… भारतेन्दु ने इस पाठशाला में जिन अनेक उद्दण्ड पंडितों को ‘हिमालय की कन्दराओं में से खोज-खोजकर’ नियुक्त किया उनमें से कुछ ‘मुग्धमणि शास्त्री, पाखंडप्रिय धर्माधिकारी, प्राणांतक प्रसाद वैद्यराज, लुप्तलोचन ज्योतिषाभरण, शीलदावानल नीतिदर्पण हैं’ मिश्र जी बताते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के लेख में सबसे मार्मिक उक्ति है, ‘कुछ मेह कुछ गंगाजल, काम आपकी कृपा से भलीभांति हो गया.’

द्विजदेव की कविता पर अपने विचार का समापन मिश्र जी इस तरह करते हैं: ‘.... रीतिकालीन काव्य रचना को सजगता की देवी के साथ इस तरह जोड़ना सचेत काव्य कला के युग का समारंभ है. इसका विकास हम हिन्दी के उत्तरवर्ती कवियों में पाते हैं, चाहे वे निराला हों, अज्ञेय हों या देवता के नाम से कतराने वाले शब्द की महासत्ता को प्रतिष्ठित करने वाले और भी आगे के कवि.’

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