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गुजरात मॉडल को भूल जाइए, भविष्य यूपी मॉडल का है

-द वायर,

मानो उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित किशोरी के साथ बलात्कार और प्रताड़ना कम डरावनी थी, पुलिस ने शव को घर ले जाने देने की अपील को खारिज करते हुए रातोंरात सबसे छिपकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया.

बलात्कार का आरोप ठाकुर जाति के चार पुरुषों पर है. यह पूरा वाकया अगड़ी जाति के अहंकार और पुलिस की हृदयहीनता को दिखाता है.

भारत में पुलिस दुर्भावना से भरी हुई और कानून से बेख़ौफ़ हो सकती है और यूपी में तो, विशेष रूप से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में, उनको खुली छूट दे दी गई है, जैसा उस एनकाउंटर में देखा गया, जिसमें अपराधी सरगना विकास दुबे की पूर्वनियोजित तरीके से हत्या कर दी गई.

अब पुलिसकर्मी उनसे ही बगावत करने पर आमादा हैं. पुलिस ने हत्या के मामले में संदिग्ध एक पुलिसकर्मी को निलंबित करने के मुख्यमंत्री के आदेश को नजरअंदाज कर दिया है.

इस बीच, आदित्यनाथ हर मुमकिन तरीके से मुसलमानों को निशाना बना रहे हैं और सभी तरह के असंतोषों को दबा रहे हैं.

डॉ कफ़ील खान खान को गोरखपुर अस्पताल हादसे के दौरान, जिसमें कई बच्चों की मौत हो गई, ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी की ओर इशारा करने के कारण, महीनों तक जेल में बंद रखा गया.

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन करनेवाले अनेक लोगों की संपत्ति जब्त कर ली गई.

आदित्यनाथ शहरों और अजायबघरों का नाम बदलने के काम में लगातार जुटे हुए हैं और अब कारोबारियों को राज्य में निवेश करने के लिए दावत दे रहे हैं.

और उन्हें ऐसा क्यों करना नहीं चाहिए? क्या इंडिया टुडे ने उन्हें लगातार तीन बार भारत का सर्वश्
रेष्ठ मुख्यमंत्री
 घोषित नहीं किया है?

यहां तक कि कारोबारी जगत के लोग अब उन्हें प्रधानमंत्री पद की सबसे अच्छी पसंद के तौर पर भी देख सकते हैं. आखिर, कंपनियों को श्रमिकों को बे-रोकटोक बर्खास्त करने की इजाज़त जो मिल जाएगी.

एक जख्म को और गहरा करते हुए, अब जबकि उस जगह पर एक मंदिर भी बनाया जा रहा है, जहां 400 साल पुरानी मस्जिद को उपद्रवियों ने भाजपा नेताओं के उत्साहवर्धन के बीच जमींदोज कर दिया था, इस मामले के सभी आरोपियों को निर्दोष करार दिया गया है.

अगला पड़ाव काशी है, और इसके बाद मथुरा की बारी आएगी. योगी आदित्यनाथ के आशीर्वाद से ये सारे मंसूबे पूरे होंगे.

हमारी नजरों के सामने जो नया चमकीला उत्तर प्रदेश उभर रहा है, उसका दीदार कीजिए- सवर्ण (उच्च जातीय) असहिष्णु और कारोबारियों का दोस्त.

और इससे पहले कि हम इसे जान पाएं, यह भारत के लिए भी यह एक मॉडल बन जाएगा. गुजरात मॉडल बीते हुए कल की खबर है; आने वाला कल उत्तर प्रदेश मॉडल के नाम होगा.

गुजरात मॉडल कैसे गढ़ा गया, यह याद करना यहां उपयोगी होगा.

गुजरात दंगों, जिसमें हज़ार से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे, नरेंद्र मोदी एक प्रकार से अछूत बन गए थे. वे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (जिन्होंने दो हफ्ते बाद एक पूरी तरह से अलग राग अलापते हुए अप्रत्यक्ष तौर पर गोधरा ट्रेन को आग लगाने और इस तरह हिंदू प्रतिक्रिया की आग की चिंगारी बनने के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया था) के हाथों बर्खास्त होते-होते बाल-बाल बचे थे

मोदी ने अपनी कुर्सी बचा ली, लेकिन भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कई लोगों ने उनका बहिष्कार कर दिया था. भारतीय कारोबारी अपनी आलोचना में कटु थे.

मार्च 2002 में बैंकर दीपक पारेख ने तकलीफ़ से भरकर कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमने एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में अपना नाम गंवा दिया है (हालांकि बाद में उन्होंने भी अपना सुर बदल लिया).’

दूसरे कारोबारियों ने भी निर्मम हत्याओं और लूटपाट पर अपने गुस्से का इजहार किया था. कई देशों ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया. अमेरिका जैसे कुछ देशों ने खुले तौर पर, तो दूसरों ने चुपचाप.

तथ्य यह भी है कि कुछ सालों बाद उनके राजनयिक गुजरात जा रहे थे, उनसे मुलाकात कर रहे थे और निवेश पर चर्चा कर रहे थे. और 2013 में, एक वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में, शीर्ष कॉर्पोरेट मुखिया नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने के लिए एक दूसरे से होड़ ले रहे थे.

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