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अभी बाकी है समानता की लड़ाई - तसलीमा नसरीन

सऊदी अरब ने महिलाओं के गाड़ी चलाने पर जारी प्रतिबंध को कुछ दिन पूर्व हटा लिया है। महिलाएं अब अगले साल जून से गाड़ियां चला सकेंगी। यह एक बड़ी खुशखबरी है। 1990 में पहली बार महिलाएं गाड़ी चलाने का अधिकारी मांगने को सड़क पर उतरी थीं। 47 महिलाओं ने रियाद शहर में गाड़ी ड्राइव की थी। उन सबको गिरफ्तार किया गया था। यही नहीं, उनमें से कुछ की तो नौकरी भी चली गई थी। क्या नारियों के अधिकारों पर सख्ती बरतने वाले सऊदी राजतंत्र ने महिलाओं की आजादी पर विश्वास करना शुरू कर दिया है? ऐसा लगता तो नहीं।

 

महिलाओं द्वारा ड्राइविंग पर पूरी दुनिया विशेषकर योरप और अमेरिका सऊदी अरब की निंदा में मुखर रहे हैं। सऊदी अरब को नारी उत्पीड़न वाले देश के रूप में देखा जाता रहा है। इसीलिए सऊदी अरब ने निर्णय लिया है कि औरतों को भी ड्रायविंग की छूट दी जाए। संभव है, अपनी छवि बदलने के लिए उसने यह फैसला किया हो।

 

महिलाओं की दलील है कि उनके पास गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं था और अक्सर ड्राइवर नहीं मिलने पर टैक्सी पर कहीं ज्यादा खर्च करना पड़ता था, जिसमें अब बचत हो सकेगी। वहीं सऊदी अरब के एक मंत्री का कहना है कि महिलाएं गाड़ी चलाएंगी तो उनके पेट को नुकसान होगा। कुछ दिन पहले सऊदी के एक इमाम ने कहा था कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में एक चौथाई ही दिमाग होता है, लिहाजा महिलाओं का गाड़ी चलाना प्रतिबंधित है। अब तक सऊदी के पुरुषों के मन से नारी के प्रति विद्वेष कम नहीं हो सका है। पहले की तरह घृणा आज भी बनी हुई है। महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति दी गई है, यह खबर आते ही सऊदी में कुछ कट्टर सोच वाले लोगों ने वाट्सएप पर विरोध भी शुरू कर दिया है। वे कह रहे हैं कि इस कानून को लागू नहीं होने देंगे। महिलाओं को व्यभिचारी नहीं बनने देंगे। ऐसी कट्टर सोच वालों का कहना है कि गाड़ी चलाते समय महिलाएं पर-पुरुष से बात करेंगी और ऐसे में वे व्यभिचारी हो जाएंगी। सऊदी अरब में महिला विरोध की कुसंस्कृति इतनी जल्दी समाप्त नहीं होने वाली। वहां के लोग जैसे हैं, काफी समय तक वैसे ही बने रहेंगे।

 

वहां महिलाओं के लिए बुर्का अनिवार्य है। सिर के दो बाल भी दिख जाएं तो आफत आ जाती है। सिर से लेकर पांव तक बुर्का पहनकर ही महिलाएं कहीं आ-जा सकती हैं। चाहे वे सड़क पर पैदल चलें या गाड़ी में जाएं। अब महिलाएं गाड़ी चलाएंगी, लेकिन नारी विरोधी सभी कानून बदस्तूर जारी रहेंगे। दुष्कर्म की शिकार होने पर भी महिलाओं को ही सजा भुगतनी होती है, क्योंकि दुष्कर्म के चार साक्ष्य पेश करने पड़ते हैं। दुष्कर्म नामक कोई शब्द सऊदी के संविधान में नहीं है। है तो व्यभिचार नामक शब्द। व्यभिचार में पकड़े जाने पर महिला व पुरुष दोनों को ही सजा मिलती है। दुष्कर्मी को तो सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन दुष्कर्म पीड़िता को सजा क्यों? पर-पुरुष के साथ यदि किसी महिला को देख लिया गया तो उसका अर्थ यह होता है कि महिला ने व्यभिचार किया है। लड़की को यदि अगवा कर सामूहिक दुष्कर्म किया गया है तो उसे चार गवाह लाने होते हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुष्कर्मी के साथ उसे भी सजा दी जाती है। पीड़िता को गवाह कहां मिलेंगे? सऊदी की महिलाएं अपने पति की अनुमति के बिना देश से बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकतीं। इलाज कराने के लिए भी यदि वे बाहर जाती हैं तो घर के पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी होती है। पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना लड़कियों को शादी करना, तलाक, स्कूल व कॉलेजों में दाखिला, नौकरी, व्यवसाय करना यहां तक कि बैंक में खाता खुलवाना भी संभव नहीं है। लड़कियों के लिए अभिभावक पिता, पति, भाई, चाचा या फिर पुत्र होता है। किसी भी अपरिचित पुरुष के साथ लड़कियों की बातचीत और किसी तरह का मिलना-जुलना प्रतिबंधित है। वर्ष 2013 में सड़क हादसे में जख्मी एक महिला का ऑपरेशन कर हाथ काटना था, लेकिन ऐसा करना संभव नहीं हो सका, क्योंकि उक्त महिला का कोई अभिभावक नहीं था जो अनुमति दे सके। दरअसल, उसी हादसे में उसके पति की मौत हो गई थी।

