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अर्थव्यवस्था सुधारने का मौका-- हिमांशु

आगामी 1 फरवरी को पेश होने वाला बजट मौजूदा सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि 2019 का बजट लेखानुदान होगा। हालांकि मोदी सरकार का यह आखिरी पूर्ण बजट होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि 2019 में चुनावी नतीजा किस करवट बैठता है? इसका मतलब यह है कि आगामी बजट महज इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इससे अर्थव्यवस्था को कौन-सी दिशा मिलती है, बल्कि यह मौजूदा सरकार का राजनीतिक भविष्य भी तय करेगा। जाहिर है, बजट की रूपरेखा पर ही यह सब कुछ निर्भर होगा।


किसी भी बजट का रूप-रंग कैसा होगा, यह अर्थव्यवस्था की सेहत को देखकर कमोबेश पता चल जाता है, मगर बड़ी हकीकत यह भी है कि चुनाव-पूर्व बजट की अपनी राजनीतिक अपेक्षाएं भी होती हैं। लिहाजा दो राय नहीं कि 2018 के बजट में चुनावी गणित का भरपूर ख्याल रखा जाएगा। लेकिन क्या यह देश की आर्थित सेहत को सुधारने वाला बजट भी साबित हो सकेगा? इस सवाल के जवाब के लिए हमें 1 फरवरी का इंतजार करना होगा।


जहां तक अर्थव्यवस्था का सवाल है, तो स्थिति गौर करने लायक है। ग्रामीण भारत में मजदूरी दर में पिछले साल उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी, पर अब इसमें गिरावट दर्ज की गई है, जिस कारण गांवों की आर्थिक सेहत बदतर हो चली है। मई 2014 और अक्तूबर 2017 के बीच खेतिहर मजदूरों की वास्तविक मजदूरी सालाना 0.67 फीसदी की दर से बढ़ी, मगर इसी दरम्यान गैर-खेतिहर मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में सालाना 0.24 फीसदी की गिरावट आई। मानसून जरूर पिछले साल काफी अच्छा रहा, पर बारिश में इस कदर असमानता रही कि खरीफ फसलों की पैदावार में 2.8 फीसदी की कमी आई है। इससे कृषि उत्पादन पर खासा असर पड़ा है।


कृषि मंत्रालय के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले इस साल सर्दियों की बारिश में कमी आई है और जलाशय का स्तर काफी नीचे चला गया है। गेहूं की बुवाई में 4.7 फीसदी और तिलहनों की 3.7 फीसदी कमी के साथ रबी फसलों की कुल बुवाई में 0.9 फीसदी की गिरावट आई है। सिर्फ दाल के रकबे में वृद्धि देखी गई है, और वह भी चना के कारण संभव हो सका है, वरना तमाम दलहन का उत्पादन या तो स्थिर है या कम। साफ है, कृषि की सेहत अच्छी नहीं दिख रही। कम से कम रबी सीजन में उसमें सुधार के लक्षण नहीं दिख रहे हैं। मतलब साफ है कि कृषि संकट अभी कुछ दिनों तक और बना रह सकता है।


मुश्किल यह है कि इसे सुधारने की दिशा में बहुत ज्यादा संभावनाएं नहीं दिखाई देतीं। सरकारी खजाने की सेहत अच्छी नहीं है, क्योंकि सरकार पहले से ही राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से कहीं अधिक खर्च कर रही है। यह देखते हुए कि महंगाई दर बढ़ रही है और इसके निकट भविष्य में संभलने की संभावना नहीं है, वित्त मंत्री पर सरकारी खजाने की चिंता कहीं ज्यादा हावी रहेगी। इसके अलावा, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेजी और चालू खाता घाटे के बढ़ने से विनिमय दर पर भी दबाव रहेगा। चूंकि निर्यात पहले से ही सुस्त अवस्था में है और आयात बढ़ रहा है, लिहाजा अंतरराष्ट्रीय स्थिति भी शायद ही हमारी अर्थव्यवस्था को संजीवनी दे सके। हां, घरेलू मोर्चों पर आर्थिक सेहत में संभवत: सुधार आ सकता है, पर निजी निवेश और अत्यधिक आपूर्ति के कारण सुधारों की गति शायद धीमी होगी।


खस्ता आर्थिक हालत के लिए तमाम कारक जिम्मेदार हैं। पिछले तीन वर्षों में कच्चे तेल की कीमतों में कमी और कम महंगाई दर सरकार के लिए सुनहरा मौका हो सकता था, मगर उसने उसे जाया होने दिया। यहां तक कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी इसलिए बिगड़ी, क्योंकि उस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। अब मौजूदा विकल्पों में से ही किसी पर आगे बढ़ना होगा, क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारना काफी जरूरी हो गया है। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ग्रामीण भारत अब राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन चुका है। मगर सवाल यह है कि क्या सरकार के पास ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने की कोई ठोस योजना है भी या नहीं?


घरेलू मूल्यों में अस्थिरता और वैश्विक कीमतों में वृद्धि ही किसानों के सामने मुश्किलें नहीं खड़ी कर रहीं, बल्कि बढ़ती उत्पादन लागत और मौसमी उतार-चढ़ाव भी उसकी राह को दुश्वार बना रहे हैं। इन्हें देखते हुए कृषि क्षेत्र में ऐसे निवेश की जरूरत है, जो लंबे समय तक प्रभावी हो। जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश 4.7 फीसदी तक कम हो गया है।


हालिया संकट की वजह लंबे वक्त से कृषि अर्थवस्था की अनदेखी तो है ही, इसके कई समकालीन कारक भी हैं। यही कारण है कि कृषि नीति की दिशा को बदलना होगा। महज वोट की खातिर छोटे-छोटे उपायों से बचने की जरूरत है। अभी उत्तर प्रदेश और कई अन्य जगहों पर हमने देखा है कि कैसे कर्जमाफी ने चुनावी जीत तो दिलाई, पर किसान कर्ज के जाल में न फंसे, इसकी उचित व्यवस्था नहीं की जा सकी है। लिहाजा जरूरी है कि केंद्र सरकार बजट में सिर्फ अगले चुनाव की ही नहीं सोचे, बल्कि अगले दशक-दो दशक की जरूरतों को भी ध्यान में रखे। बेरोजगारी का संकट और कृषि अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत से उपजी नाराजगी सड़कों पर भले न दिख रही हो, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बजट में राजकोष को ध्यान में रखते हुए भी सरकार को ग्रामीण संकट से बचने और सामाजिक तानाबाना मजबूत करने के लिए सार्वजनिक खर्च में वृद्धि करने का प्रावधान करना चाहिए। गांवों के इन्फ्रास्ट्रक्चर, सिंचाई आदि पर निवेश बढ़ाने की जरूरत है। यह वक्त न्यूनतम समर्थन मूल्य को तय करने के तंत्रों को दुरुस्त करने का भी है। अगले बजट से देशवासियों की ये तमाम अपेक्षाएं जुड़ी हुई हैं। बिना इन्हें पूरा किए अर्थव्यवस्था को नया जीवन देना भी संभव नहीं होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)