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अपनी जड़ों को खोजते वे भारतवंशी- बद्री नारायण

हिंदी पट्टी ने ब्रिटिश उपनिवेश काल में अनेक मुसीबतें झेलीं। इनकी दो मुसीबतें अत्यंत महत्वपूर्ण रही हैं, जिन्होंने मिलकर हिंदी क्षेत्र का वर्तमान रचा है। एक तो 1857 का विद्रोह, दूसरा गिरमिटिया विस्थापन, जिसे प्रवास, उत्प्रवास कुछ भी कहा जा सकता है। भोजपुरी के प्रसिद्ध नाटककार भिखारी ठाकुर ने इसे बिदेसिया हो जाना भी कहा है। 19वीं सदी में दास प्रथा की समाप्ति के बाद दुनिया में आक्रामक रूप से फैल रही साम्राज्यवादी शक्तियों को अपने गन्ने, कोका, चावल की खेती में काम करने के लिए सस्ते श्रमिकों की जरूरत थी। डच, फ्रेंच आदि अनेक उपनिवेशवादियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौता कर सस्ते मजदूर मांगे। इस समझौते के तहत एक नई व्यवस्था की गई, जिसे ‘शर्तबंदी समस्या' (एग्रीमेंट सिस्टम) का नाम दिया गया। इस व्यवस्था के तहत लगभग सौ वर्षों में मूलत: उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और देश के कुछ अन्य भागों से 12 लाख लोग विस्थापित हुए। यह विस्थापन तो था, पर ‘बलात विस्थापन' था।


इन विस्थापित श्रमिकों में से अनेक को मेले, बाजारों से उठा लिया गया। कई लापता मान लिए गए। परिवार को पता भी नहीं चला कि वे कहां गए। कई अपने मन से भी गए, लेकिन उन्हें भी लुभाकर, ललचाकर, छल-छद्म से ले जाया गया। कैरेबियन में हुए गिरमिटिया विस्थापन पर केंद्रित एक ही आत्मकथा मौजूद है। वह है मुंशी रहमान खान की आत्मकथा- जीवन प्रकाश। इसमें वह बताते हैं कि कइयों को पता भी नहीं था कि वे इतना दूर ले जाए जा रहे हैं, जहां जाने में छह महीने से ज्यादा समय लग जाएगा। कई तो कलकत्ता डिपो पर पानी के जहाज पर चढ़ने के बाद कूद-कूदकर भागने लगे थे। कई लंबी समुद्री यात्रा में उपजी अनेक तरह की बीमारियों के कारण मर गए। इनमें अवध और ब्रज के लोग भी शामिल थे, पर ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में फैले भोजपुरी क्षेत्रों के प्रवासी थे। एक तरह से ये कुशल श्रमिक थे। इन्हें चावल और गन्ने के खेतों में काम करने का अनुभव था। ये चावल और गन्ना उत्पाद करने वाले क्षेत्रों- सुल्तानपुर, रायबरेली, इलाहाबाद, आजमगढ़, गोरखपुर, जौनपुर, आरा, बक्सर, छपरा आदि क्षेत्रों से ले जाए गए थे। इनमें से कई की भारत में अच्छी खेती थी। कई अनेक बिगहे के जोत वाले परिवारों से थे। कई भूमिहीन भी थे। दलित और मध्यजातियों के लोग ज्यादा संख्या में तो थे, पर ऊंची जातियों के लोगों की संख्या भी कम नहीं थी। कई 1857 के बंगाल आर्मी के वे सिपाही भी थे, जो उस विद्रोह के कारण अपनी नौकरी से हाथ धो चुके थे। वे अपनी पहचान, नाम और जाति छिपाकर मॉरिशस, फिजी, त्रिनिदाद और दक्षिण अफ्रीका गए थे। वे प्राय: लोकभाषी अशिक्षित लोग थे। एग्रीमेंट (शर्तबंदी) को वे अपनी भाषा में गिरमिट कहने लगे। धीरे-धीरे उन्हें गिरमिटिया कहा जाने लगा। उन्हें ‘कलकतिया' भी कहा जाता था, क्योंकि वे कलकत्ता डिपो से जहाजों में भर-भरकर ले जाए गए थे।


