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आर्थिक प्राणवायु बनी नकदी-- मोहन गुरुस्वामी

देश के विभिन्न हिस्सों में एटीएम नकदी से रिक्त पड़े हैं और आम आदमी बेहाल है. तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश में हालात ज्यादा कठिन हैं, जिनकी सीमाएं बड़े दांववाले आसन्न चुनावों के राज्य कर्नाटक से लगी हैं.

इस किल्लत की सहज व्याख्या तो यही नजर आती है कि उपलब्ध नकदी कर्नाटक की जनता को सुशासन देने की स्पर्धा में लगे बड़े पक्षों के सुरसाकार मुखों का ग्रास बन गयी है.

नोटबंदी की विभीषिका से उबरने के बाद आयी एक लघु आर्थिक तेजी, विभिन्न राज्यों के चुनावों और उनके पश्चात आगामी देशव्यापी आमचुनाव के साथ ही अखाड़े में बेल्लारी बंधुओं जैसे माहिर खिलाड़ियों की वापसी का स्पष्ट निहितार्थ यही है कि कालाधन एक बार फिर अपनी धमाकेदार वापसी में सफल है.

सच तो यह है कि नकदी की सर्वसमर्थ सत्ता कभी समाप्त हुई ही नहीं, संपत्तियों के लेनदेन तथा सियासी और नौकरशाही भ्रष्टाचार जैसी नकदी आश्रित गतिविधियां केवल कुछ मंद पड़ गयी थीं. जायदाद के बाजारों में रौनक लौट रही है और नकदी की तूती फिर से बोल पड़ी है. दूसरी ओर, सियासी माहौल का परवान चढ़ता पारा भी यही बता रहा है कि हमारे हुक्मरानों के चयन में पुनः नकदी की ही मर्जी चलेगी.

देश की आर्थिक प्रणाली में प्रचलित नकदी अब नोटबंदी-पूर्व के प्रचलन स्तर के 99.17 प्रतिशत का स्पर्श कर चुकी है, जहां तक लौटने में इसे लगभग 15 महीने लग गये. 28 अक्तूबर, 2016 को प्रचलन में स्थित कुल नोटों का मूल्य 17.97 लाख करोड़ रुपये था. मार्च 2016 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ने कहा कि प्रचलन में स्थित कुल नोटों का मूल्य 16.42 लाख करोड़ रुपये है, जिनमें लगभग 86 प्रतिशत अर्थात तकरीबन 14.18 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट 500 रुपये तथा 1,000 रुपये के हैं.

रिजर्व बैंक के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 23 फरवरी, 2018 को कुल 17.82 लाख करोड़ रुपये मूल्य की नकदी प्रचलित थी, जबकि नोटबंदी के दौरान प्रचलन से बाहर कर दिये गये नोट बैंकों में जमा करने की अंतिम तिथि 30 दिसंबर, 2016 को कुल केवल 8.93 लाख करोड़ रुपये मूल्य की नकदी ही प्रचलन में रह गयी थी.

नोटबंदी को भ्रष्टाचार, काले धन और आतंकवाद पर लगाम के घोषित इरादे से लाया गया था. अब उपर्युक्त तीनों के साथ नकदी भी अपनी पूर्व पीठिका पर विराजमान हो चुकी है. यही वजह है कि उसकी मांग में लगातार वृद्धि होती जा रही है.

संपत्तियों तथा स्वर्णाभूषणों की खरीद हेतु नकदी, नौकरशाहों की भेंट करने को नकदी, चुनावी युद्धों में झोंकने के लिए नकदी, अपने अनोखे सूटों एवं चापर्ड के मंहगे काले चश्मों की खरीद सहित हवाला से विदेश भेजने के लिए नकदी. संक्षेप में सब कुछ यथास्थिति में लौट चुका है और लोग बैंकों में जमा रखी नकदी को इस्तेमाल में लाने की ओर उन्मुख हैं.

पिछले कुछ सप्ताहों से लोग मुझसे यह पूछने लगे हैं कि क्या बैंक अनिल अंबानी और वेणुगोपाल धूत जैसों के डूबते ऋणों, नीरव मोदी तथा मेहुल चौकसे जैसों की धोखाधड़ियों और आईसीआईसीआई की चंदा कोचर जैसों द्वारा की गयी भीतरखाने की कारगुजारियों से जीवित बच सकेंगे?

बैंकों का प्रत्येक जमाकर्ता यह महसूस करता है कि बैंकों से निकलते, मगर उस तक वापस न पहुंचते पैसे उसकी जमापूंजी से ही जाते हैं और इस चिंता ने उसकी नींद उड़ा दी है.

पिछले एक दिन मैं कुछ लंबित पड़े काम निबटाने अपने बैंक गया. मेरे ड्राइवर ने बताया कि उसे भी बैंक से पैसे निकालने हैं. मैंने यों ही पूछ लिया कि तुम्हें कितने रुपये निकालने हैं.

उसके उत्तर ने तब मुझे चौंका दिया, जब उसने कहा कि ‘सब कुछ.' ‘मगर क्यों,' मेरा अगला सवाल था. ‘क्योंकि मेरे पड़ोसी बता रहे थे कि एक बार फिर नकदी का संकट निकट है.' उसे समझाने की मेरी कोशिशें निष्फल गयीं और उसने अपना खाता खाली कर ही लिया.
जिनके पास पैसे आसानी से पहुंच जाते हैं, वे जोखिमों के प्रति कम संवेदनशील हुआ करते हैं. उनके पैसे बैंकों में इसलिए भी पड़े रहते हैं कि वे उसे और रख भी कहां सकते हैं?

पर एक सामान्य जन के पैसे बड़ी कठिनाइयों से कमाये गये होते हैं और उसकी सुरक्षा में वह जरा भी जोखिम नहीं लेना चाहता. गलत तरीकों द्वारा बैंकों से निकाले गये रुपयों के लिए उसे सीधे-सीधे यह महसूस होता है कि इसकी भरपाई उसके जमा पैसों से की जायेगी. यह विश्वास का संकट है और अब यह साफ दिखने लगा है.

स्थितियों के पूर्वानुमान और उनसे निबटने की तैयारी में वित्त मंत्रालय की विफलता एक बार फिर उजागर हुई है. एटीएम की संरचना ऐसी होती है कि वे अपेक्षाकृत नये नोटों के साथ ही त्रुटिहीन ढंग से काम कर सकते हैं, मगर मंत्रालय के सीधे प्रशासनिक नियंत्रण में संचालित नोट छापने के हमारे प्रेस पुराने और निम्न उत्पादकता के शिकार बने पड़े हैं, जबकि नकदी की बढ़ती मांग की त्वरित आपूर्ति के लिए अरसे से उनके आधुनिकीकरण की जरूरत है.
(अनुवाद: विजय नंदन)