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अब भी कम नहीं आर्थिक चुनौतियां - सुषमा रामचंद्रन

कई बार हमें जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में भी यह बात सच लगती है। हां, यह सही है कि अर्थव्यवस्था को लेकर खुशी का माहौल है और शेयर बाजार सूचकांक नई बुलंदियों को छू रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि आगामी वर्ष के लिए देश का आर्थिक परिदृश्य उतना सुहावना नजर नहीं आता। हां, ऑटोमोबाइल्स और उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में उछाल के साथ कुछ सेक्टरों में उबरने के संकेत जरूर मिल रहे हैं, लेकिन कई ऐसे कारक भी हैं, जो चिंता बढ़ाने वाले हैं। यह उस सरकार के लिए दिक्कत भरा हो सकता है, जिसे अगले ही साल चुनाव का सामना करना है.


पहला और प्रमुख चिंता का विषय है- महंगाई। जून में खुदरा महंगाई दर बढ़ते हुए 5 फीसदी तक पहुंच गई, जो बीते पांच महीनों में इसका सबसे उच्च स्तर है। महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक भी खासतौर पर चिंतित है, जो अपनी पिछली बैठक में साढ़े चार साल के बाद पहले ही रेपो दरों में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर चुका है। यदि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में गिरावट के संकेत नहीं मिलते हैं, तो पूरी संभावना है कि अगस्त में रिजर्व बैंक इसमें और इजाफा कर सकता है। महंगाई दर को 4 फीसदी से नीचे रखने का रिजर्व बैंक का लक्ष्य खासकर अनेक फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में डेढ़ गुना तक इजाफे के बाद फिलहाल तो दूर ही नजर आता है.


इस मामले में मानसून की भूमिका भी अहम होगी। हालांकि मौसम विभाग ने इस साल अच्छे मानसून की भविष्यवाणी की है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अब तक देश के अनेक इलाकों में अपेक्षा से कम बारिश हुई है। इसकी वजह से खरीफ सीजन की बुआई का रकबा भी दस फीसदी तक घट गया है। यदि आगे चलकर बारिश का कोटा पूरा नहीं होता तो इससे पैदावार प्रभावित होगी और जिसके चलते खाद्य महंगाई दर भी बढ़ेगी.


नीति-नियंताओं के लिए सिरदर्द का दूसरा मसला है तेल की उच्च कीमतें। खुदरा स्तर स्तर पर तेल की लगातार बढ़ती कीमतों के लिए कुछ हद तक वह नीति भी जिम्मेदार है, जिसके तहत देश में तेल विपणन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम के हिसाब से कीमतें निर्धारित करने की छूट प्रदान की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। जाहिर है, इतनी उच्च कीमतों के साथ भारत सहज नहीं रह सकता। हालांकि ऐसे भी संकेत हैं कि आगे चलकर कीमतें कम हो सकती हैं। ऐसी खबरें हैं कि अमेरिका तेल कीमतों को नीचे लाने के लिए अपने विशाल तेल भंडार को इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहा है। अमेरिका ऐसे संकेत दे रहा है कि भारत सरीखे देश जो ईरान से तेल खरीदते हैं, यदि वे इससे पीछे हटते हैं तो अमेरिका उन्हें कुछ छूट प्रदान कर सकता है। इसके अलावा लीबिया से भी तेल की आपूर्ति जल्द ही बढ़ सकती है। हालांकि ऐसा होने पर भी भारत की मुश्किलें खास कम नहीं होंगी। तेल की उच्च कीमतों से महंगाई बढ़ रही है, जिससे सरकार पर पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स घटाने का दबाव है। लेकिन यदि ऐसा किया जाता है तो सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखना मुश्किल हो जाएगा। जाहिर है, चुनावी साल में तेल की उच्च कीमतें सुखद स्थिति तो नहीं है और इसके लिए तो मतदाताओं के समक्ष मौजूदा सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा। ऐसे में वित्त मंत्रालय को यह तय करना होगा कि वह राजकोषीय अनुशासन के पथ पर टिका रहे, जिसके लिए कि रेटिंग एजेंसियों द्वारा इसकी सराहना की जा रही है, या फिर वह डीजल और पेट्रोल जैसे तेल उत्पादों पर लगने वाले अत्यधिक उत्पाद शुल्क में कटौती करते हुए उपभोक्ताओं का बोझ कम करे.


