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उत्तराखंड चुनाव: बंद होते सरकारी स्कूल; निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार

-इंडियास्पेंड,

उत्तराखंड अपनी पांचवी विधानसभा के चुनावों की तैयारियां कर रहा है। देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पिछले 21 सालों में लगभर सामान रूप से सरकारें बना चुकी हैं, लेकिन राज्य के सरकारी स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसो दूर हैं।

आज भी चुनाव के समय अच्छी शिक्षा के लिए जनता से वादे तो किये जाते हैं लेकिन राज्य के विद्यालयों की स्थिति के आंकड़े दिखाते हैं कि सरकारी स्कूलों पर कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया जा रहा है जिसके चलते विद्यार्थिओं का नामांकन कम हो रहा है, और अंत में कम नामांकन के चलते स्कूल बंद कर दिया जाता है।

साल 2012-13 से लेकर साल 2019-20 तक प्रदेश में 846 राजकीय प्राथमिक विद्यालय और 197 राजकीय माध्यमिक विद्यालय बंद हो चुके हैं। लेकिन, इस दौरान निजी प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों में काफी वृद्धि हुई है। साल 2012-13 में इन स्कूलों की संख्या 776 थी लेकिन साल 2019-20 में यह लगभग 280% बढ़कर 2197 हो गयी।

सरकार स्कूलों को बंद करने के पीछे पहाड़ी इलाकों से हो रहे पलायन के कारण घटते नामांकन को जिम्मेदार ठहराती है। लेकिन, मैदानी जिलों जैसे हरिद्वार और देहरादून में बंद हुए सरकारी स्कूलों की संख्या यह दर्शाती है कि घटते नामांकन के पीछे सिर्फ पलायन ही कारण नहीं है।

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012-13 में उत्तराखंड में कुल 12,499 राजकीय प्राथमिक विद्यालय और 2,805 राजकीय माध्यमिक विद्यालय थे जिनकी संख्या वर्ष 2019-20 तक घटकर क्रमशः 11,653 और 2,608 हो गयी। यदि जिलेवार इनकी संख्या देखें तो अल्मोड़ा में 130, बागेश्वर में 39, चमोली में 49, चम्पावत में 28, देहरादून में 57, हरिद्वार में 10, नैनीताल में 17, पिथौरागगढ़ में 130, रूद्र प्रयाग में 41 और टिहरी गढ़वाल में 180 सरकारी प्राथमिक विद्यालय पिछले 10 वर्षों में बंद हो चुके हैं। इसके अतरिक्त उत्तरकाशी में कोई प्राथमिक विद्यालय बंद नहीं हुआ है और उद्यम सिंह नगर में 12 प्राथमिक विद्यालय बढ़े हैं।

इस ही के विपरीत, मैदानी और पर्वतीय सभी जिलों में पिछले 10 सालों में निजी स्कूलों में बढ़ोतरी हुई है|

चमोली जिले के मौणा गांव में रहने वाले नरेंद्र रावत एक किसान हैं और अपने दोनों बच्चों – विवेक और दीपा – की पढाई के लिए चिंतित रहते हैं। विवेक कक्षा पहली में है और दीपा कक्षा पाँच में, दोनों गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं।

"हमारे गांव के प्राथमिक विद्यालय में मात्र छ: बच्चे हैं और एक अध्यापिका है। समस्या यह है कि अध्यापिका को बच्चों को पढ़ाने के अलावा स्कूल के और कार्य जैसे मीटिंग, डाक ले जाना या फिर अन्य सरकारी कार्य भी करने होते हैं। इसके चलते नियमित रूप से बच्चों की क्लास नहीं हो पाती है और इसका खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पडता है," नरेंद्र बताते हैं।

नरेंद्र आगे बताते हैं कि उनकी पूरी आजीविका खेती पर ही निर्भर है और ऐसे में वह अपने बच्चों को निजी स्कूल में चाहकर भी नहीं भेज सकते।

"हमारे ही गांव के कुछ परिवार, जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के लिए हमारे ब्लॉक नारायणबगड़ में किराये पर भी रहते हैं ताकि वह अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दे सके," नरेंद्र बताते हैं।

अभिभावकों का मानना है कि शिक्षा के लिए ज़रूरी सुविधाएँ जैसे कंप्यूटर, शिक्षकों की उचित संख्या, पीने के पानी की उपलब्धता, आदि सरकारी स्कूल की तुलना में निजी स्कूलों ज़्यादा अच्छी होती हैं।

चमोली जिले में ग्राम पाखी के रहने वाले भारत पंवार की 9 साल की बेटी सृष्टि एक निजी स्कूल में कक्षा तीन की छात्रा है जिसकी फीस ₹2,500 प्रतिमाह है।

"अगर सरकारी स्कूलों में भी अच्छी सुविधाएं सरकार उपलब्ध कराये तो हम या कोई भी व्यक्ति प्राइवेट स्कूलों में इतनी ज़्यादा फीस क्यों देना चाहेगा? आज सरकारी स्कूलों में अधिकांश गरीब परिवार के बच्चे होते हैं, वो बच्चे जिनके पास सरकारी स्कूल के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। सरकारी स्कूलों में उचित सुविधाओं के ना होने के कारण सरकारी स्कूलों में लगातार नामांकन कम होते जा रहे हैं," भारत बताते हैं।

क्यों हो रहे हैं सरकारी स्कूलों में बच्चे कम?

महिला समाख्या योजना उत्तराखंड की राज्य परियोजना निदेशक गीता गैरोला इस विषय में बात करते हुए कहती हैं, "बच्चों की संख्या कम है इसलिए स्कूलों को बंद या मर्ज किया गया है लेकिन यहाँ सरकार से सवाल है कि आखिर क्यों सरकारी स्कूलो में बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। यदि बच्चे नहीं हैं तो क्यों निजी स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही है? यदि सरकार चाहती है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़े तो पहले सरकारी स्कूलों के प्रति जनता के नजरिए को बदलना होगा जिसके लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाना होगा।"

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार प्रत्येक विद्यालय के लिए कुछ मानक निश्चित किये गये हैं। इन मानकों के अनुसार प्रत्येक विद्यालय के भवन में शिक्षकों के लिए एक कक्ष, बाधा मुक्त पहुंच, लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय, विद्यार्थिओं के लिए पर्याप्त और स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, जिन विद्यालयों में मध्याह्न भोजन पकाया जाता है वहां रसोई; और एक खेल का मैदान का होना अनिवार्य है।

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