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आधार को वोटर आईडी से जोड़ना क्यों है खतरनाक?

-न्यूजलॉन्ड्री,

वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करने वाला चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 विपक्ष के विरोध के बावजूद 21 दिसंबर को राज्य सभा से भी पास हो गया. ये विधेयक एक दिन पहले ही लोकसभा से पास हुआ था. विधेयक को स्थाई समिति के पास भेजने की मांग को ठुकरा दिया गया. चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 में वोटर आईडी कार्ड को आधार संख्या से लिंक किए जाने का प्रावधान है.

इस विधेयक में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन किए गए हैं. 1950 के कानून के अनुसार, कोई व्यक्ति निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के पास अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकता है.

इस कानून में संशोधन के बाद इस विधेयक के अनुसार, "निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी किसी व्यक्ति से उसकी पहचान साबित करने के लिए उसका आधार पेश करने के लिए कह सकता है. यदि उसका नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में है, तो सूची में दर्ज एंट्री के प्रमाणीकरण के लिए आधार संख्या की आवश्यकता हो सकती है."

इसमें कहा गया है, "किसी व्यक्ति द्वारा आधार न दे पाने की वजह से न तो वोटर लिस्ट में उसका नाम शामिल करने से वंचित किया जाएगा और न ही वोटर लिस्ट से उसका नाम हटाया जाएगा, बशर्ते इसके लिए (आधार न देने के लिए) उसके पास 'पर्याप्त कारण' हों. 'पर्याप्त कारण' को परिभाषित नहीं किया गया है वोटर आईडी कार्ड का "आधारीकरण" सरकारी हिंसा का हिस्सा है.

वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करने का प्रयास 2012-2015 में चुनाव आयोग ने अंधाधुंध भ्रामक प्रचार कर शुरू हुआ था. तत्कालीन गृह सचिव राज कुमार सिंह और मुख्य चुनाव आयुक्त शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी के बीच के पत्राचार से इसका खुलासा होता है. मार्च 2015 से अगस्त 2015 तक राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धिकरण कार्यक्रम (NERPAP) चलाया था. उस समय चुनाव आयोग ने 30 करोड़ से अधिक वोटर आईडी को आधार से लिंक कर लिया था. इस प्रक्रिया पर रोक सिटीजन्‍स फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज और अन्य लोगों के प्रयास से लगी. बाद में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के वोटर डेटाबेस घोटाले का मामला सामने आया.

आधार कानून की तरह ही बिना चर्चा और बहस के इस विधेयक को पास करा लिया गया. कांग्रेस का विरोध आधा-अधूरा था. आधार से जुड़े मामले में कांग्रेस व अन्य दलों को विरोध करने के तरीके ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी व लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी से सीखना चाहिए. लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स के अध्ययन के बाद ब्रिटेन के दोनों दलों के गठबंधन ने ब्रिटेन के आधार (नेशनल ID) को नष्ट कर दिया. गठबंधन ने अपने चुनाव अभियान में टोनी ब्लेयर सरकार के नेशनल आईडी का विरोध करते हुए ये वादा किया था कि उनके नेतृत्व वाली सरकार इसे रोक देगी. अपने वादे पर वे खरे उतरे. भारत के सियासी दलों के लिए ये एक सबक है. वादे और जुमलों में जमीं आसमां का फर्क होता है.

लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता निक कलेग ने ब्रिटेन के उपप्रधानमंत्री के तौर पर जो भाषण वहां की संसद में दिया वह भी आधार-वोटर आईडी के संदर्भ में समीचीन है.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.