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अस्वस्थ बच्चे अस्वस्थ देश के भविष्य

भारत के महापंजीयक की "भारत में मृत्यु के कारण" शीर्षक से जारी रिपोर्ट के अनुसार पाँच साल से कम आयु के करीब आधे बच्चों का वजन सामान्य से कम है और इसका कारण कुपोषण है।

ऋतु सारस्वत



स्वास्थ्य और मानव विकास एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और यदि स्वास्थ्य का प्रश्न बच्चों से जुड़ा हुआ हो, तो यह और अधिक संवेदनशील विषय हो जाता है। हाल ही में महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री ने राज्यसभा में इस तथ्य का खुलासा किया कि भारत के महापंजीयक की "भारत में मृत्यु के कारण" शीर्षक से जारी रिपोर्ट के अनुसार पाँच साल से कम आयु के करीब आधे बच्चों का वजन सामान्य से कम है और इसका कारण कुपोषण है। चिकित्सकों के अनुसार देश में कुपोषण के लिए मुख्य रूप से भोजन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उत्तरदायी है। कुपोषण के कारण ही बच्चे न्यूरो, ग्वायटर, थाइरॉयड, साँस आदि से संबंधित बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। वाशिंगटन के अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत, बांग्लादेश और यमन में पाँच साल से नीचे की उम्र वाले करीब ४० फीसद बच्चों का वजन कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर विश्व भूख सूचकांक में सबसे अधिक योगदान देने वालों में कम वजन वाले बच्चे होते हैं। भारत में कुपोषण की समस्या को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनीसेफ और स्वयंसेवी संगठन, निरंतर चिंता जाहिर करते रहते हैं परंतु केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारें इस संदर्भ में संवेदन शून्य प्रतीत होती हैं। सिर्फ कागजी शेर बनी स्वास्थ्य योजनाएँ भारत के नौनिहालों का जीवन बेहतर नहीं कर सकतीं। संयुक्त राष्ट्र की कुछ समय पूर्व जारी रिपोर्ट ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि विकास के तमाम दावों के बावजूद भारत में कुपोषण की समस्या अपने गंभीर रूप में ज्यों की त्यों बनी हुई है।

यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले वर्ष प्रति एक हजार में छियासठ बच्चे पाँच साल की आयु पूरी करने से पहले ही मौत के मुँह में चले गए। यह आँकड़ा यद्यपि बीस साल पहले के मुकाबले कुछ कम भयावह जरूर है लेकिन कई वर्षों से आठ फीसद से ज्यादा विकास करने वाले देश में इतने बड़े पैमाने पर बच्चों के पाँच साल पूरा करने के पहले ही काल-कलवित हो जाना लज्जा का विषय है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की घोषणा और क्रियान्वयन से यह आस जागी थी कि अस्वस्थ भारत की तस्वीर बदल जाएगी परंतु स्थिति बदतर ही होती जा रही है।

प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर इसका जिम्मेदार देश की आबादी को मानता है। अगर इसमें सत्यता होती तो क्या यह संभव था कि चीन में कुपोषण के शिकार लोगों की तादाद भारत से छः गुना कम होती है। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि भारत में क्यों सर्वाधिक कुपोषण है। लिहाजा इससे निपटने के लिए छुटपुट ढंग से उपयोगी नहीं बल्कि एक बड़े अभियान की जरूरत है।