 

मानाल अल-शाराफ नामक सऊदी की एक लड़की ने वर्ष 2011 में रात के अंधेरे में गाड़ी ड्राइव की थी और उसे रिकॉर्ड कर यूट्यूब पर डाला था, जिसके लिए उसे सजा मिली। इसके बाद से ही महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति दिए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। उसी घटना को लेकर महिलाओं को ड्राइविंग की अनुमति दी जा रही है। यहां तक कि महिलाओं को अभिभावक कानून के खिलाफ भी लड़ाई लड़नी पड़ रही है, क्योंकि सऊदी में लड़कियों को अभिभावक के बिना जीवन-यापन करने की अनुमति नहीं है। यह पता नहीं कि अभिभावक कानून को खत्म करने में और कितने युग लगेंगे? मानाल की उस मांग से आवाज बुलंद हुई थी। सऊदी में रहकर वह यह आवाज नहीं उठा पाती। वह इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में है, इसीलिए यह सब कर सकी। अरब देश को बर्बरों का देश कहा जाता था। मारपीट, खून-खराबा वहां के लोग किया करते थे। महिलाएं इंसान हैं, यह कभी नहीं माना जाता था। आज भी महिलाओं को इंसान समझने का लक्षण नहीं दिख रहा। वित्तीय स्वार्थ व निंदा की वजह से अब महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति दी जा रही है, लेकिन अब भी नारी अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ नहीं हो रहा है। विवाह, तलाक, संतानों के अभिभावक, उत्तराधिकार में भी व्यापक रूप से महिलाओं के मानवाधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है। महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का भी हक वहां नहीं है। बस उन्हें उपभोग की वस्तु माना जाता है। अपने अधिकारों की बात करने वाली महिलाओं को देश से बाहर जाना पड़ता है। ऐसा कब तक चलेगा? धरती के कई बर्बर देश सभ्य बने हैं। कई महिला विरोधी समाजों में महिलाओं को समान अधिकार मिले हैं, परंतु अमीर मुल्कों में शुमार सऊदी अरब का रिकॉर्ड इस पैमाने पर बेहद लचर है। एक जमाने में गरीब देश रहे सऊदी अरब ने तेल के दम पर खूब तरक्की से तमाम सुख-सुविधाएं तो जुटाई हैं, लेकिन नारी को समान अधिकार देने के मामले में तंगदिल बना हुआ है।

 

वहां नारी विरोधी पुरुषों का अभाव नहीं है। दुख यह है कि वहां नारी विरोधी महिलाएं भी कम नहीं हैं। ब्रेनवॉश के कारण यह चमत्कार है। 2006 में हुए एक सर्वे में सामने आया था कि 100 में से 89 महिलाएं नहीं चाहतीं कि महिलाएं गाड़ी चलाएं। वहीं 86 फीसदी महिलाएं नहीं चाहतीं कि पुरुषों के साथ बैठकर समान रूप से कार्य करें। 90 फीसदी महिलाएं नहीं चाहतीं कि अभिभावक कानून खत्म हो। महिलाएं जब खुद ही स्वाभिमान से समझौते को तैयार हैं तो यह हैरान ही करता है। महिलाओं के हक में आवाज उठाने पर यही कहा जाता है कि मैं महिला प्रधान समाज बनाना चाहती हूं। वे भयभीत हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि नारी प्रधान समाज होने पर आज जो महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है, कहीं वही पुरुषों के साथ न होने लगे। मैं स्तब्ध हूं। अधिकांश पुरुष समान अधिकार वाला समाज तैयार करने के पक्ष में नहीं हैं। यहां आधी आबादी शेष आधी आबादी के दमन में लगी है। ऐसे शोषकों की हरकतें शर्मिंदा ही करती हैं।

 

(लेखिका बांग्लादेशी मूल की जानी-मानी साहित्यकार हैं)