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बदलती विश्व व्यवस्था पर पुतिन का आलेख

-न्यूजलॉन्ड्री,

द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ीवाद के विरुद्ध निर्णायक जीत की 75वीं वर्षगाँठ पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उस महायुद्ध, उसके बाद की दुनिया और वर्तमान वैश्विक स्थिति पर एक विस्तृत लेख लिखा है. उन्होंने बताया है कि क्यों हर साल 9 मई का दिन रूस के लिए सबसे बड़ा दिन होता है और उस विश्व युद्ध से आज हम क्या सीख सकते हैं.

पश्चिमी देशों में इस लेख के महत्व पर चर्चा करने के बजाय पुतिन पर आरोपों का दौर शुरू हो गया है कि रूसी राष्ट्रपति इतिहास को फिर से लिखने का प्रयास कर रहे हैं. पुतिन के लेख को प्रकाशित करते हुए अमेरिकी प्रकाशन ‘नेशनल इंटरेस्ट’ ने भूमिका में उनकी इस बात को रेखांकित किया है कि यूरोपीय राजनेता, विशेषकर पोलैंड के नेता, ‘म्यूनिख़ धोखे’ को बिसार देना चाहते हैं, जिसने सोवियत संघ को यह इंगित किया था कि सुरक्षा के मुद्दे पर पश्चिमी देशों को उसके हितों की परवाह नहीं है.

पुतिन के लेख और पश्चिम की प्रतिक्रिया पर चर्चा से पूर्व रूस के हवाले से वैश्विक राजनीति के समकाल पर एक नज़र डालना ज़रूरी है. प्रभावशाली रूसी विद्वान प्रोफ़ेसर सर्गेई कारागानोव ने एक हालिया लेख में कहा है कि पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों को यह पता नहीं है कि बिना शत्रु के कैसे रहा जा सकता है. पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्त्सिन और वर्तमान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विदेश नीति सलाहकार रहे प्रोफ़ेसर कारागानोव की बात से भले आप असहमत हों, पर जिस प्रकार बरसों से अमेरिका और यूरोपीय देश किसी-न-किसी बहाने रूस पर पाबंदियाँ लगाते रहे हैं तथा राष्ट्रपति पुतिन पर पश्चिमी लोकतंत्रों को संकटग्रस्त करने का आरोप लगाते रहे हैं, उसे देखते हुए यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस रूसी विद्वान की बात पूरी तरह से ग़लत नहीं है.

बहरहाल, यह भी एक सच है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस को जी-7 में शामिल करना चाहते हैं और यूरोपीय संघ रूस से वाणिज्य-व्यापार बढ़ाने की कोशिश में है. इससे स्पष्ट है कि राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में रूस ने वह जगह फिर से हासिल कर ली है, जो सोवियत संघ के पतन के बाद उससे छिन गयी थी. चीन ने प्रगाढ़ मित्रता, अमेरिकी पाबंदियों से घिरे ईरान और वेनेज़ुएला जैसे देशों के साथ खड़ा होना, सीरिया में निर्णायक हस्तक्षेप, ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन के माध्यम से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का प्रभावशाली मंच तैयार करना तथा रूस की रणनीतिक क्षमता को स्थापित करना आदि ऐसे उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रपति पुतिन एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं.

रूस की ऐतिहासिक भूमिका को समझने के लिए प्रोफ़ेसर कारागानोव की यह बात मददगार हो सकती है कि जब भी कोई ताक़त- चाहे वे चंगेज़ खान के वंशज हों, स्वीडन के चार्ल्स बारहवें हों, या फिर नेपोलियन या हिटलर हों- वैश्विक या क्षेत्रीय वर्चस्व की कोशिश करती है, रूस उसके बरक्स खड़ा होता है. आज रूस सैन्य और राजनीतिक प्रभाव के मामले में पर्याप्त सक्षम हैं, लेकिन आर्थिक, तकनीकी और साइबर के क्षेत्र में उसे बाज़ार और बाहरी सहयोगियों की दरकार है, जिनकी तलाश रूस करेगा और उन्हें पाएगा. कारागानोव रूस को अमेरिका व चीन के बीच संतुलन बनाने वाली शक्ति तथा गुट-निरपेक्ष देशों के नए समूह के अगुवा के रूप में भी देखते हैं.

राष्ट्रपति पुतिन ने अपने लेख की शुरुआत में महान बलिदान को मार्मिक शब्दों में रेखांकित करते हुए लिखा है कि उस युद्ध ने हर परिवार के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी है. हम जानते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध में आठ करोड़ के लगभग लोग मारे गए थे, जिनमें आधे से अधिक चीन और सोवियत संघ के थे. लेनिनग्राद की घेराबंदी के दौरान मरे अपने भाई का उल्लेख भी पुतिन ने किया है, जिसकी आयु दो साल थी. उस युद्ध में उनके पिता लड़ते हुए बुरी तरह से घायल हुए थे. इतिहास के महत्व को बताते हुए उन्होंने लिखा है कि वे और उनकी उम्र के लोग यह मानते हैं कि उनके बच्चों और आगामी पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के संघर्ष को समझना चाहिए. पीढ़ियों को यह जानना चाहिए कि नाज़ियों को हराने में सोवियत लोग सबसे आगे थे. लेकिन इससे यूरोप में कई लोगों को मुश्किल है, पर, पुतिन ने लिखा है, कोई भी एक तथ्य को भी ग़लत नहीं साबित कर सका है कि उस युद्ध को किसने और कैसे लड़ा और जीता.

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