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भारत में अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई समाज सुधार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी

-जनज्वार,

हमारे देश में धर्म व अंधविश्वासों का साथ चोली दामन की तरह है। उनके बीच फर्क की लकीर अब बेहद महीन व धुंधली सी हो गई है, अंधभक्ति के खिलाफ बोलना भी सामूहिक जुर्म करने वालों के खिलाफ जैसा जोखिम भरा काम है। हमारे देश में पढ़े लिखे लोग भी तकदीर संभालने के लिए अंगूठी पहन लेते हैं। शराब के ठेके व बार उद्घाटन के मौके पर धर्मगुरु बुला लिए जाते हैं और वह अपने धर्मग्रंथ समेत आकर पाठ करके दान दक्षिणा लेकर चले जाते हैं। कुछ साल पहले चंडीगढ़ में बार के उद्घाटन समारोह के बाद लोगों को सूचना मिली कि धर्म ग्रंथ शराबखाने में रखा है, उस पर वहां बड़ा तमाशा मच गया बाद में माफी मांगने पर मामला शांत हुआ। धर्म के इन फरेबी दुकानदारों द्वारा धार्मिक कर्मकांडो के जरिए धर्म का ऐसा विकृत स्वरूप प्रदर्शित करते हैं,और हमारा अंधभक्त समाज जिसमें शिक्षित धनवान प्रशासनिक अधिकारी और यहां तक कि वैज्ञानिक भी शामिल हैं उसे ही कर्मकांड मान लेता है। ऐसी धार्मिकता किस काम की है जो बुराई का साथ दें।

सच को नजरअंदाज और अंधविश्वास को बढ़ावा धर्म की दुकानदारी करने वाले पंडित पुरोहित यह नहीं देखते कि वह किस के बुलावे पर कहां और क्या करने जा रहे हैं उन्हें सिर्फ अपनी दान-दक्षिणा झटक कर जेब गर्म करने से मतलब होता है। धर्म के दुकानदार सत्य व अहिंसा की दुहाई तो देते हैं लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए, उनकी बुनियाद तो गढ़े हुए भगवान के झूठ पर टिकी रहती है अपने मतलब के लिए तो वे हिंसा करने से भी बाज नहीं आते हैं इसलिए आए दिन बहुत ही चौंकाने वाली घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती रहती है। सदियों से धर्म के दुकानदारों को अपनी पोल खुलने का खतरा बराबर बना रहता है। वे यह भी जानते हैं कि अगर भोली भाली जनता ने जागरूक होकर अपने दिमाग के दरवाजे खोल लिए तो उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी इसलिए वे जनता को जगाने वालों को हमेशा अपना दुश्मन समझते हैं,ऐसे लोगों को भी अधर्मी बता कर वे लोगों को उकसाते हैं साथ ही उनके गुरगे अंधविश्वासों की पोल खोलने वालों पर जानलेवा हमले भी करते रहते हैं मामला लाखों का नहीं अरबों का है सारे धर्म दुनिया भर में एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।

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