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अच्छी सेहत से दूर होती आबादी- के सी त्यागी

नीति आयोग ने हाल ही में सार्वजनिक चिकित्सा क्षेत्र के खर्चे में कटौती करने को कहा है। आयोग ने इस क्षेत्र में हो रहे निवेश पर काबू पाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा के तहत लोगों को नि:शुल्क मिल रही दवाइयों व अन्य सेवाओं को नियंत्रित करने की भी अनुशंसा की है। इसके अलावा आयोग स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेशकों तथा बीमा कंपनियों को मुख्य भूमिका में लाने की कोशिश में है।

हैरान करने वाला तथ्य यह है कि भारत पहले से ही स्वास्थ्य क्षेत्र पर सबसे कम खर्च करने वाला देश है। कुल जीडीपी का मात्र एक फीसदी हिस्सा देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। वर्ष 2014-15 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनाने की बजाय और कमजोर किया गया है। इसमें आम लोगों की चिकित्सा संबंधी सुविधाओं को नजरअंदाज कर बड़े दवा कारोबारियों का ज्यादा ख्याल रखा गया है।

कॉरपोरेट टैक्स को 25 प्रतिशत कम करके उद्योगपतियों का लगभग 16 फीसदी बोझ कम किया गया है। महंगाई, बीमारी और चुनौतियां सब बढ़ी हैं, परंतु स्वास्थ्य बजट में 5,100 करोड़ की कटौती हुई है। बजट में कटौती का असर देश में विभिन्न गंभीर बीमारियों के उन्मूलन के लिए चल रहे कार्यक्रमों पर पड़ने लगा है। इस दिशा में यूपीए सरकार भी गंभीर नहीं रही।

लोकसभा चुनाव के दौरान एनडीए ने स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता देने की घोषणा की थी, जिससे लोगों ने काफी उम्मीदें बांधी थीं, मगर इस सरकार ने भी स्वास्थ्य जगत को निराश ही किया है। सरकार का दायित्व है कि उचित बजट प्रावधानों से नागरिकों को मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करे। ये सुविधाएं न मिल पाने की वजह से भारत कई बीमारियों का गढ़ बन चुका है।

इस समस्या के समाधान की कोशिश में सरकार निजीकरण जैसे प्रयोग अपनाने का काम कर रही है। इतनी बड़ी जनसंख्या के स्वास्थ्य के हितों की रक्षा क्या निजी हाथों द्वारा संभव है? स्वास्थ्य क्षेत्र में निजीकरण के प्रभाव से व्यवस्था में कालाबाजारी की भी आशंका बनती है। राजधानी दिल्ली में स्वाइन फ्लू बीमारी के दौरान एन-95 मास्क की बिक्री में जमकर कालाबाजारी देखी गई। दो-ढाई गुना दाम पर मास्क बेचे गए। बाद में आपूर्ति का भी संकट आ गया। जब किसी छोटी-सी योजना में इतनी धांधली संभव है, तो पूरी व्यवस्था का सही संचालन सुनिश्चित कर पाना निश्चित रूप से आसान नहीं होगा।

पिछले कुछ वर्षों में तमाम सुख-सुविधाओं से लैस हजारों की संख्या में बड़े आधुनिक अस्पताल खुले। लेकिन महंगे इलाज के कारण इन अस्पतालों से भारतीय जनसंख्या के बड़े हिस्से को किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल पाया। ऐसे में, संपन्न तथा आम नागरिकों के इलाज के बीच एक बड़ा अंतर जरूर देखने को मिला है। आज सरकार स्वास्थ्य बीमा को तवज्जो देने पर तुली हुई है। एनएसएसओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक आबादी के पास न तो कोई सरकारी स्वास्थ्य योजना पहुंचती है, और न ही कोई निजी बीमा। ऐसे में, जान बचाने के लिए उनके पास महंगा कर्ज ही एकमात्र रास्ता बचता है।

