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अराजक राहों पर राहत का कानून-- शशिशेखर

दृश्य 1 : हम भागलपुर से पटना लौट रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग-31 पर हमारे आगे एक साइकिल सवार चल रहा है। साइकिल के पीछे कैरियर लगा है, जिस पर ताजा काटी हुई ऐसी वनस्पति लदी है, जो साइकिल के दोनों ओर दो से ढाई फीट तक पसरी हुई है। ऊंचाई इतनी कि साइकिल चालक के कंधे बमुश्किल दिखाई पड़ रहे हैं। उसकी साइकिल की गति इतनी मंथर है कि लड़खड़ाकर चलता कोई छोटा बच्चा तक शरमा जाए। उसके पीछे सरकती हुई गाड़ियों की कतार लगी हुई है।

 

वजह सामने से ट्रकों और गाड़ियों का रेला चला आ रहा है। बगल में सड़क की पटरियां खुदी पड़ी हैं और आप किसी भी हालत में अपनी लेन के बीचोबीच चलते उस साइकिल सवार को ओवरटेक नहीं कर सकते। अचानक वह डगमगाकर गिर पड़ता है और खुद को किसी तरह साइकिल से जुदा कर पीछे वाली गाड़ी के चालक के मुंह पर मुक्का जड़ देता है। उसका आरोप है कि लगातार ‘हॉरनबाजी' से उसका ध्यान भटक गया।

 

दृश्य 2 : दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग-58। सड़क के बीचोबीच एक ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटी पड़ी है और उसमें लदी ईंटें हर तरफ बिखर गई हैं। ट्रैफिक बुरी तरह जाम हो चुका है। जाम में तमाम गाड़ियों के अलावा एंबुलेंस तक फंसी हुई हैं। लोग पुलिस को कोस रहे हैं। उधर ट्रैक्टर चालक और उसके हमराह खराब सड़क का रोना रो रहे हैं। पुलिस को कोसने वाले उस ट्रैक्टर चालक से यह तक नहीं पूछ पा रहे कि तुम्हारी ट्रैक्टर की ट्रॉली क्या राजमार्ग पर माल ढोने के लिए है?

 

दृश्य 3 : गई 26 अप्रैल को मैं नोएडा के एक टीवी चैनल में फिसलकर गिर पड़ा। पैर की दो हड्डियां टूट जाती हैं। एंबुलेंस आती है, पर उसे चार किलोमीटर का रास्ता तय करने में 30 मिनट से अधिक वक्त लगता है। वजह अनियंत्रित ट्रैफिक, गलत दिशा से आती गाड़ियां, तर्कहीन स्पीड ब्रेकर और असंवेदनशील राहगीर। बता नहीं सकता कि दर्द की उस छटपटाहट को इस क्रूर हालात ने किस कदर बढ़ा दिया।

 

भारतीय सड़कें अव्यवस्था, अराजकता और अपघात की पर्यायवाची बन गई हैं। एक शोध के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष तरह-तरह की सड़़क दुर्घटनाओं में डेढ़ लाख से अधिक लोग जान गंवा बैठते हैं और घायल होने वालों की संख्या तो इससे कहीं ज्यादा है। इन घायलों में कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनका पूरा इलाज चिकित्सा विज्ञान के पास नहीं होता है। वे जीवन भर अपनी हर सांस के साथ एक व्यथा जीते हैं। यह हम हिन्दुस्तानियों का ही हौसला है कि इससे निपटने के लिए जब ट्रैफिक कानून में सख्ती की गई, तो आज उसका विरोध हो रहा है। ऐसा करके क्या हम दुर्घटनाओं को बढ़ावा नहीं दे रहे? और कोई करे न करे, पर मैं देश की सड़कों को सुरक्षित बनाने वाले इन सुधारों का समर्थन करता हूं।

 

हमारे देश में एक तो कानून जर्जर हैं और दूसरे उनका अनुपालन लगभग असंभव है। पिछले महीने तक जो मोटर-व्हीकल ऐक्ट लागू था, उसे 1989 में लागू किया गया था। तब से अब तक हालात कितने बदल गए हैं? 1991 में भारत में कुल एक करोड़ 19 लाख गाड़ियां थीं, जो अब 25 करोड़ तक पहुंच गई हैं। अगर आप अंबेसडर और फिएट के उस युग को याद करें, तो पाएंगे कि तब से अब तक वाहनों की गति और गुणवत्ता में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। यही नहीं, राजमार्गों की संख्या भी बढ़ी है और पहली बार एक्सप्रेस-वे विस्तार पा रहे हैं। ऐसे में, स्पीड के शौकीन अक्सर हादसों का कारण बनते हैं। ऐसा नहीं है कि नए कानून में गति सीमा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। विभिन्न सड़कों पर 50 से 120 किलोमीटर प्रतिघंटा तक की गति निर्धारित की गई है। पहले यह 30 से 65 किलोमीटर तक हुआ करती थी। पर फर्राटों के अभ्यस्त भला इसे क्यों मानें?

 

यहां प्रसंगवश बताने में हर्ज नहीं कि 1989 से अब तक रुपये का भयंकर अवमूल्यन हुआ है। 30 साल पहले एक डॉलर की कीमत 16-17 रुपये के आसपास हुआ करती थी। अब यह लगभग चौगुनी हो चुकी है। मतलब साफ है कि हम साल-दर-साल 1989 के मुकाबले कम जुर्माना चुका रहे थे। मुद्र्रास्फीति के चलते यदि आप अपने उत्पादों की कीमत बढ़ाते हैं, अधिक वेतन की आकांक्षा रखते हैं, जरूरत की चीजों का अधिक मूल्य चुकाते हैं, तो फिर यह नियम अपराध और जुर्माने पर लागू क्यों नहीं होता?

 

जानने वाले जानते हैं कि तमाम पश्चिमी देशों के मुकाबले हिन्दुस्तान में यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर कम दंड लगाया जाता है। मसलन, अमेरिका के वर्जीनिया में गति सीमा तोड़ने पर एक लाख 80 हजार रुपये जुर्माने के साथ 12 महीने की कैद तक की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है, जबकि अपने यहां नए नियम के तहत अधिकतम 4,000 रुपये अर्थदंड का प्रावधान है। ब्रिटेन में इसी नियम के उल्लंघन में 9,000 रुपये जुर्माने के साथ तीन पेनल्टी प्वॉइंट भी दर्ज किए जाते हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, परंतु क्या समझदार लोग इतने मात्र से समझ जाएंगे? जो नहीं समझते, उन्हें समझाने के लिए ही तो यह कानून बना है। हमें इनका विरोध नहीं, खैरमकदम करना चाहिए।

 

यह आश्चर्यजनक है कि खुद भाजपा शासित तमाम राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। मोदी सरकार ने पिछले पांच सालों में ऐसे तमाम फैसले किए हैं, जिनमें उन्होंने जनभावना से ज्यादा जनलाभ की चिंता की है। इस मामले में भी भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों द्वारा शासित प्रदेशों को इस सिद्धांत का ख्याल रखना चाहिए।