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रिकवरी बढ़ने से चीनी मिलों को सालाना 3000 करोड़ अतिरिक्त फायदा हुआ, जबकि किसानों के लिए गन्ने का एसएपी था फ्रीज

-रूरल वॉइस,

उत्तर प्रदेश में 2018-19 से 2020-21 तक तीन पेराई सत्र में चीनी मिलों को गन्ने में एक से दो फीसदी अतिरिक्त रिकवरी से हजारों करोड़ रुपये का फायदा मिला है। एक सीजन में एक फीसदी अतिरिक्त रिकवरी से ही चीनी मिलों का अतिरिक्त फायदा 3,000 करोड़ रुपये बनता है। इन तीन वर्षों में मुख्य मंत्री  योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने  गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) नहीं बढ़ाया था, जबकि  इसके उलट किसानों के लिए गन्ने की  उत्पादन लागत जरूर बढ़ गई थी। हालांकि चुनावी साल में उत्तर प्रदेश सरकार ने राजनीतिक मजबूरी के चलते चालू पेराई सीजन (2021-22) के लिए एसएपी में 25 रुपये की बढ़ोतरी कर इसे 350 रुपये प्रति क्विंटल किया है।

राज्य में गन्ने में चीनी की रिकवरी 2017-18 के 10.84 फीसदी से बढ़कर 2019-20 में 11.73 फीसदी और 2020-21 में 11.46 फीसदी रही। राज्य में चीनी मिलों ने पेराई सत्र 2018-19 में 10.31 करोड़ टन,  2019-20 के पेराई सीजन में 11.18 करोड़ टन और 2020-21 में 10.27 करोड़ टन गन्ने की पेराई की थी। प्रति क्विंटल गन्ने से एक किलो चीनी की अतिरिक्त रिकवरी का मतलब है चीनी की मिनिमम सेल प्राइस (एमएसपी) पर 3,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई होना। 14 फरवरी, 2019 को जारी चीनी कीमत (नियंत्रण) आदेश, 2018 के अनुसार चीनी का एमएसपी 31 रुपये प्रति किलो है जबकि इसके पहले यह 30 रुपये किलो था। केंद्र सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत चीनी  जारी अधिसूचना के अनुसार कोई भी चीनी मिल एमएसपी से नीचे की कीमत पर चीनी नहीं बेच सकती है। चीनी के लिए एमसएसपी का प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि कोई भी मिल इससे कम दाम पर चीनी नहीं बेच सके।  इस तरह से मिलों को हर सीजन में 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये तक की अतिरिक्त कमाई हुई है। यह रकम राज्य में गन्ना किसानों को होने वाले कुल भुगतान का करीब दस फीसदी आती है। पिछले एक साल से चीनी की एक्स फैक्टरी कीमत 3400 रुपये से 3600 रुपये प्रति क्विंटल से चल रही है।

असल में राज्य में पिछले पांच साल में गन्ने की नई किस्म सीओ-0238 का क्षेत्रफल तेजी से बढ़ा है। अब यह राज्य के कुल गन्ना क्षेत्रफल के 80 फीसदी को पार कर गया है। कोयंबतूर स्थित गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. बख्शीराम द्वारा विकसित गन्ने की इस किस्म की उत्पादकता तो ज्यादा है ही, इसमें चीनी की रिकवरी भी अधिक है। अधिक उत्पादकता के चलते किसानों को करीब 20 टन प्रति हेक्टेयर का अतिरिक्त गन्ना उत्पादन मिला है। लेकिन इस किस्म के उत्पादन पर किसानों की लागत भी बढ़ी है। अधिक बीमारी लगने की वजह से इसमें पेस्टीसाइड का अधिक उपयोग होता है जिससे किसानों का खर्च काफी बढ़ा है। पेस्टीसाइड कंपनियों ने इसमें उपयोग होने वाले उत्पादों की कीमतों में काफी बढ़ोतरी की है।

बिजली के मद में भी किसानों का खर्च बढ़ा है। पिछले तीन साल में उत्तर प्रदेश सरकार ने बिजली की दरें करीब दोगुनी कर दीं। इसके चलते किसानों का सिंचाई पर खर्च बढ़ा। हालांकि राज्य में चुनाव घोषित होने के दो दिन पहले किसानों के लिए बिजली की दरों को आधा कर दिया गया।

तीसरा बड़ा खर्च पिछले दो साल में डीजल की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी से आया है। इस तरह सीओ-0238 किस्म से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन किसानों की इस अतिरिक्त कमाई का बड़ा हिस्सा गन्ना उत्पादन की बढ़ी लागत में चला गया। दूसरी ओर मिलों को गन्ने में चीनी की अतिरिक्त रिकवरी का फायदा हुआ। एसएपी नहीं बढ़ने के कारण उन्हें तीन पेराई सत्र में गन्ना खरीदने पर कोई अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ा है।

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