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सोशल मीडिया की बुराइयों से निपटने के लिए अच्छाई को उसी का उपयोग करने की तरकीबें सीखनी होंगी

-सत्याग्रह,

घृणा का भूगोल

इस पर, बार-बार अनेक क्षेत्रों में, चिन्ता बढ़ रही है कि भारतीय समाज में घृणा और भेदभाव लगातार फैल रहे हैं. हमारा समय इस मामले में लगभग अभूतपूर्व है कि उसमें घृणा, भेदभाव, हत्या और हिंसा को उचित मानने वाले इतने अधिक हो गये हैं. यह भी पहली बार है कि इन वृत्तियों को फैलाने के साधन बहुत बढ़ गये हैं, अत्यन्त सक्षम हैं और उनकी पहुंच हमारी जनसंख्या के बड़े भाग तक हो गयी है.

हाल में बेहद लोकप्रिय और मनलुभावन फेसबुक को लेकर जो विवाद हुआ है उससे यह स्पष्ट है कि इस मंच को राजनैतिक और नैतिक रूप से तटस्थ मानना सरासर भूल है. और यह भी कि ऊपर जिन अभद्र-असामाजिक-अमानवीय वृत्तियों का ज़िक्र किया गया है उन्हें फैलाने में भी उसकी दुर्भाग्यपूर्ण और अलोकतांत्रिक भूमिका है. फेसबुक के मालिकों ने अपने बचाव में जो दलीलें दी हैं वे बेहद लचर हैं और यह स्पष्ट हो रहा है कि बिना किसी औचित्य और जवाबदेही के यह मंच सत्तारूढ़ शक्तियों का पक्षधर बन गया है और उसके हितसाधन में संलग्न भी है.

एक और पहलू उभरता है जिस पर विचार करना चाहिये. फ़ेसबुक जैसे माध्यम यह आकलन करके ही बाज़ार में आते हैं कि वहां किस तरह की वृत्तियां लोकप्रिय हैं और फैल सकती हैं. भले वह इसे स्वीकार न करे, पर फ़ेसबुक ने घृणा और भेदभाव के पक्ष में जो कुछ किया, वह इस आकलन पर आधारित है कि भारतीय समाज में घृणा और भेदभाव तेज़ी से फैल रहे हैं और फैलाये जा सकते हैं. इस आकलन के आधार पर ही वह सक्रिय हुई है. इससे फ़ेसबुक की बुनियादी अनैतिकता तो उजागर होती ही है, यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में इन दुष्प्रवृत्तियों की चपेट में है और सत्तारूढ़ राजनीति उसका चतुर नियोजन अपने लिए कर रही है.

गनीमत यह है कि फेसबुक पर इनका विरोध करने वाले भी मौजूद हैं और इस माध्यम की व्याप्ति को देखते हुए हमें पहले आज़मायी ‘दुश्मन के मंच का इस्तेमाल’ करने की जुगत पर लौटना चाहिये. घृणा और भेदभाव को, किसी हद तक, प्रेम और सद्भाव की लगातार आक्रामक अभिव्यक्ति से संयमित किया जा सकता है. यह एक अनैतिक विडम्बना है कि हम ऐसे मंच का इस्तेमाल करें जो अनैतिक के पक्ष में सक्रिय-सचेष्ट है. लेकिन सत्तारूढ़ राजनीति ने गाली-गलौज करने वाली ट्रोलर्स की जो बड़ी टीम बनायी है वह भी इसी मंच का इस्तेमाल कर रही है. उनकी संख्या अपार लगती है. पर जो भी हो, प्रेम और सद्भाव को हिम्मत नहीं हारना चाहिये, न उम्मीद छोड़नी चाहिये.

नीचता की बेहद

सार्वजनिक जीवन में गिरावट, नैतिक और आध्यात्मिक गिरावट, राजनैतिक और सामाजिक गिरावट, थमने का नाम नहीं ले रही है. गिरावट-चौतरफ़ा है: राजनीति, सत्ता, मीडिया आदि सब इस गिरावट को तेज़ और गहरा करने में होड़ लगाये हुए है. और न्यायालय और अन्य संवैधानिक संस्थाएं इस गिरावट को रोकने के बजाय उसे बढ़ाने और कुतर्क से वैध ठहराने की होड़ में हैं. कोविड मामलों का आंकड़ा पचास लाख के पार जा चुका है, बेरोज़गारी का प्रतिशत ऐतिहासिक होने जा रहा है, लेकिन सप्ताहों से हमारे बड़े टेलीविजन चैनल एक फ़िल्मी अभिनेता की आत्महत्या को सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में पूरी नीचता से व्यस्त हैं. यही नहीं, जैसा कि सर्वथा प्रत्याशित था, बिहार के चुनावों में इस आत्महत्या को एक मुद्दा बनाने की ओर क़दम उठाये जा रहे हैं. नीचे गिरने की, लगता है, हमारे सार्वजनिक जीवन में कोई हद नहीं रह गयी है: सत्ताकामी और उसकी पिछलग्गू शक्तियां नीचता की हर हद को पार करने की ओर पूरे आत्मविश्वास और आक्रामता से बढ़ रही हैं. झूठ, झांसा, दुचितापन, वाक्हिंसा, निराधार लांछन आदि नयी राजनीति का स्वभाव बन गये हैं. उसके लिए किसी तरह की भी नीचता जायज़ है जिससे कोई हित सधता हो.