इस विस्थापन ने मां को बेटे से, पति को पत्नी से, परिवार से परिवार को अलग कर दिया। अनेक शादीशुदा औरतें गांवों में तो पतिविहीन बेवा का जीवन बिताते हुए रोते-रोते मर गईं। बूढ़े बाप की आंखें अपने खो गए लाल को देखने को तरस गईं। भिखारी ठाकुर ने इसी विस्थापन के कारण छूट गई औरतों के दर्द को बयान करने के लिए बिदेसिया नामक भोजपुरी लोकनाटक रचा। उन्होंने स्वयं इस विस्थापन को देखा था और इसके दर्द को महसूस किया था। इनमें से कई तो कलकत्ता कमाने गए थे, और वहीं से गायब हो गए। कलकत्ता में ही वह डिपो था, जहां से उन्हें ले जाया जाता था। बनारस, बक्सर, दानापुर, छपरा, कानपुर के ‘सब डिपो' में इन्हें एकत्रित किया जाता था, वहां से उन्हें रजिस्टर कर कलकत्ता डिपो ले जाया जाता था। फिर समुद्री जहाजों से आगे की यात्रा शुरू होती थी।


इस विस्थापन के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में सशक्त आवाजें उठीं। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, बनारसी प्रसाद चतुर्वेदी, भवानी दयाल संन्यासी इत्यादि के प्रतिरोध से उन मुल्कों में श्रमिकों की स्थिति के अध्ययन के लिए अनेक आयोग बनाए गए। इन आयोगों की रिपोर्ट के आधार पर 1916-17 में गिरमिटिया विस्थापन को रोकने के लिए ब्रितानिया सरकार बाध्य हुई। अभी पूरी दुनिया में जिन देशों में भी इन गिरमिटिया के वंशज हैं, वे ‘गिरमिटिया' व्यवस्था की समाप्ति की 100वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।


आज उन विस्थापित लोगों की तीसरी या चौथी पीढ़ी शिक्षा, राजनीति या व्यापार में बहुत आगे आ चुकी है। अनेक अपनी जड़ों से जुड़ने, उन्हें खोजने के लिए भारत आ रहे हैं। उनकी अस्मिता को अगर गहराई से महसूस करें, तो आज सब कुछ होने के बावजूद वे अपने को आधा-अधूरा महसूस करते हैं। मानो उनका ‘आधा' आज भी कहीं खोया हो, जिसे वे ढूंढ़ रहे हों। वे एक ऐसी नॉस्टालजिया की यातना से गुजर रहे हैं, जिसमें मातृभूमि में वापसी असंभव है, पर सदा उसकी चाहत उसमें बनी रहती है। उनके जो पूर्वज भारत में अपने परिवार से विलग हो गए थे, उनमें से ज्यादातर उस विलगाव के दुख से जिंदगी भर उबर नहीं पाए और उनमें से अनेक मानसिक बीमारियों के शिकार हो गए। अगर आप उन देशों के आर्काइव में जाएं, तो वहां ऐसे खोये पत्रों का अलग बॉक्स बना है। उन संदेशों का, जो जिन लोगों के लिए लिखे गए थे, उन तक कभी पहुंच ही नहीं पाए।


अब वे भारत में अपने लोगों से जुड़ रहे हैं। शादी-ब्याह का संबंध भी स्थापित कर रहे हैं। भारत सरकार प्रवासी दिवसों का आयोजन करके इन्हें जोड़ रही है। भारत के ग्रामांचलों की लोक-संस्कृति में इन बिदेसिया की स्मृतियां आज भी लोक गीतों में जिंदा हैं। हिंदी और अंग्रेजी में इन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। अमिताभ घोष की पुस्तक सी ऑफ पॉपीज को इन भूले-बिसरे लोगों को खोजने की एक सार्थक कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए। खोने, पाने, बिछुड़ने, मिटकर पुन: स्थापित होने की प्रक्रिया से गुजरते हुए इन गिरमिटिया श्रमिकों के वंशज अपने उन देशों को समृद्ध कर रहे हैं, जहां उन्हें बसाया गया था। (ये लेखक के अपने विचार हैं)