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प्रवासी मजदूरों के संकट पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया, केंद्र और राज्यों को मुफ्त खाना, आश्रय और परिवहन देने का कहा

-द प्रिंट, 

मजदूरों के संकट में हस्तक्षेप करने से मना करने के कई हफ्तों बाद सुप्रीम कोर्ट ने ‘देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्याओं और दुखों’ का स्वत: संज्ञान लिया.

जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कौल और एम आर शाह की खंडपीठ ने मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लिया, जिसमें प्रवासी मजदूरों के पैदल चलने और सैकड़ों किलोमीटर साइलकिल चलाकर घर वापस जाने को दिखाया गया था.

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर उसे समाज के विभिन्न वर्गों से पत्र और अभ्यावेदन प्राप्त हुए हैं.

पीठ ने अपने आदेश में उल्लेख किया, ‘वे उन स्थानों पर, जहां वे फंसे हुए थे या जिस तरह से वे पैदल, साइकिल या परिवहन के अन्य साधनों पर आगे बढ़े थे, उन स्थानों पर प्रशासन द्वारा भोजन और पानी उपलब्ध नहीं कराने की शिकायत की गई है.’

इसके बाद अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को इन प्रवासियों को तुरंत ‘पर्याप्त परिवहन व्यवस्था, भोजन और आश्रय’ मुफ्त प्रदान करने का आदेश दिया.

अदालत ने यह भी कहा कि भले ही केंद्र और राज्य सरकारों ने उपाय किए हों, लेकिन ‘अपर्याप्तता और कुछ खामियां रहीं.

आदेश में कहा गया, ‘हम मानते हैं कि स्थिति से निपटने के लिए प्रभावी केंद्रित प्रयासों की आवश्यकता है.’

अदालत ने केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन को नोटिस जारी कर अपनी प्रतिक्रियाएं जल्द से जल्द प्रस्तुत करने को कहा.

इसने कहा कि वह 28 मई को मामले की सुनवाई करेगा, और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को अदालत की सहायता करने और केंद्र सरकार द्वारा अब तक उठाए गए सभी कदमों के बारे में सूचित करने का निर्देश दिया.

प्रवासियों की ‘निगरानी’ नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई को मजदूरों से जुड़ी एक याचिका खारिज कर दी थी. उसके 10 दिनों के बाद कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है.

जस्टिस एल नागेश्वर राव, एस के कौल और बी.आर. गवई ने तब कहा था कि उसके लिए स्थिति को ‘मॉनिटर’ करना संभव नहीं.

बेंच ने कहा था, ‘हम कैसे उन्हें पैदल चलने से रोक सकते हैं? कोर्ट के लिए ये असंभव है कि इस बात को मॉनिटर करे कि कौन चल रहा है और कौन नहीं?’

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