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आधी आबादी का पूरा हक ।।किरन राव।।

सिर्फ महिला दिवस आने पर ही महिलाओं की उपलब्धियों की चर्चा क्यों की जाती है? जेंडर पूर्वाग्रह का यह सबसे बड़ा कारण है. जरूरी है कि हम पूरे साल महिलाओं की उपलब्धियों की चर्चा करें और उनको प्रोत्साहित करें. क्यों किसी महिला का नाम तब तक हमारी जुबान पर नहीं आता, जब तक वह बड़ा कीर्तिमान स्थापित नहीं कर लेती. मेरीकॉम बिल्कुल विपरीत परिस्थिति में खुद को तैयार करती हैं, लेकिन लोग उनके संघर्ष की कहानी सही मायने में तभी जान पाते हैं, जब वह कोई बड़ा काम करती हैं.

मेरा सौभाग्य है कि मुङो एक ऐसा परिवार मिला जहां महिलाओं को अहमियत दी जाती है. हमारे घर में सारे बड़े काम, सारे बड़े निर्णय हम सभी महिलाएं ही लिया करती हैं. आमिर भी सारे फैसलों में मेरी राय लेते हैं. मुङो खुल कर अपनी बात रखने का मौका देते हैं. हर महिला के लिए उसकी पहली पाठशाला घर ही होती है. घर में जैसा माहौल मिलेगा, उसका विकास वैसा ही होगा.

महिलाओं के लिए समान अधिकारों की बात आज भी सपना है. उन्हें सिर्फ भुलावा दिया गया कि स्त्री-पुरुष दोनों बराबर हैं, लेकिन यह कोई नहीं देखता कि उनको दोहरी जिम्मेदारी का निर्वाह करना पड़ रहा है. महिलाएं नौकरी कर रही हैं, फिर भी कहा जाता है कि घर की जिम्मेदारी महिलाओं की ही है. वैसे, यह बात स्वीकारने योग्य है कि सिनेमा जगत में महिलाओं को काफी सम्मान मिला है. वे काफी आगे बढ़ी हैं. पिछले साल के सारे अवॉर्डस पर ध्यान दें तो वहां महिलाओं की दमदार उपस्थिति रही है. बिना किसी बैकग्राउंड के वे आगे बढ़ रही हैं. हुमा कुरैशी, कल्कि, ऋचा चड्ढा, परिणीति, अनुष्का सभी हुनरमंद हैं. दूसरी तरफ पिछले साल बॉलीवुड में महिला प्रधान फिल्मों का दौर रहा.

महिलाएं फिल्मों के तकनीकी क्षेत्र में भी कमाल कर रही हैं. मैं ऐसी कई लड़कियों को जानती हूं, जो फिल्मों के तकनीकी क्षेत्र में ही अपना कैरियर बनाना चाहती हैं. संभव हो तो कभी किसी फिल्म के सेट पर जाकर देखें कि वहां किस समझदारी से लड़कियां काम को हैंडल करती हैं. जबकि लड़के बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं. महिलाएं अगर देर रात तक काम करती हैं, तो सुबह जल्दी उठने में भी आना-कानी नहीं करतीं.

सिनेमा में भी पूरी तरह महिलाओं की स्थिति नहीं बदली है. आज भी अभिनेत्रियों को अभिनेताओं से कम पैसे मिलते हैं. पहले तो महिला निर्देशकों को भी कम पैसे मिलते थे, लेकिन अब स्थिति बदली है. एक अहम बात यह भी है कि महिलाओं के प्रति लोगों को यह विश्वास होना चाहिए कि हां, वे काम कर सकती हैं और शत-प्रतिशत अच्छा काम कर सकती हैं. मीडिया के क्षेत्र में भी कई महिलाएं महत्वपूर्ण काम कर रही हैं. जिस तरह ये तमाम महिलाएं खुद को साबित करती हैं, मुङो उन पर बहुत फा होता है.

एक और अहम बात यह भी है कि महिलाओं को शिक्षा पर समुचित ध्यान देना होगा. जिस वक्त आमिर ‘सत्यमेव जयते’ शो कर रहे थे, उस वक्त रोंगटे खड़े कर देने वाले केस सामने आते थे. उस वक्त भी हमने इस शो के माध्यम से यही साबित करने की कोशिश की थी कि महिलाओं का शिक्षित होना बहुत जरूरी है. निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी जब तक नहीं होगी, तब तक भ्रूण हत्या का सिलसिला भी जारी रहेगा. बालिका भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज महिलाओं को ही उठानी होगी. इस समस्या को लेकर महिला आधारित कई धारावाहिक आंखें खोलनेवाले रहे हैं. इन धारावाहिकों के माध्यम से छोटे स्तर पर ही सही, लोगों की सोच बदली है.

महिला होने का मतलब ही है नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना. स्त्री होने का मतलब खुद में संपूर्ण दुनिया को जी लेना है. एक महिला एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाती है. मैं महिलाओं को आधी आबादी कहने के पक्ष में नहीं. उनके लिए आधे शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए. साथ ही हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि हर महिला को सम्मान मिले फिर चाहे वह एक सीइओ हो या घरेलू महिला. घर की लड़कियों को खुला आकाश दें, फिर देखें वे क्या कमाल कर जाती हैं. जब मैं संगीतकार स्नेहा खानवलकर से मिलती हूं और उनके सफर के सारे अनुभव सुनती हूं तो उनके साहस पर गर्व होता है. वह कहीं भी अकेले चली जाती है, लेकिन उन्हें खुद पर विश्वास है और वह सारी मुसीबतों का हल खुद तलाशती हैं. महिलाएं तभी निडर हो पायेंगी, जब समाज में उनके प्रति सोच बदलेगी. हमें महिलाओं के विकास की बड़ी-बड़ी बातें न करके छोटे-छोटे प्रयासों से शुरुआत करनी चाहिए.
(बातचीत : अनुप्रिया)