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आखिर किस कीमत पर विकास? - एमएम बुच

प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से कहा था कि भारत में तीव्र आर्थिक विकास और औद्योगीकरण आवश्यक है, किंतु उत्पादन की गुणवत्ता इतनी ऊंची होनी चाहिए कि विश्व भर में उसकी ख्याति हो। साथ ही विकास एवं औद्योगीकरण पर्यावरण के अनुकूल हो। इस ओर विशेष ध्यान दिया जाए कि विकास के कारण पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।

यूपीए सरकार से यह शिकायत रहा करती थी कि भू-अर्जन नीति तथा पर्यावरण संबंधित नियमों के कारण भारत में प्राय: कोई भी विकास योजना क्रियान्वित करना बहुत कठिन हो गया है। बरसों तक पर्यावरण संबंधी कारणों से कार्य करने की अनुमति मिलती ही नहीं थी। नई सरकार ने इस प्रक्रिया में गति लाने का वादा किया था एवं तत्पश्चात पर्यावरण, वन एवं मौसम परिवर्तन मंत्रालय ने अनेक प्रस्तावों को अनुमति दी भी। पिछले महीने इस मंत्रालय ने एक उच्चस्तरीय समिति गठित की, जिसके अध्यक्ष पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यन बनाए गए। लेकिन इस समिति में एक भी वन अधिकारी या विशेषज्ञ, पर्यावरण विशेषज्ञ, वन्य प्राणी विशेषज्ञ सदस्य नहीं है। इस समिति को कार्य सौंपा गया है कि वह वन प्रतिरक्षा अधिनियम, पर्यावरण प्रतिरक्षा अधिनियम, वन्य प्राणी प्रतिरक्षा अधिनियम, जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम एवं वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम की समीक्षा करे, विशेषकर इस दृष्टि से कि ये वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप हैं या नहीं।

दिसंबर 1984 में हुआ भोपाल गैस कांड दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में से एक था। यूनियन कार्बाइड की भोपाल में जब स्थापना हुई, तब इतना तो बताया गया था कि कीटनाशक दवाएं बनाई जाएंगी, परंतु निर्माण की प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं बताया गया था और न ही इस ओर कोई इशारा किया गया था कि इस काम के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पदार्थ कितने घातक हैं। बाद में यूनियन कार्बाइड ने प्रस्ताव रखा कि उसे कारखाने का विस्तार करने की इजाजत दी जाए। तब तक भोपाल की विकास योजना बन चुकी थी। इस प्रस्ताव का परीक्षण उसके तहत किया गया। योजना में सभी रासायनिक उद्योगों को हानिकारक उद्योगों की श्रेणी में रखा गया था और उनके लिए एक विशेष क्षेत्र निर्धारित किया गया था। यूनियन कार्बाइड को निर्देश दिए गए कि वह नया कारखाना उस विशेष क्षेत्र में स्थापित करे, लेकिन उसने शासन के आदेशों का पालन नहीं किया। उसका परिणाम भोपाल के लोग आज तक भुगत रहे हैं। अभिप्राय यह कि अनियंत्रित औद्योगीकरण न केवल पर्यावरण अपितु मनुष्यों के लिए भी घातक हो सकता है। इस कारण पर्यावरण से संबंधित अधिनियमों से छेड़खानी करना ठीक नहीं है।

हमने अपने वनों की बेरहमी से कटाई की है। हरा-भरा झाबुआ व खरगोन का आदिवासी क्षेत्र दोनों उजड़ गए हैं, क्योंकि भूमि आवंटन के नाम पर वहां राजनीतिक दलों ने आदिवासियों को अतिक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया और फिर अतिक्रमणों को नियमित किया गया। इससे जंगल बर्बाद हुए, भू-क्षरण बढ़ा, नदियों का पानी सूख गया। चूंकि जमीन खेती के लिए उपजाऊ नहीं है, इस कारण आदिवासियों को भी कोई लाभ नहीं हुआ। इन क्षेत्रों में वनों का महत्व देखना हो तो आज भी झाबुआ जिले के रमा विकासखंड में स्थित खरदू बड़ी, खरदू छोटी एवं झकेला की पहाड़ी को देखना चाहिए। लगभग तीन हजार एकड़ की इस पहाड़ी को जलग्रहण क्षेत्र विकास योजना के अधीन राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केंद्र ने हाथ में लिया, इस पहाड़ी को सुरक्षित किया गया, उसका वनीकरण हुआ और उसके आसपास के आठ गांवों में जलग्रहण क्षेत्र विकास का कार्य तीव्रता से किया गया। आज यह पहाड़ी वनाच्छादित है, इसमें वन्य प्राणी आबाद हुए हैं एवं यहां बाघ के पदचिह्न भी देखे गए हैं। इस क्षेत्र में जो कार्य हुआ है, उसके कारण आठ गांवों में भूजल स्तर बढ़ा है, कुओं में पानी है, वहां आदिवासी दुफसली खेती कर रहे हैं। पशुओं के लिए पर्याप्त चारा है और इन आठ गांवों से जो हर वर्ष पलायन होता था, वह बंद हो गया है। यह है वन की शक्ति।

