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आंबेडकर को जितना अस्वीकार वर्तमान राजनीति ने किया है, उतना किसी और ने नहीं किया

हमारे समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों ने बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की प्रासंगिकता बढ़ा दी है. इधर हाल के कुछ वर्षों में डॉक्टर आंबेडकर को पढ़ने और समझने की चेतना विकसित हुई है. अब उन्हें कोई अनदेखा नहीं कर सकता है.

भाजपा हो, कांग्रेस हो या मार्क्सवादी पार्टियां- डॉक्टर आंबेडकर के बिना वे चुनावी वैतरणी नहीं पार कर सकती हैं. लेकिन क्या डॉक्टर आंबेडकर को केवल चुनाव जीतने के लिए याद किया जायेगा? उन्हें एक चुनावी महनायक बनाकर वोट बटोरा जायेगा?

आंबेडकर की एक विचार के रूप में उपस्थिति
कहते हैं जिन समूहों के पास कमजोर जमीन होती है, वहां रचनात्मकता भी सबसे अधिक होती है. बीसवीं शताब्दी के भारत में कई नेताओं ने इसे अलग-अलग पहचाना.

डॉक्टर आंबेडकर ने इसे अस्पृश्यों और कमजोर समूहों, स्त्रियों के लिए पहचाना कि जब तक उनका उत्थान नहीं होगा, भारत एक देश और कौम के रूप में असफल ही रहेगा.

उनका मानना था कि अगर किसी एक चीज ने भारतीय समाज को एक पतनशील समाज में परिवर्तित कर दिया है और उसे जिंदा कौम की जगह मुर्दा कौम में तब्दील कर दिया है तो उस चीज का नाम है: जाति व्यवस्था.

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