किसी भी क़ीमत पर सफल होने की होड़ में फंसा मध्यवर्ग, जो किसी तरह के नैतिक बोध से शून्य होने को अपनी भारतीयता की पहचान मानने लगा है, नीचता के इस रौरव में मुदित मन शामिल रहा है. अलबत्ता इसके कुछ चिह्न उभर रहे हैं कि उसके कुछ हिस्से का, ख़ासकर बेरोज़गार पढ़े-लिखे नौजवानों का, अब मोहभंग हो रहा है: पुण्यनगरी इलाहाबाद में उनका एक जुलूस थालियां बजाकर रोज़गार की मांग करते निकला है, कोविड महामारी को भगाने के लिए एकजुटता दिखाने के लिए नहीं. यह असन्तोष निश्चय ही बढ़ेगा. घृणा से पेट नहीं भरता और भेदभाव से रोज़गार नहीं मिलता या चलता.

जो विकल्पहीनता बार-बार बतायी जाती और बिना किसी सूक्ष्म विश्लेषण के, स्वीकार की जाती रही है वह हो सकता है कि अब मिटने के करीब है. सवा सौ करोड़ से अधिक आबादी वाला इतना बड़ा देश, इतनी बड़ी सभ्यता विकल्पहीन नहीं हो सकते. विकल्प तो उभर के रहेगा. बल्कि शायद कई विकल्प होंगे. पर उन्हें कारगर होने के लिए कोमल घृणा और कोमल भेदभाव का आसान रास्ता छोड़ना होगा. उनका काम उन मुद्दों पर फिर राजनीति को केन्द्रित करने का होना चाहिये जो ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, लोक स्वास्थ्य आदि के हैं. आज मानवीय नियति सारे संसार में घृणा-भेदभाव-हिंसा द्वारा निर्धारित की जा रही है. उसका भारत में एक अहिंसक सत्याग्रही प्रतिरोध उभरना चाहिये. हमें किसी महानायक की प्रतीक्षा नहीं है. हमें तो साधारण की गरिमा और पहल का इन्तज़ार है जो गिरावट को थाम ले.

आधुनिकता और हिंसा

इन दिनों आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता पर कम बात होती है. यह कुछ ऐसा है कि मानो दोनों ही बीत चुकी वृत्तियां हैं. उनकी जगह क्या है, क्या आ गया है यह बहुत स्पष्ट और व्यापक रूप से मान्य नहीं हुआ है. हमारा समय कुछ इस क़दर उलझा और उलझाने वाला है कि उसे किसी केन्द्रीय वृत्ति से परिभाषित करना बहुत कठिन है. इसमें कोई सन्देह फिर भी नहीं हो सकता कि यह समय बेहद हिंसक है. भारत में अधिक, पर अन्यत्र भी कम नहीं. हिंसा की विचित्र और कई बार अप्रत्याशित दुर्भाग्यपूर्ण निरन्तरता मानवीय विकास में है.

आधुनिकता जब पश्चिम में अपने चरम पर थी और सोचने-रचने के सभी पारम्परिक स्थापत्य ध्वस्त किये जा चुके थे तब वहां दो विश्वयुद्धों, नाज़ीवाद, फ़ासीवाद और सोवियत साम्यवाद के विविध रूपों में हिंसा का ताण्डव हुआ, दशकों चला. हिंसा इतनी अधिक व्यापी कि करोड़ों लोगों का नरसंहार हुआ. आधुनिकता को इसका दुश्श्रेय है कि उसके अन्तर्गत पहले दो विश्वयुद्ध हुए और इतना भीषण नरसंहार हुआ. यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि आधुनिकता के मूल में जो मुक्ति का स्वप्न था वह क्यों और कैसे हिंसा के रौरव में बदल गया? उसने मुक्ति के नाम पर परतंत्रता के नये संस्करण कैसे प्रस्तुत और पुष्ट किये? यह भी याद रहना चाहिये कि आधुनिकता का एक वैकल्पिक अहिंसक संस्करण महात्मा गांधी ने भारत में विकसित किया और इतिहास में सम्भवतः सबसे विकराल औपनिवेशिक साम्राज्य का अन्त शुरू किया. इस का स्पष्ट आशय यह है कि आधुनिकता से व्यापक मुक्ति, बिना हिंसा और नरसंहार के, संभव थी.

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