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काम जारी है

-कारवां, 

फुर्सत के नायाब पल में पांच दिसंबर 1956 की रात भीमराव आंबेडकर दिल्ली के अलीपुर रोड स्थित अपने किराए के मकान में रेडियोग्राम पर बज रही बौद्ध प्रार्थना को सस्वर दोहरा रहे थे, “बुद्धम शरणं गच्छामि, धम्म शरणं गच्छामि, संघम शरम् गच्छामि” कि तभी उनका रसोइया डिनर के लिए आने को कह कर उनका ध्यान-भंग करता है. उन्हें थोड़ा-सा चावल खाने के लिए बहुत मान-मनौव्वल करना पड़ता था. डाइनिंग टेबल तक आने के दौरान आंबेडकर अपनी लाइब्रेरी के पास ठिठक जाते और रात में पढ़ने के लिए कुछ किताबें चुनते. केंद्र सरकार के एक स्टाफ नानकचंद रततू, उनके सचिवालय के काम में सहयोग करते रहे थे, देर रात तक ही वहां से रुखसत हो पाते थे. 1952 में केंद्रीय विधि मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद उनका सरकारी स्टाफ उनके पास नहीं रह गया था. आंबेडकर ने रत्तू को निर्देश दिया कि वह टाइप किए गए कागजात को अगली सुबह ही प्रकाशन के लिए भिजवा दें. इन कागजातों में उनकी शीघ्र प्रकाशित होने वाली किताब ‘दि बुद्धा एंड हिज धम्मा’ की प्रस्तावना और परिचय भी संलग्न था.

आंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता अपनी आत्मकथा में याद करती हैं कि वह “अपने जीवन के अंतिम क्षण तक” लेखन में तल्लीन थे. चूंकि उस समय तक फोटोकॉपी की सुविधा नहीं थी, वह बताती है, उन्हें अपने शोध अनुसंधान के लिए दुर्लभ किताबों की हाथ से लिखी या टाइप की हुई कॉपी पर निर्भर रहना होता था. “उन्हें लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी से कुछ किताबों की टंकित प्रतियां मिल गई थीं,” सविता आंबेडकर लिखती हैं, “ज्ञान के लिए उनकी अधीरता आवेशपूर्ण थी और इसका कोई सानी नहीं था.”

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, गिरती सेहत और बेशुमार राजनीतिक प्रतिबद्धताओं की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद आंबेडकर अपने लिखने के लिए थोड़ा समय निकाल ही लेते थे और अपनी चार महत्वाकांक्षी किताबों के ड्राफ्ट को दोहराते थे. बाद में ये किताबें, दि बुद्धा एंड हिज धम्म्, बुद्धा एंड कार्ल मार्क्स, रिवॉल्यूशन एंड काउंटर रिवॉल्यूशन इन एनशिएंट इंडिया और रिडल्स इन हिंदुइज्म के नाम से प्रकाशित हुईं. सविता आंबेडकर ने ऐसी 18 किताबों की एक सूची दी है, जिनकी तैयारी किसी न किसी स्तर पर चल रही थी. उन्होंने कहा, “कुछ तो बिना शीर्षक के किताबों के अध्याय हैं, जबकि कुछ आलेख उनके श्रृंखलाबद्ध विचारों के आधार पर तैयार किए गए हैं.” वह अपनी आत्मकथा के लगभग 80 पेज लिख चुके थे. इसका शीर्षक थावेटिंग फॉर ए वीजा. यह किताब उनकी जन्म शताब्दी (1990) के अवसर पर प्रकाशित की गई. आंबेडकर ज्योतिराव फुले, सायाजीराव गायकवाड और मोहनदास गांधी पर भी किताबें लिखने की योजना बना रहे थे.

वह अक्सर रात में देर तक लिखने-पढ़ने का काम करते रहते. रत्तू ने इस अवधि के अपने संस्मरण लास्टफ्यू ईयर्स ऑफ आंबेडकर में लिखें हैं. इसमें उन्होंने आंबेडकर को अपनी किताबों की पांडुलिपियों पर घंटों काम करने के तनावों और फिर इनके प्रकाशनों के लिए संभावित प्रकाशकों से संपर्क करने के निरंतर प्रयासों के बारे में बताया है. रत्तू के मुताबिक, बुद्धा एंड हिज धम्म-जिसका मौलिक शीर्षक “बुद्धा एंड हिज गॉस्पल” था- उनकी पहली वरीयता थी और वह इसे अपने जीवनकाल में प्रकाशित होते देखना चाहते थे. इसको तैयार करना एक “जबर्दस्त और काफी दुष्कर काम था, जिसको मुझे अकेले ही करना था. मैं हमेशा आधी रात के बाद ही घर लौट पाता था.” रत्तू लिखते हैं, “टाइप की गई किताब में सुधार किया गया, दोबारा सुधार किया गया, उनका पेज नंबर दिया गया, संशोधन के बाद बढ़े हुए पृष्ठों के नंबर फिर से बदले गए, पैराग्राफ के नंबर दिए गए, संशोधन के बाद फिर उस नंबर को बदला गया. कभी-कभी कुछ पंक्तियां या किसी पैराग्राफ को कैंची से काटा गया और उन्हें इसके उपयुक्त स्थानों पर चिपकाया गया.”

