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आवरण कथाः इतने गुस्से में क्यों है पंजाब

-इंडिया टूडे,

प्रधानमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के ज्यादातर वक्त नरेंद्र मोदी कृषि में धीमे-धीमे बढ़ते सुधारों से संतुष्ट थे. उनके आलोचकों ने उन पर आरोप लगाया था कि जरूरी बदलावों पर निशाना साधने के लिए वे महज एयर राइफल का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके दूसरे कार्यकाल का अभी एक साल भी नहीं हुआ था कि कोविड-19 महामारी के तेजी से बढ़ते प्रकोप के बीच मोदी ने सुधार प्रक्रिया तेज करने का मौका ताड़ लिया.

इस बार उन्होंने एक तरह से तोप निकाली और जून 2020 में अध्यादेश के गोले दाग दिए. उन्हें यकीन था कि ये कृषि क्रांति 2.0 का सूत्रपात करेंगे. इनमें शामिल थे किसानों को अपनी उपज केवल राज्य-नियंत्रित मंडियों में बेचने के लिए मजबूर करने वाली पाबंदियां हटाना, ठेके पर खेती करवाने के लिए कॉर्पोरेट क्षेत्र का रास्ता आसान बनाना और पुराने तथा बेकार हो चुके अनिवार्य वस्तु कानून को खत्म करना.

झटका तब लगा जब सितंबर में उनकी सरकार ने इन अध्यादेशों को कानून में बदलने के लिए इन्हें संसद से हड़बड़ी में पारित करवा लिया. सबसे पहले उनकी खाद्य (प्रसंस्करण) मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने गुस्से में इस्तीफा दे दिया और उनकी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने, जिसका पंजाब में मजबूत जनाधार है और जो दशकों से भाजपा की करीबी सहयोगी पार्टी रही है, सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से रिश्ते तोडऩे का फैसला कर लिया.

पंजाब, जहां किसानों ने हरित क्रांति 1.0 की अगुआई की थी, विद्रोह में उठ खड़ा हुआ. मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की अगुआई में राज्य सरकार ने कृषि उपज बेचने और ठेके पर खेती से जुड़े दो केंद्रीय कानूनों को नकारते हुए राज्य विधानसभा से कानून पारित करवाए. दूसरे कांग्रेस-शासित राज्य भी उन्हीं के रास्ते पर चल पड़े और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ ने कानून के मुख्य हिस्सों को बेअसर करने के लिए अपनी-अपनी विधानसभाओं में प्रस्ताव पेश कर दिए. 

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