भारत में वनों पर प्रहार विकास योजनाओं से भी हुआ - चाहे वह खनिजों के उत्खनन के लिए हो, बस्तर के पखांजोर क्षेत्र में बंगाली शरणार्थियों के लिए बनाई गई दंडकारण्य योजना हो, नवीन उद्योगों की स्थापना हो या सड़क निर्माण हो। वनों की दुर्दशा को देखते हुए इंदिरा गांधी ने सन् 1980 में वन्य प्रतिरक्षण अधिनियम लागू किया था, जिससे कुछ हद तक वनों की कटाई पर अंकुश लगा। शिकायत यह अवश्य है कि इस अधिनियम का उपयोग ऐसे हुआ कि विकास योजनाएं प्राय: बंद हो गईं, परंतु स्थिति को सुधारा जा सकता है। क्योंकि यदि यह अधिनियम न होता तो मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को भोपाल स्थित इंदिरा निकुंज नामक वन क्षेत्र को एक होटल को आवंटित करने से नहीं रोका जा सकता था। वन का यह टुकड़ा आज भी सुरक्षित है। परंतु यह भी सही है कि इस कानून के बावजूद ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने सुवर्णरेखा योजना के लिए 24 लाख वृक्ष काटने की अनुमति लगभग रातोंरात प्राप्त की। उस योजना का लाभ क्या हुआ, यह तो मैं नहीं जानता, परंतु इतना जरूर है कि उससे ओडिशा का एक बड़ा वनक्षेत्र बर्बाद हुआ।

बताया जाता है कि यदि वन कटते हैं तो वन उगाए भी जा सकते हैं। जर्मनी के नॉर्थ राइन वेस्टफालिया राज्य की सरकार ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्णय लिया कि वहां यदि उत्खनन होना है तो प्रस्ताव देने वाले उद्यमी को एक वनक्षेत्र के विकास की संपूर्ण योजना प्रस्तुत करनी होगी। उस पर होने वाले व्यय का अनुमान भी योजना का हिस्सा है और यह कार्य करने के लिए उद्यमी को शासन में प्रतिभूति जमा करनी होती है। मैंने वहां के उत्खनन क्षेत्र का भ्रमण किया है और स्वयं देखा है कि जहां एक ओर उत्खनन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भूमि का जीर्णोद्धार भी हो रहा है। भारत में भी हमने नीति अपनाई है कि अगर पेड़ कटे तो क्षतिपूर्ति वनीकरण अनिवार्य है, परंतु उसका क्रियान्वयन हास्यास्पद है। उदाहरणार्थ टिहरी की जल विद्युत परियोजना के लिए वन तो शिवालिक क्षेत्र में काटे गए परंतु क्षतिपूर्ति वनीकरण के लिए भूमि झांसी के पास बुंदेलखंड में दी गई। साथ ही जो मिश्रित वन काटे जाते हैं, उन्हें उसी स्थिति में पुनर्जीवित करने का कोई प्रयास नहीं होता, बल्कि शीघ्र उगने वाले निकम्मे वृक्ष लगाकर हम संतुष्ट हो जाते हैं।

जैसे शहर और गांव मनुष्य का आवास स्थल हैं, वैसे ही वन वन्य प्राणियों का आवास स्थल हैं। यदि हमें वन्य प्राणी बचाने हैं तो जंगल बचाने होंगे। वैसे भी उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में हम देख चुके हैं कि यदि पहाड़ी क्षेत्र में वनों की कटाई हो तो भूस्खलन कितनी जल्दी होता है और बारिश कितनी तेजी से नदियों में उफान लाती है। उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में बर्बादी का कारण प्रकृति का प्रकोप नहीं है, बल्कि मनुष्य की नासमझी और उसके द्वारा जंगलों की बर्बादी है। यदि जंगलों की कटाई हुई तो वर्षा पर निर्भर नदियां सूख जाएंगी और यह सारा क्षेत्र रेगिस्तान बन जाएगा। जलग्रहण, भूमि संरक्षण, भूजल स्तर, कृषि, वन्य प्राणी संरक्षण इन सबके लिए वन अति आवश्यक हैं। अतएव हम प्रधानमंत्री के उन शब्दों को फिर याद करें कि औद्योगीकरण तो हो मगर इससे पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। मैं यह नहीं चाहता कि कुछ पर्यावरण अतिवादी सारे विकास को रोक दें, पर विकास व पर्यावरण में समन्वय भी आवश्यक है।