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आज नकद कल रियायत- शिरीष खरे की रिपोर्ट( तहलका हिन्दी)

राजस्थान में अलवर जिले के कोटकासिम ब्लॉक का यह ओजली गांव है. यहां ग्राम सेवा सहकारी समिति की उचित मूल्य की दुकान पर तीन महीने पहले तक केरोसिन के लिए उपभोक्ताओं की भीड़ जमा हो जाती थी. पर अब उसी केरोसिन के नाम पर चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है. दुकान के कर्मचारी महावीर यादव के मुताबिक इस सन्नाटे की वजह यह है कि जिला कलेक्टर के निर्देश पर केरोसिन अब पहले से तीन गुना अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है.

बीते दिसंबर के पहले तक ओजली सहित कोटकासिम ब्लॉक की सभी दुकानों पर हर उपभोक्ता को 15 रु प्रति लीटर की दर से तीन लीटर केरोसिन मिल जाता था. मगर अब इस ब्लॉक के लोगों के लिए एक लीटर केरोसिन पर 45 रु चुकाने का आदेश जारी हुआ है. ओजली के बलवीर चौधरी कहते हैं कि उनके लिए हर लीटर पर सीधे-सीधे 30 रु और तीन लीटर पर कुल 90 रु अतिरिक्त खर्च करना किसी भी तरह संभव नहीं.

आने वाले दिनों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत देश के अन्य उपभोक्ताओं को भी केरोसिन पर कई गुना अधिक रुपया खर्च करना पड़ सकता है. दरअसल योजना आयोग की अनुशंसा पर भारत सरकार रोजमर्रा की जरूरत की सभी चीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी में से अधिक से अधिक बचत की तैयारी कर रही है. फिलहाल इसकी शुरुआत घरेलू उपयोग में काम आने वाले केरोसिन से हो रही है. इसके लिए बीते साल यूआईडीएआई यानी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने केरोसिन पर सीधी सब्सिडी का फॉर्मूला भारत सरकार के हवाले किया था. यह फॉर्मूला कहता है कि पहले राशन की दुकानों पर उपभोक्ताओं को केरोसिन पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म की जाए. फिर सरकार पहले यह तय करे कि वह किन उपभोक्ताओं को सब्सिडी के लायक मानती है. जिन उपभोक्ताओं को वह सब्सिडी के लायक मानती है उनके बैंक खाते खोले जाएं और उसके बाद जो उपभोक्ता राशन की दुकान से बाजार की दर पर केरोसिन खरीद सकता है उसकी सब्सिडी को बैंक खाते में स्थानांतरित किया जाए.

बीते साल भारत सरकार के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने राजस्थान सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में केरोसिन पर सीधी यानी बैंक खातों के जरिए सब्सिडी देने की पायलट परियोजना लागू कराने का प्रस्ताव दिया था. इसे राजस्थान सरकार ने तुरंत स्वीकार किया और बीते दिसंबर में प्रयोग के तौर पर अलवर जिले के कोटकासिम ब्लॉक को चुना.

कई उपभोक्ताओं के लिए बाजार की दर पर रोजमर्रा की चीजों को खरीद पाना संभव नहीं है. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार द्वारा उपभोक्ताओं को बाजार में 45 रु प्रति लीटर की दर से मिलने वाले केरोसिन पर 30 रु की सब्सिडी दी जाती है. मगर कोटकासिम ब्लॉक में चलाई जा रही इस परियोजना के तहत जिला प्रशासन हर उपभोक्ता से एक लीटर केरोसिन के लिए 45 रु वसूल रहा है. हालांकि वह हर उपभोक्ता से वसूली गई 30 रु की अतिरिक्त राशि को उपभोक्ता के बैंक खाते में स्थानांतरित कराने का दावा कर रहा है, लेकिन इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं कि तीन लीटर के हिसाब से क्या हर उपभोक्ता 135 रु का केरोसिन खरीद ही लेगा. कोटकासिम ब्लॉक के कई उपभोक्ता बताते हैं कि उनके लिए बाजार दर पर केरोसिन खरीदने का मतलब है या तो केरोसिन की मात्रा में और अधिक कटौती करना या फिर केरोसिन खरीदना ही बंद कर देना.

कोटकासिम का तजुर्बा बताता है कि सरकार ने गरीबों के आर्थिक व्यवहार के तौर-तरीकों को उपेक्षित किया है. इस परियोजना के अध्ययन से जुड़े वीरेंद्र विद्रोही कहते हैं, ‘एक गरीब उपभोक्ता अपने हिस्से की सब्सिडी बैंक खाते में आने का इंतजार नहीं करना चाहता. उसका खाता कहां खुलेगा, कब खुलेगा, कब उसमें रुपया आएगा और कब वह बैंक से रुपया निकालेगा, ऐसे कई सवालों में कोई भी उपभोक्ता उलझना नहीं चाहता.

यह परियोजना लागू करने से पहले ही भारत सरकार जोर-शोर से प्रचार कर रही है कि अगर केरोसिन बचाने का यह तरीका सफल साबित होता है तो इसे राजस्थान सहित देश के अन्य राज्यों में भी दोहराया जाएगा. अलवर कलेक्टर आशुतोष एटी पेडणेकर की मानंे तो इस तरीके से केवल तीन महीने के भीतर बड़े पैमाने पर सब्सिडी बची भी है. कोटकासिम ब्लाॅक में पहले हर महीने 84 हजार लीटर केरोसिन आवंटित होता था. मगर पेडणेकर का दावा है कि परियोजना लागू होने के पहले ही महीने (दिसंबर) में मात्र 18 हजार लीटर केरोसिन की खपत हुई.

