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अमेरिका के नए राष्ट्रपति के भारत के लिए मायने

-इंडिया टूडे,

पिछले कुछ महीनों से मथे जा रहे इस सवाल का जवाब मिलने में ज्यादा वक्त नहीं रह गया हैः अमेरिका का राष्ट्रपति कौन होगा-डोनॉल्ड ट्रंप या जो बाइडेन ? नजदीकी मुकाबले की भविष्यवाणी के बीच इंडस्ट्री और पॉलिसी के पर्यवेक्षक नजरें गड़ाए हुए हैं. अभी तक चुनाव पूर्व विश्लेषणों को देखा जाए तो वे डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी जो बाइडेन के पक्ष में जाते दिखते हैं.  

अमेरिका के चुनाव नतीजों का भारतीय कारोबार के लिहाज से क्या महत्व है? ज्यादातर विशेषज्ञ इससे सहमत हैं कि अगर सत्ता परिवर्तन होता है तब भी ट्रंप के दौर में जारी नीतियां यथावत रहेंगी. अगर डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जीत भी जाए तो भी ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति जारी रहेगी जिसे उन्होंने साल 2016 के चुनावों में प्रचारित किया और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (अमेरिका को फिर महान बनाओ)’ जैसे नारे गढ़ दिए. दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज ऐंड प्लानिंग के प्रोफेसर बिस्वजीत धर कहते हैं, “ट्रंप ने अपने ‘अमेरिका फर्स्ट’ अभियान से लंबे समय तक टिके रहने वाला योगदान अमेरिका की राजनीति में दिया है. ऐसे वक्त में जब अर्थव्यवस्था से उछाल गायब है और कोविड-19 की दूसरी लहर की आशंका है, बिडेन इस अफसाने से दूर नहीं जा सकेंगे. ”  

अपने कार्यकाल में ट्रंप ने अमेरिका को बड़ी मैन्युफैक्चरिंग शक्ति बनाने के अभियान में कई बार चीन के साथ व्यापार घाटे का मसला उठाया और इससे दोनों देश करीब-करीब व्यापार युद्ध के नजदीक पहुंच गए. मुंबई के थिंट टैंक गेटवे हाउस की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर मनजीत कृपलानी कहती हैं, “ग्लोबलाइजेशन से चीन को सचमुच फायदा हुआ. वह बहुत शक्तिशाली हो गया. इसने न केवल पुरानी उत्पादन वाली अर्थव्यवस्था में निवेश किया बल्कि तकनीकी वाली अर्थ्व्यवस्था में भी चीन ने पैसा लगाया.” चीन ने अमेरिका और यूरोप में वैश्विकता के तरफदारों को संरक्षण दिया. कृपलानी कहती हैं, "दुर्भाग्य से डेमोक्रेट यथास्थितिवादी बनकर रह गए हैं."  

यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रजेंटेटिव (यूएसटीआर) के दफ्तर के मुताबिक, चीन ने 2019 में अमेरिका से 308.8 अरब डॉलर के ट्रेड सरप्लस का आनंद लिया. जवाब में अमेरिका ने सिर्फ 163 अरब डॉलर की सामग्री और सेवाएं चीन को निर्यात की, लेकिन उसने 471.8 अरब डॉलर के बराबर के सामान और सेवाएं चीन से आयात कीं. 2019 में चीन अमेरिका का तीसरा सबसे बड़ा गुड्स ट्रेडिंग पार्टनर रहा. इसके बाद दोनों देशों के बीच प्रतिबंधों की जंग छिड़ गई. पिछले साल 10 मई को अमेरिका ने 200 अरब डॉलर के चीनी सामान पर टैरिफ 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया. इसका असर चीन से आने वाले इंटरनेट मोडम, राउटर्स, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, फर्नीचर और बिल्डिंग मटेरियल जैसे 5,700 उत्पादों पर पड़ा. वाशिंगटन में चीनी उप राष्ट्रपति लू हे और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटथेजर के बीच लंबी व्यापार वार्ता के बावजूद चीन झुका नहीं. 13 मई को चीन ने अमेरिका से आयात होने वाले सामान पर 60 अरब डॉलर का जवाबी टैरिफ लगा दिया. इसके तहत बीयर, शराब, स्विमसूट, शर्ट, लिक्विफाइड नेचुरल गैस जैसे सामानों पर टैरिफ 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 20-25 प्रतिशत कर दिया. कृपलानी का कहना है, “ट्रंप ने चीन के प्रति हमारी सोच हमेशा के लिए बदल दी. हर कोई समझता है कि चीन के मसले में वापस जाना मुमकिन नहीं.”

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