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असली चुनौती अभी कायम है-- अजीत रानाडे

त्रैमासिक राष्ट्रीय आय पर 31 अगस्त को जारी आधिकारिक आंकड़े में बताया गया कि अप्रैल से जून की तिमाही के दौरान देश के जीडीपी की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही. यह वृद्धि 7.5 अथवा 7.6 प्रतिशत की उम्मीद से ही नहीं, बल्कि 8 प्रतिशत के एक मनोवैज्ञानिक स्तर से भी स्पष्टतः अधिक थी, जो पिछली नौ तिमाहियों में सर्वाधिक होने की वजह से आर्थिक मोर्चे पर एक खुशखबरी है.


पिछले वर्ष जून में समाप्त तिमाही के दौरान 5.7 प्रतिशत के निचले स्तर से अगली पांच तिमाहियों में लगातार ऊपर उठते हुए यहां तक की विकास यात्रा के बाद यह सवाल सहज ही पैदा होता है कि क्या हम 8 प्रतिशत से ऊपर की इस वृद्धि दर को आगे कायम रख सकेंगे?


ऊंची वृद्धि दर जरूरी है, क्योंकि इसका अर्थ आय, जॉब और उपभोग की अधिकता ही नहीं, सरकार के लिए भी ज्यादा राजकोषीय संसाधनों (करों) की प्राप्ति है. इसे ऊंचे स्तर पर बनाये रखने के लिए इसके विभिन्न कारकों में संतुलित गति आवश्यक है, जिसके अंतर्गत एक साथ उपभोग, निवेश तथा निर्यातों में वृद्धि होनी चाहिए. व्यय पक्ष से देखने पर उपर्युक्त तीनों कारक ‘मांग' में वृद्धि लाते हैं.


यदि व्ययों में वृद्धि हो रही है, तो यह एक सतत विकास की संकेतक होती है. मांग में वृद्धि के कारक ही आपूर्ति में भी वृद्धि लाते हैं, जो उद्योगों, सेवाओं तथा कृषि के उत्पादों से की जाती है. सतत विकास हेतु इनमें भी सतत वृद्धि जरूरी है.
ऊंची जीडीपी वृद्धि दर से विनिर्माण गतिविधियों में 13.5 प्रतिशत की वृद्धि संभव हो सकी. इस तथ्य की तुलना में कि एक वर्ष पूर्व विनिर्माण क्षेत्र में 1.8 प्रतिशत का संकुचन था, यह उपलब्धि वस्तुतः उल्लेखनीय है. पिछले जून में भी हम नोटबंदी के असर से उबरने में लगे थे, जिसने लघु, मध्यम तथा अनौपचारिक क्षेत्रों को अपेक्षा से अधिक चोट पहुंचायी थी.


विनिर्माण गतिविधि निर्यातों से संबद्ध है. निर्यातों में 12.4 प्रतिशत की स्वस्थ वृद्धि हुई, जिससे विनिर्माण में तेजी आयी. यदि अगली तिमाहियों में निर्यातों की वर्तमान गति बनी रही, तो विनिर्माण की वृद्धि में बड़ी मदद मिलेगी. रुपये की विनिमय दर में गिरावट निर्यातों के लिए सहायक होगी, हालांकि आयातित कच्चे तेल पर निर्भर तथा एक विशुद्ध आयातक होने की वजह से, हम रुपये में तेज गिरावट गवारा नहीं कर सकते.
वृद्धि पर व्यय को हम पिछली तीन तिमाहियों में सरकारी व्ययों में क्रमशः 6.8, 16.9 तथा 7.6 प्रतिशत की वृद्धि देखते हैं, जो जीडीपी की वृद्धि हेतु प्रमुख व्यय रूपी ईंधन रहा और इसने नोटबंदी के बाद पिछले वर्ष मांग में आयी कमी की भरपाई कर दी. पर व्यय के इस स्तर के लिए राजकोषीय संसाधन आवश्यक हैं.


