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आधी आबादी का संघर्ष-- डा. अनुज लुगुन

तारीखें कैलेंडर में टंगी चुप्पी साधी चीज नहीं होती हैं, यह तो इतिहास के सबल साजो-सामान और विचार को हमारी आंखों के आगे चस्पा कर उस भार का एहसास दिलाती रहती हैं, जो पूर्वजों के कंधों से होकर हमारे वर्तमान में प्रवेश कर जाती हैं.

फर्क इस बात का पड़ता है कि हम यूं ही कैलेंडर के पन्ने पलट देते हैं या उसे पढ़ पाते हैं. ऐसे ही 08 मार्च, 1914 की उस तारीख को याद किया जा सकता है, जब एक जर्मन पोस्टर में संघर्ष का झंडा लहरा रही औरत की तस्वीर के साथ उद्घोषणा की गयी कि ‘हम महिलाओं को मताधिकार दो. अब तक, भेदभाव और प्रतिक्रियावादी नजरिये ने उन महिलाओं को पूर्ण नागरिक अधिकार से वंचित रखा है, जिन्होंने श्रमिकों, माताओं और नागरिकों की भूमिका में पूरी निष्ठा से अपने कर्त्तव्य का पालन किया है एवं जिन्हें नगर पालिका के साथ-साथ राज्य के प्रति भी करों का भुगतान करना होता है.

इस प्राकृतिक मानवाधिकार के लिए हर औरत को दृढ़ एवं अटूट इरादे के साथ लड़ना चाहिए. इस लड़ाई में किसी भी प्रकार के ठहराव या विश्राम करने की अनुमति नहीं है.' उद्घोषणा का यह विचार उस तारीख से और पीछे इतिहास में जाता है.

इसकी कई शृंखलाएं हैं, कई स्वरूप हैं. दुनिया में स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व का विचार देनेवाली फ्रांसिसी क्रांति के दौरान स्त्रियों ने अपने पक्ष में अधिकारों का घोषणापत्र तैयार किया और मांग की कि बिना लैंगिक भेद के कानून बने और लागू हो. ‘मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा' के आधार पर ‘स्त्री और स्त्री-नागरिकों के अधिकारों की घोषणा' तैयार की गयी. ओलंप दे गूज और मेरी वाॅल्स्टनक्राफ्ट के नेतृत्व में आधुनिक विश्व इतिहास में संभवत: यह स्त्री अधिकारों की पहली घोषणा थी. यहां से वैचारिक आधार ग्रहण कर आगे चलकर दुनिया भर में महिलाओं ने क्रांतिकारी आंदोलन किया. आठ मार्च भी उसी की ऐतिहासिक कड़ी है.

स्त्री अधिकारों की बात पुरुष वर्चस्व से लड़े बिना संभव नहीं है. यह असहज लगनेवाली बात होगी, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्त्रियों की मुक्ति की राह में सबसे बड़ी चुनौती पुरुषों द्वारा निर्मित संस्थाएं ही हैं. घर, परिवार, धर्म इत्यादि से लेकर आधुनिक संवैधानिक संस्थाओं तक में पुरुष वर्चस्व है.

इस वर्चस्व से निर्मित मानसिकता स्त्री उत्पीड़न का मूल कारक है. आज हमारे देश में लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था है, लेकिन संसद और विधानसभाओं में स्त्रियों की भागीदारी कितनी है? कुछ समय पहले संसद में स्त्रियों को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात उठी थी, इस पर आज तक पक्ष-विपक्ष में कोई सहमति नहीं बन सकी और विधेयक अटका पड़ा है? ऐसा क्यों?

क्या स्त्रियां सक्षम नहीं हैं? आज भी कई ऐसे सेक्टर हैं, जहां स्त्रियों की भागीदारी नगण्य क्यों है? सामान्य-सा उदाहरण है कि धर्म की दुनिया में आज तक न कोई स्त्री शंकराचार्य बनी है, न कोई पोप बनी, न कोई काजी, और न ही कोई राजनीतिक प्रतिनिधि. इससे कोई समाज, कोई धर्म और राजनीतिक दल मुक्त नहीं है.

अठारहवीं सदी में फ्रांसीसी दार्शनिक ऑगस्त कोम्ट ने सामाजिक संरचना की अवैज्ञानिक व्याख्या करते हुए कहा था कि असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण नारी शरीर की प्राकृतिक दुर्बलता है.

यह पुरुषवादी स्वामित्व का सिद्धांत था, जो आज भी बहुत गहरे मौजूद है. यह सोच हर कदम स्त्रियों को आगे बढ़ने से रोकता है. आज हम ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ' योजना पर काम कर रहे हैं, सुरक्षा के लिए ‘निर्भया फंड' की व्यवस्था है, लेकिन ये तात्कालिक सुधारवादी योजनाएं है.

बेटियों को शिक्षित-सुरक्षित करना बुनियादी पहल है, लेकिन बेटों के संस्कार और व्यवहार में गहरे मौजूद पुरुषवादी सामंती मूल्य को कौन बतायेगा? बेमेल विवाह, तलाक, दहेज, बलात्कार इत्यादि स्त्री शोषण के पुरुषवादी औजार हैं. नारीवादी आंदोलन इस पुरुषवादी मानसिकता के विरुद्ध संघर्षरत है. यह मानसिकता स्त्रियों को न केवल घर की चारदीवारी के अंदर कैद कर रखता है, बल्कि उनके मेहनत और श्रम का मूल्य भी देना नहीं चाहता. यह गैर संवैधानिक है.

आज स्त्रियों का संघर्ष दूसरी तरह की जटिलताओं से घिर रहा है. हाल के दिनों में कई ऐसी उत्पीड़न की घटनाएं सामने आयी हैं, जो स्त्रियों के मोबाइल और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से जुड़ी हैं. यानी एक ओर बाजार का विज्ञापन है, दूसरी ओर फतवे हैं.

बाजार स्त्रियों के श्रम के मूल्य और उसकी गरिमा के लिए स्पेस नहीं देता है. वह उसे वस्तु रूप में मुनाफे के लिए इस्तेमाल करता है. पुरानी पुरुषवादी सोच का विकल्प बाजार की शक्ल में नया पुरुष वर्चस्व नहीं हो सकता है.

दुनियाभर में स्त्रियां हिंसा से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं. भारत में स्त्रियों का उत्पीड़न जाति आधारित भी है. कथित निचली जाति की स्त्रियों का शोषण दोहरा है. चार्ल्स फुरिये का कहना था कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियां किस हद तक आजाद हैं.

आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सामाजिक प्रतिनिधित्व से दूर उनकी मुक्ति का सवाल आज भी मौजूद है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की यह तारीख सिर्फ स्त्रियों के संघर्ष और अधिकारों की तारीख के रूप में सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव इतिहास के विकास को अधिक-से-अधिक न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक बनाने की तारीख है.