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अंतहीन अत्याचार का वह काला दौर - ए. सूर्यप्रकाश

जून का महीना झुलसाती गर्मी के साथ इतिहास की कुछ दर्दनाक यादों को भी दोहराता है। 1975 में 25 जून को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर निरंकुश आपातकाल थोपा था। इसके साथ ही जीवंत लोकतंत्र पर तानाशाही हावी हो गई थी। इस तानाशाही ने न केवल नागरिकों के मूल अधिकार निलंबित किए, बल्कि उन्हें जीवन के अधिकार से भी वंचित किया। यदि हम अपने लोकतांत्रिक जीवन को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमें आपातकाल के घटनाक्रम को याद कर सबक सीखने होंगे। हमें समझना होगा कि 1975 से 1977 के बीच भारत में लोकतंत्र कैसे पटरी से उतर गया। हमें ऐसी कोई सूची बनानी चाहिए कि आखिर आपातकाल रूपी कलंकित अध्याय की कौन-सी बातें हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए और किन वाकयों के लिए जिम्मेदार लोगों को कभी माफ नहीं करना चाहिए?

पहले वे बातें, जिन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। इसमें सबसे पहले तो उन तमाम नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के त्याग एवं बलिदान की बारी आती है जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ मुखरता से संघर्ष किया। इन लोगों में जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, जॉर्ज फर्नांडीस, लालकृष्ण आडवाणी, चरण सिंह, मधु दंडवते, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, रामकृष्ण हेगड़े, सिकंदर बख्त, नरेंद्र मोदी, एचडी देवगौड़ा, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे तमाम नाम शामिल हैं। मार्च 1977 में लोकतंत्र की बहाली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका पर भी गौर करना होगा। बेहद डरावने मीसा कानून के तहत बंद किए गए 6,330 सियासी कार्यकर्ताओं में से 4,026 आरएसएस और जनसंघ (भाजपा के पुराने संस्करण) से जुड़े थे। इनमें आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस के अलावा वेंकैया नायडू, अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, अनंत कुमार, दत्तात्रेय होसबोले आदि भी शामिल थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने दो बार देश से गायब होकर अमेरिका और इंग्लैंड से इंदिरा की तानाशाही के खिलाफ मुहिम छेड़ी। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय आरएसएस के प्रचारक थे और उन भूमिगत गतिविधियों से जुड़े थे जिनके तहत आपातकाल विरोधी साहित्य का प्रसार और साथ ही बंदी नेताओं के परिवारों की देखरेख की जाती थी।


जस्टिस एचआर खन्न्ा भी उस दौर के नायक थे। एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला का जो मुकदमा बंदी प्रत्यक्षीकरण के तौर पर मशहूर है, उसमें जस्टिस खन्न्ा इकलौते ऐसे जज थे, जिन्होंने अलग रुख अपनाया था। इस मामले में शीर्ष अदालत को यह तय करना था कि क्या कोई नागरिक अनुच्छेद 21 के तहत मिले निजी स्वतंत्रता के मूल अधिकार की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण ले सकता है? यह हक किसी भी लोकतांत्रिक संविधान का बुनियादी तत्व होता है। इसकी उपस्थिति और अनुपस्थिति ही वह पैमाना है, जो किसी लोकतांत्रिक एवं तानाशाही शासन में अंतर करता है। तत्कालीन एटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने इस सरकारी दलील पर जोर दिया कि नागरिकों के पास जीवन एवं निजी स्वतंत्रता का अधिकार नहीं। जस्टिस खन्न्ा ने पूछा कि यदि कोई पुलिसकर्मी निजी दुश्मनी में किसी की हत्या कर दे तो क्या इसका कोई न्यायिक उपचार नहीं होगा? नीरेन डे ने कहा कि हां, इसका कोई न्यायिक उपचार नहीं है। अदालत में मौजूद लोग इस जवाब पर सन्न् रह गए। जस्टिस खन्न्ा ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि पीठ में शामिल प्रधान न्यायाधीश एएन रे, एमएच बेग, वाईवी चंद्रचूड़ और पीएन भगवती ने इस पर एक तरह से चुप्पी साध ली। इन सभी ने सरकारी रुख पर हामी भरते हुए नागरिकों का जीवन एवं निजी स्वतंत्रता का अधिकार छीन लिया। चूंकि जस्टिस खन्न्ा ने इस पर विरोध जताया, इसलिए इसकी कीमत उन्हें कुछ महीनों बाद तब चुकानी पड़ी, जब इंदिरा गांधी ने उनकी वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए जस्टिस बेग को प्रधान न्यायाधीश बना दिया। इस पर हैरत नहीं कि जस्टिस खन्न्ा को उन सभी के बीच नायक का दर्जा हासिल है जो लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों की कद्र करते हैं।