यह और बात है कि सीधी सब्सिडी परियोजना के तहत पहले महीने में खोले गए बैंक खातों का आकड़ा पेडणेकर के दावे की हवा निकाल देता है. कोटकासिम ब्लॉक में उपभोक्ताओं की संख्या 26 हजार है, जबकि दिसंबर महीने में जिला प्रशासन ने यहां केवल छह हजार बैंक खाते खोले. यानी उसने परियोजना के पहले महीने ही 20 हजार उपभोक्ताओं से सीधे-सीधे उनका केरोसिन छीन लिया और 66 हजार लीटर की सब्सिडी नहीं पहुंचाई. इसी तरह, जिला प्रशासन के मुताबिक जनवरी और फरवरी में क्रमशः 23 हजार और 13 हजार लीटर केरोसिन की खपत हुई. दूसरे शब्दों में परियोजना के दूसरे और तीसरे महीने में उसने क्रमशः उपभोक्ताओं को 61 हजार और 71 हजार लीटर की सब्सिडी नहीं पहुंचाई. कुल मिलाकर उसने कोटकासिम ब्लॉक के उपभोक्ताओं से तीन महीने के भीतर 198 हजार लीटर की सब्सिडी छीन ली. इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि केरोसिन की खपत में गिरावट की एक बड़ी वजह केरोसिन की दर में भारी बढ़ोतरी हो सकती है. इससे सिद्ध होता है कि कोटकासिम ब्लॉक की तर्ज पर अगर सरकार सब्सिडी ‘बचाने’ का यह फॉर्मूला पूरे अलवर में अपनाए तो वह जिले में सालाना 46 करोड़ और राजस्थान में सालाना 900 करोड़ रु की सब्सिडी तो केवल केरोसिन पर ही ‘बचा’ सकती है.

हालांकि आम उपभोक्ता के लिए केरोसिन आटा और चावल की तुलना में तुरंत जरूरत की चीज नहीं है. मगर भारत सरकार ने कोटकासिम के प्रयोग को एक औजार के तौर पर इस्तेमाल किया और आटे-दाल में भी इसी तरह सब्सिडी ‘बचाने’ पर उतर आई तो कई और गरीबों की थाली से कल आटा और परसों चावल भी गायब हो सकता है.

कोटकासिम का तजुर्बा बताता है कि सरकार का यह तरीका व्यावहारिक भी नहीं है. इस ब्लॉक की 24 ग्राम पंचायतों में 34 राशन की दुकानों पर 26 हजार उपभोक्ता हैं. जबकि इस परियोजना के लिए केवल छह बैंक हैं. इनमें से भी उपभोक्ताओं के बैंक खाते जीरो बैलेंस पर खोले जाने पर दो बैंकों (एसबीआई और एसबीबीआई) ने अपनी असमर्थता जता दी है. हालांकि राजस्थान ग्रामीण बैंक ने कुछ उपभोक्ताओं को पासबुक जारी की हैं, लेकिन इस कवायद को लेकर लोगों का तजुर्बा अच्छा नहीं है. कोटकासिम से 20 किलोमीटर दूर जाटवा गांव के कालूराम धनपत बताते हैं कि वे बीते तीन महीने में चार बार बैंक जा चुके हैं लेकिन हर बार बैंक से उनके केरोसिन का नकद पैसा नहीं आने की सूचना मिलती है.

राजस्थान उपभोक्ता संरक्षण समिति के प्रांतीय महासचिव आरके सिद्ध बताते हैं कि कोटकासिम में बैंको से सब्सिडी लेने की हकीकत यह है कि बीते तीन महीनों से अधिकतर उपभोक्ताओं का पैसा बैंक खातों में आया ही नहीं. वहीं बैंक सब्सिडी के चक्कर में कई ग्राम पंचायतों (मकड़ावा, बिलाहेड़ी और तिगावा आदि) के उपभोक्ताओं को 15 से 20 किलोमीटर का फासला भी तय करना पड़ता है. इससे उपभोक्ताओं का आर्थिक नुकसान तो होता ही है उनका काफी समय भी खर्च हो जाता है. इसलिए मार्च से उपभोक्ताओं ने केरोसिन के लिए राशन की दुकानों पर जाना बहुत कम कर दिया है.

कोटकासिम ब्लॉक में एक अजीब स्थिति बन चुकी है. यहां केरोसिन का भंडार है लेकिन बैंकों में सब्सिडी नहीं पहुंची है  इसलिए जनता केरोसिन खरीद नहीं सकती. राजस्थान अधिकृत विक्रेता संघ ने इस स्थिति पर आपत्ति जताई है. संघ के प्रांतीय महासचिव ओपी शर्मा कहते हैं, ‘प्रशासनिक अनियमितता के चलते केरोसिन विक्रेता बेरोजगार बैठे हैं.’ दूसरी तरफ राजस्थान खाद्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव जेसी मोहंती आश्वासन देते हैं कि केरोसिन विक्रेताओं को हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी. उधर, स्थानीय विधायक रामहेत यादव का आरोप है कि योजना लागू करने से पहले मोहंती ने भरोसा दिलाया था कि जनप्रतिनिधियों की राय ली जाएगी. वे कहते हैं, 'लेकिन योजना लागू होते ही जिला कलेक्टर से लेकर प्रमुख शासन सचिव तक बेरुखी दिखाई जा रही है'. यह प्रशासनिक बेरुखी का नतीजा ही है कि बीती 29 जनवरी को  कोटकासिम ब्लॉक के सभी 24 सरपंचों ने स्थानीय विधायक की अगुवाई में एक बैठक की और उसके बाद इस परियोजना से जुड़ी अनियमितताओं को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की.

अब देखना यह है कि उनकी यह कवायद क्या रंग लाती है.

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