रत्तू याद करते हैं, किस तरह हुआ वह रोजाना 25 किलोमीटर साइकिल चलाकर अपने घर से ऑफिस और फिर अलीपुर रोड जाते थे. चाहे जाड़ा हो, गर्मी, बरसात, आंधी-तूफान, बिजली कड़क रही हो या बादल गरज रहे हों, मुझे हर हाल में अपना ऑफिस करने के बाद पहुंचना ही पड़ता. रविवार और छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह ही वहां पहुंचना पड़ता और उनकी किताबों के लिए हाथ से लिखे ढेर के ढेर कागजों को टाइप करना पड़ता, उनकी चिट्ठियों का जवाब देना पड़ता, रोजमर्रे के ऑफिस के काम के बाद, इन सब के अलावा उनकी देखभाल भी करनी पड़ती थी. 5 दिसंबर की रात वह 5 दिनों में पहली बार अपने घर गए थे.

पांच साल के कठिन परिश्रम के बाद दि बुद्ध एंड हिज धम्म किताब मार्च 1956 में पूरी हो गई थी लेकिन आंबेडकर इसके प्रकाशन पर होने वाले 2000 रुपए का खर्च जुटा नहीं सके. उन्होंने इतनी रकम के इंतजाम के लिए मुंबई के दोराबजी टाटा ट्रस्ट को बार-बार चिट्ठी लिखी, जो इस किताब के संभावित प्रकाशक थे. “मिस्टर टाटा अब लौट आए हैं और इसीलिए आपको उनसे बातचीत करने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती है,” आंबेडकर ने 17 मार्च को मिस्टर मसानी को एक चिट्ठी लिखी, जो उस समय टाटा इंडस्ट्रीज के चेयरमैन थे, “मैं बहुत जल्दी में हूं” इसलिए अगर मेरे अनुरोध को टाटा ने मानने से इनकार कर दिया तो फिर “अपना कटोरा ले कर दूसरे दरवाजे पर जाना पसंद करूंगा.” मसानी ने इसका जवाब दिया कि ट्रस्ट इस किताब को नहीं छाप सकता. अलबत्ता ट्रस्ट इसके लिए आर्थिक सहायता देगा. इसके दो महीने बाद आंबेडकर को 3000 रुपए का एक चेक मिल गया. 

जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने उस साल गौतम बुद्ध की 2500वीं जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में कुछ कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए एक कमेटी का गठन किया था. इसके मद्देनजर आंबेडकर ने नेहरू को अपनी किताब ‘दि बुद्ध एंड हिज धम्म’ की 500 प्रतियां खरीदने और उन्हें राज्यों के पुस्तकालयों और भारत आने वाले विश्व के नेताओं को भेंट स्वरूप यह पुस्तक देने के लिए एक पत्र लिखा. नेहरू ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उन्होंने लिखा, “हमने गौतम बुद्ध की जन्मशताब्दी पर प्रकाशित करने के लिए कुछ निश्चित राशि का ही आवंटन किया है, वह सब खर्च हो गई है बल्कि उससे ज्यादा ही खर्चा हो गया है.” आखिरकार इसके एक साल बाद आंबेडकर की वह किताब पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी (पीईएस) द्वारा प्रकाशित की गई, जिसकी स्थापना स्वयं आंबेडकर ने 1945 में की थी और  इसकी देखरेख का जिम्मा पीईएस द्वारा संचालित सिद्धार्थ कॉलेज के लाइब्रेरियन एसएस रेगे को सौंप दिया था.

डॉ आंबेडकर की 6 दिसंबर 1956 को सोई हुई अवस्था में ही मृत्यु हो गई. उनके निधन के बाद उनके अप्रकाशित लेखन के विशाल भंडार को यातनापूर्ण जीवन जीना पड़ा. उनकी पांडुलिपियां वर्षों उनके अलीपुर बंगले में पड़ी रहीं, जब तक कि सविता आंबेडकर को उन कागजातों के साथ वहां से बेदखल नहीं कर दिया गया. फिर यह धरोहर सरकार की निष्ठुर निगहबानी में रही. आंबेडकर के सगे-संबंधियों और उनके समर्थकों, जैसे जीबी वनसोड और जेवी पवार ने सरकार और न्यायपालिका में दरखास्त देकर उन दस्तावेजों को देश के सामने लाने की अपील की. तब कहीं जा कर महाराष्ट्र सरकार ने डॉ बाबा साहेब आंबेडकर के निधन की चौथाई सदी बाद उनके लेखों और भाषणों के संग्रह-संकलनों की डॉ बाबासाहेब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज (बीएडब्ल्यूएस) श्रृंखला 1982 में जारी करना शुरू किया. इस धारावाहिक प्रकाशन का तात्पर्य आंबेडकर की उन पुस्तकों को सामने लाना था, जिन्हें वह अपने जीवनकाल में प्रकाशित नहीं कर सके थे. साथ ही, पहले से प्रकाशित किताबों और लेखों के संग्रह जो पहले से पाठकों के बीच मौजूद तो थे, लेकिन उनकी प्रतियां धीरे-धीरे खत्म हो रही थीं, वे एक-एक कर मुद्रण से बाहर हो रही थीं और इसलिए उनका पुनर्प्रकाशन करना आवश्यक था. यह काम अधूरा पड़ा हुआ है.

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