आपातकाल के जिम्मेदार कुछ लोगों को हमें कभी माफ नहीं करना चाहिए। इसमें पहला नाम तो इंदिरा गांधी का ही आता है। उन्होंने जबरन नसबंदी अभियान को हरी झंडी दिखाई और अपने संकीर्ण हितों के लिए संविधान में संशोधन किया। उच्चतर न्यायपालिका को पंगु बनाने के लिए भी संविधान में संशोधन किए गए। इंदिरा ने राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान किया कि वह कार्यपालिका के आदेशों से संविधान में संशोधन कर सकें। उसी दौर में केरल के एक पुलिसकर्मी ने रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, कालीकट के छात्र पी. राजन की बर्बरतापूर्ण हत्या कर दी, लेकिन उसे कोई सजा नहीं दी गई। कर्नाटक के एक पुलिसकर्मी ने लॉरेंस फर्नांडीस को महीनों प्रताड़ित किया, किंतु वह भी सजा से बच गया। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने निर्ममता से सेंसरशिप लागू की। जिला अधिकारी को किसी भी अखबार के दफ्तर में छापा मारकर उसका प्रकाशन रोकने का अधिकार दिया गया। शुक्ल का यह उन्माद तब चरम पर पहुंच गया, जब उन्होंने अखबारों को निर्देश दिया कि वे महात्मा गांधी और टैगोर की बातों का उल्लेख न करें। उस समय रेडियो में आकाशवाणी का ही एकाधिकार था और उसे आदेश दिया गया कि वह किशोर कुमार को कोई गीत न बजाए, क्योंकि उन्होंने सरकारी विज्ञापन के लिए गीत गाने से मना कर दिया था।


जस्टिस बेग को भी बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में उनके नजरिए के लिए माफ नहीं किया जा सकता। उनका मानना था कि इंदिरा सियासी कैदियों का बहुत अच्छी तरह से ख्याल रख रही हैं। नौकरशाह नवीन चावला की भूमिका भी बहुत संदिग्ध थी जो उस समय दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद के सचिव थे जो एक तरह से गैर-संवैधानिक निकाय बन गए थे। जब तिहाड़ जेल के अधीक्षक ने कहा कि जेल में इतने सारे राजनीतिक कैदियों को समायोजित नहीं किया जा सकता तो चावला ने निर्देश दिया कि उन्हें कोठरियों में रखकर प्रताड़ित किया जाए और कुछ कैदियों को मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के साथ रखा जाए। शाह आयोग में चावला के खिलाफ कहा गया कि उन्होंने कैदियों की हालत पर जस्टिस बेग को गुमराह किया। बंसीलाल भी माफी के काबिल नहीं, जो तब हरियाणा के मुख्यमंत्री थे और बाद में रक्षा मंत्री बने। उनका व्यवहार किसी मध्ययुगीन सामंत की तरह था जिन्होंने अपनी सनक में न जाने कितने लोगों की जिंदगियां तबाह कर दीं। नसबंदी शिविरों पर वह खुद निगरानी रखे हुए थे। सबसे वीभत्स वाकया हरियाणा के उत्तावार गांव में हुआ। इस मुस्लिम बहुल गांव में पुलिसवाले ट्रक में भरकर आए और गांव को घेरकर आठ साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग की जबरन नसबंदी कर दी गई। अधिकांश उत्तरी राज्यों में शिक्षकों व पुलिसकर्मियों को नसबंदी का कोटा दिया गया था। कई मामलों में तो खुद शिक्षकों को नसबंदी करानी पड़ी। विरोध करने पर उन्हें मीसा के तहत जेल में डाल दिया जाता था। आपातकाल के अत्याचारों की यह सूची अंतहीन है, लेकिन यदि हमने आपातकाल के खलनायकों के दमनकारी दौर से सबक नहीं लिया तो शायद हम अपने लोकतांत्रिक स्वरूप को संरक्षित नहीं रख पाएंगे।

 

(लेखक प्रसार भारती के चेयरमैन एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)