जिस देश में प्रत्येक नागरिक को दो वक्त का संतुलित खाना नसीब नहीं हो पाता, जहां महज 15-16 फीसदी लोग स्वास्थ्य बीमा की पॉलिसी लेने को इच्छुक हों, तो वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुनिश्चितता के लिए बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों पर आश्रित होने का औचित्य समझ से परे हो जाता है। सरकार की नई नीति सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को कमजोर कर स्वास्थ्य बीमा को प्राथमिकता देने की है।

विश्व स्तर पर चिकित्सा सेवा व दवा निर्माण के क्षेत्र में भारत का योगदान सराहनीय रहा है। देश से औसतन 42,000 करोड़ रुपये की दवाएं निर्यात की जाती हैं। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों में भारतीय दवाओं की मांग रही है। लेकिन अफसोस है कि देश की आबादी ही मूलभूत चिकित्सा सुविधाओं से वंचित रह जाती है। दवाओं के दाम नियंत्रित करने वाली व्यवस्था को भी खत्म कर दिया गया है।

रसायन व उर्वरक मंत्रालय ने जरूरी दवाओं की सूची में न आने वाली दवाओं की कीमतों पर किसी भी तरह के नियंत्रण को खत्म कर दिया है। अब नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी केवल लिस्ट में शामिल दवाओं के दामों पर नियंत्रण तक सीमित रह गई है। इससे टीबी, एड्स, डायबिटीज तथा हृदय रोग की दवाओं में भारी इजाफा हुआ है। ये दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं।

वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था में कई खामियां हैं, जिस वजह से यह तंत्र मरीजों को सेवा प्रदान करने में असमर्थ है। मानव संसाधन व सुविधाओं की कमी के कारण सरकारी अस्पताल लंबे समय से आलोचना के केंद्र में हैं। इन अस्पतालों में डॉक्टर, टेक्नीशियन, नर्सिंग स्टाफ तथा विशेषज्ञों की संख्या में भारी कमी है। देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान एम्स की छह नई शाखाओं में लगभग 80 फीसदी पद खाली पड़े हैं।

इसलिए, शुरुआती इलाज के अभाव में बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं। टीबी मरीजों की संख्या सबसे अधिक भारत में ही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, देश का पांच में से एक नागरिक मनोरोग की चपेट में है। ऐसे 80 फीसदी रोगी इलाज और देखभाल से वंचित हैं। देश में साढ़े तीन लाख मनोरोगियों पर मात्र एक मनोचिकित्सक उपलब्ध है, जबकि इस दिशा में बांग्लादेश जैसा छोटा राष्ट्र भी हमसे कहीं आगे है।

समस्या यह है कि मौजूदा व्यवस्था में सुधार लाने की बजाय सरकारी नीतियां दूसरे विकल्प की तलाश में हैं। भारत जैसे देश में दूसरा विकल्प आम जनता के हित में कतई नहीं होगा। यहां बुनियादी स्तर पर सुधार की जरूरत है। सरकारी नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जो सिर्फ धनवानों को नहीं, बल्कि साधारण नागरिक को स्वस्थ्य रहने का अधिकार प्रदान करे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेक इन इंडिया पर बल देते रहे हैं। परंतु इस पहल के अंतर्गत जेनरिक दवाओं की निर्माण प्रक्रिया को कोई खास गति नहीं मिली। जरूरी दवाओं के स्थानीय उत्पादन से गरीब वर्गों की राह काफी आसान हो सकती है। जेनरिक दवाओं की औसत कीमतें लगभग 80 प्रतिशत कम होती हैं। आज जनहित के प्रयास में जेनरिक व आयुर्वेदिक दवाओं को उचित बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके अलावा शिथिल पड़ी सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से तंदुरुस्त कर आम जन के लिए उपयोगी बनाने की आवश्यकता है।

लेकिन इसके लिए सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट बढ़ाने, सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने के अलावा निजी अस्पतालों और क्लीनिक की मनमानी और शुल्क निर्धारण प्रक्रिया पर भी नजर रखनी होगी। इसके बाद ही हम चिकित्सा सेवाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा सकेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)