चिंता का तीसरा प्रमुख विषय रुपए के मूल्य में गिरावट है, जो उपरोक्त दोनों विषयों से ही जुड़ा है। तेल आयात की उच्च लागत की वजह से रुपए की गिरावट में तेजी आ रही है और जिसकी वजह से महंगाई भी बढ़ रही है। मौजूदा वित्त वर्ष में रुपया तकरीबन सात फीसदी तक गिर चुका है, जिससे आयात बिल भी बढ़ा है और उद्योग जगत के लिए कच्चे माल और परिवहन की लागत भी बढ़ गई। आदर्श स्थिति यही है कि मुद्रा के मूल्य में गिरावट की स्थिति में निर्यात को बढ़ावा मिले, लेकिन फिलहाल ऐसा लगता है कि फार्मास्युटिकल्स और इंजीनियरिंग जैसे कुछ खास सेक्टर्स में ही इससे मदद मिली है। इसके बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में निर्यात 14.2 फीसदी बढ़ा, जबकि वर्ष 2017-18 की इसी अवधि में यह महज 9.8 फीसदी बढ़ा था। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि रुपए में गिरावट के इस उजले पक्ष यानी निर्यात में वृद्धि का क्रम आगे भी जारी रहे.


इसके साथ-साथ, हालिया आंकड़े दर्शाते हैं कि अर्थव्यवस्था में कमजोरी का चौथा क्षेत्र औद्योगिक उत्पादन है। मई में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक महज 3.2 फीसदी रहा, जो सात महीनों में इसका सबसे निम्न स्तर था। ऐसा काफी हद तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की सुस्ती की वजह से रहा, यद्यपि ऊर्जा व खनन के क्षेत्र में सुधार के कुछ संकेत नजर आ रहे हैं। रिजर्व बैंक पहले ही इसको लेकर अंदेशा जाहिर कर चुका है। उसने जून में मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में उच्च इनपुट लागत और मांग में कमी का हवाला देते हुए मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में औद्योगिक विकास में सुस्ती का संकेत दिया था.


कुल मिलाकर देश का आर्थिक परिदृश्य अनिश्चित नजर आ रहा है। यह परिदृश्य शेयर बाजार की तीव्र उछाल से बिलकुल अलग लग सकता हैै। लेकिन शेयर बाजार की यह रिकॉर्ड उछाल ज्यादातर इसलिए है, क्योंकि रुपए के मूल्य में गिरावट का सकारात्मक प्रभाव टीसीएस और इन्फोसिस जैसी दिग्गज आईटी कंपनियों (जिनका सेंसेक्स में काफी वजन है) के सेवा निर्यात में बढ़ोतरी के रूप में नजर आया है। इसके साथ-साथ, कॉर्पोरेट कंपनियों के शुरुआती नतीजे भी सकारात्मक रहे हैं, जिससे शेयर बाजार चहक उठा है.


लेकिन अर्थव्यवस्था के पुख्ता संकेतकों के आधार पर तो यही लगता है कि आगे आर्थिक विकास की राह उतनी सहज नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उच्च कीमतों जैसे बाहरी और फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में जबर्दस्त बढ़ोतरी तथा रुपए में गिरावट जैसे अंदरूनी कारकों के चलते महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा रही है। खरीफ फसलों के रकबे में गिरावट और मानसून की अनिश्चितता के चलते खेतिहर विकास पर भी प्रश्नचिह्न है। औद्योगिक उत्पादन में सुस्ती छाई है और तीव्र विकास इस पर निर्भर करेगा कि मांग कैसी रहती है। ऑटो सेक्टर में बिक्री बढ़ने और निर्यात में ताजा उछाल के रूप में सिर्फ दो ही उजले संकेत नजर आते हैं। साफ है कि देश के आर्थिक हालात पर समग्र मंथन की जरूरत है। बेहतर है हमारे नीति-नियंता आगे की राह को लेकर ज्यादा यथार्थवादी रवैया अपनाएं और यह सुनिश्चित करें कि जल्द सुधारवादी कदम उठाए जाएं।

(लेखिका वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक हैं)