आयकर रिटर्न दाखिल करनेवालों की तादाद में रिकॉर्ड वृद्धि एवं जीएसटी के मासिक राजस्व में क्रमशः आती स्थिरता के बावजूद राजकोषीय स्थिति सुखद नहीं है. कर्जमाफी, आपदा राहत तथा दबावग्रस्त बैंकों में पुनः पूंजी लगाने जैसे अतिरिक्त दायित्व सरकार को विकास का एकमात्र इंजन बने नहीं रहने दे सकते.


विकास को आपूर्ति पक्ष से देखने पर हम पाते हैं कि पिछली दो तिमाहियों के दौरान निर्माण क्षेत्र में 11.5 और 8.7 प्रतिशत की वृद्धि आयी. माॅनसून में यह वृद्धि उल्लेखनीय है. पर यहां भी सड़क निर्माण पर सरकार का बड़ा जोर, आंध्र द्वारा अमरावती में नयी राजधानी का निर्माण या फिर रेलवे, बंदरगाहों तथा हवाई अड्डों पर सरकारी व्यय इसके प्रच्छन्न कारक रहे हैं.


हालिया तिमाही में कृषि में 5.3 प्रतिशत वृद्धि हुई, जो पांच तिमाहियों में सर्वाधिक है. दुर्भाग्य है कि यह वृद्धि किसानों के लिए अधिक आय में नहीं बदलती, क्योंकि कृषि राष्ट्रीय आय में महज 14 प्रतिशत तथा ग्रामीण आय में सिर्फ एक-तिहाई का ही योगदान करती है.


जब तक हम निजी निवेश-व्ययों एवं निर्यातों से मांग में तेजी नहीं लायेंगे, 8 फीसदी की इस दर को टिकाये रखना मुमकिन नहीं हो सकेगा.


जीडीपी से निवेश का अनुपात कई तिमाहियों से घटता जा रहा है, जो अप्रयुक्त उत्पादन क्षमता, घरेलू क्षमताओं को हतोत्साहित करते निर्यातों में तेज वृद्धि, ऊंची ब्याज दरों, भू-अधिग्रहण की मुश्किलें तथा कारोबारी सुगमता की कठिनाइयों से बाधित है. दिवाला प्रक्रिया की वजह से बुरे कर्जों में फंसी बैंक की निधियां मुक्त कराने में मदद मिल रही है, जो ऋणों का पुनर्प्रवाह सुनिश्चित करते हुए निजी औद्योगिक निवेश सुगम बनायेगा.


निर्यातों के मोर्चे पर संरक्षणवादी बनने से कोई लाभ नहीं. आयात अवरोधों का इस्तेमाल कर हम केवल घरेलू उद्योगों की अकुशलता ही बढ़ाते हैं.


इन अवरोधों में कमी से ही, खासकर लघु एवं मध्यम उद्यमों को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं का हिस्सा बनने में सहायता मिलती है. कमजोर रुपये से भी इसमें मदद मिलेगी. जीएसटी के अंतर्गत निर्यातों को शून्य दर पर लाने से भी बड़ा लाभ होगा. जीडीपी वृद्धि की वर्तमान दर बनाये रखने में निर्यातों में दो अंकों की लगातार वृद्धि बहुत मददगार सिद्ध होगी.


इस वित्तीय वर्ष में भारत चार विपरीत वृहत कारकों से जूझ रहा है. तेल तथा जिंसों की ऊंची कीमतों से मुद्रास्फीति ऊंची है. घरेलू उपभोग से समर्थन पाते निर्यातों की तेजी से चालू खाते का घाटा ऊंचा बना हुआ है.


नये गैर-बजटीय दायित्वों से खासकर राज्यों के स्तर पर राजकोषीय घाटा और भी ऊंचाई की ओर अग्रसर है. तरलता पर नकेल एवं मुद्रास्फीति की चिंताओं से ब्याज दरें भी क्रमशः चढ़ रही हैं. इसलिए, शेष वर्ष में यदि हम सभी क्षेत्रों में संतुलन रखते हुए 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर भी कायम रख पाते हैं, तो खुद को खुशनसीब ही समझना चाहिए.
(अनुवाद: विजय नंदन)