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आशंकाओं के निराधार तर्क-- नंदन नीलेकणि

यह संभव नहीं कि चित और पट, दोनों आपकी ही हो। अर्थशास्त्री इसे ‘समझौता' कहते हैं। आप हर वक्त दो विरोधी मतों के बीच संतुलन बिठाते हैं। मसलन, 18वीं सदी के अंत तक या तो आप चार पहियों वाली घोड़ागाड़ी की सवारी कर सकते थे, जो धीरे-धीरे, लेकिन आपको एक सुविधाजनक यात्रा कराती, या फिर घोड़े की पीठ की सवारी करते थे, जिसमें आप मंजिल तक तेज तो पहुंच जाते, पर वह सफर अकेले (और परेशानी में) कटता। 1912 तक यह तस्वीर बनी रही। शुक्रिया अदा कीजिए हेनरी फोर्ड का कि अब हम तेज गति से भी यात्रा कर सकते हैं और सुकूनदेह भी। यही वजह है कि समाज ने नई तकनीक को हमेशा हाथों-हाथ अपनाया है, क्योंकि वे समझौते की स्थिति को बदल देती हैं।


आधार का इस्तेमाल जैसे-जैसे बढ़ा है, कुछ लोग विभिन्न सेवाओं से इसे ‘जोड़ने' को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते रहे हैं। उनका डर यह था कि आधार जैसे यूनीक पहचान को अलग-अलग डाटाबेस से जोड़ने से उपयोगकर्ता की निगरानी और उसके बारे में तमाम जानकारियां सार्वजनिक हो सकती हैं। जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 1984 की तस्वीर और ‘पेनॉप्टिकॉन' (1791 में जेरेमी बेन्थम द्वारा प्रस्तावित एक गोलाकार जेल, जिसके केंद्र में सिपाही का कक्ष हो और उसके चारों तरफ कैदियों का। यानी सब कुछ पारदर्शी हो) की कहानी याद दिलाई जाती रही। मगर ये सभी चिंताएं निराधार हैं, और दुष्प्रचार भी।


पल-भर के लिए एक अन्य पहचान, मोबाइल नंबर का उदाहरण लेते हैं। एक शहरी मोबाइल धारक, जिसके पास एयरटेल का नंबर है, आमतौर पर अपने मोबाइल नंबर को कैब की बुकिंग के लिए ओला से, खाने का ऑर्डर देने के लिए जोमैटो से और मैसेज के लिए वाट्सएप से ‘लिंक' करता है। मगर क्या इससे एयरटेल को यह पता होता है कि वह शख्स कहां जा रहा है, क्या खा रहा है या किससे चैट कर रहा है? नहीं। ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘लिंक करना' यानी जोड़ना एकतरफा प्रक्रिया है। आधार के साथ भी ठीक ऐसा ही होता है। आधार जारी करने वाला भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआर्ई) यह कतई नहीं जानता कि आपने अपने आधार को कहां लिंक किया है और क्यों?


फिर भी, मान लें कि किसी विरल मामले में यदि ओला, जोमैटो और वाट्सएप आपस में सांठ-गांठ कर लेते हैं और आपका डाटा साझा कर लेते हैं, तो वे डाटा को ‘लिंक' आपके मोबाइल नंबर से ही कर सकेंगे। बेशक आज ऐसी तकनीक उपलब्ध है कि आप कैब को बुलाने, खाने का ऑर्डर देने और संदेश भेजने के लिए कई तरह के सिम कार्ड और मोबाइल फोन ले सकते हैं, पर यह अव्यावहारिक ही होगा। सवाल है कि इस ‘समझौते' से कैसे पार पाया जाए? इसका जवाब ‘टोकनाइजेशन' तकनीक है। यह दरअसल, संवेदनशील सूचनाओं को यूनीक पहचान-संकेतों में बदलने की प्रक्रिया है, जिसमें सुरक्षा से कोई समझौता किए बिना तमाम जानकारियां सहेज ली जाती हैं। हमारे लिए टोकनाइजेशन का अर्थ है, जोमैटा, ओला और वाट्सएप के लिए स्वत: अलग-अलग मोबाइल नंबर होना। इसके अलावा, यदि आप चाहें, तो खुद का एक आभासी मोबाइल नंबर भी तैयार कर सकते हैं।


यूआईडीएआर्ई ने 2010 में आधार के शुरुआती दिनों में ही टोकनाइजेशन की बात कही थी, पर तब इसे ऐसा विचार माना गया, जिसने समय-पूर्व जन्म ले लिया था। मगर अब इसका वक्त आ गया है। टोकनाइजेशन की घोषणा कर दी गई है, जिससे आधार की निजता और सुरक्षा बढ़ गई है।


पहला काम सीमित ई-केवाईसी का किया गया है। इस कारण अब आपके आधार नंबर से जुड़ी सूचना तब तक सार्वजनिक नहीं हो सकती, जब तक कि कानूनन ऐसा करना जरूरी न हो। दूसरी व्यवस्था आधार इस्तेमाल करने वाली हर संस्था को अनिवार्य रूप से एक टोकन यानी आईडी नंबर देने की बनाई गई है। यह आईडी दुनिया में किसी दूसरी संस्था या शख्स के पास नहीं होगी। इससे आपके आधार नंबर का खुलासा तो नहीं ही होगा, सस्थाएं भी सांठ-गांठ से आपके रिकॉर्ड को ‘जोड़' नहीं सकेंगी। इसके लिए आधार नंबर रखने वाले शख्स को अपने तईं कुछ नहीं करना होगा। सब कुछ स्वत: कर दिया गया है।


बावजूद इसके यदि आप यूआईडीएआई की इस टोकनाइजेशन प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं होते, तो तीसरी व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके तहत वैकल्पिक रूप से 16 अंकों की अपनी आभासी आईडी बनाई जा सकती है। यह एक तरह का आपका छद्म आधार नंबर होगा और आधार नंबर के विकल्प के रूप में हर जगह इस्तेमाल किया जा सकेगा। वर्चुअल आईडी पाने या इसे बदलने के लिए आपको लैपटॉप या कंप्यूटर की जरूरत नहीं होगी।


समावेशन के ये फीचर कुछ हद तक आधार में शुरू से रहे हैं। यहां तक कि जिनके पास घर नहीं है, वे भी बिना किसी मान्य पते के आधार पा सकते हैं। बस, इसके लिए उन्हें किसी का परिचय देना होगा। इसी तरह, आधार प्रमाणित करने के तरीकों में चेहरे की पहचान को भी एक विकल्प के रूप में शामिल करने की घोषणा की गई है, जो समावेशन की दिशा में बढ़ाया गया एक और कदम है।


अच्छी बात है कि बहस-मुबाहसों में उपयोगकर्ताओं की निजता को लेकर चर्चाएं की जाती हैं, पर दुखद है कि उनसे पूरी तस्वीर साफ नहीं की जाती। आधार को बहस के केंद्र में रखकर दरअसल अन्य तमाम अहम मसलों से ध्यान हटाया गया है, जबकि वे भी भारतीयों की निजता के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। मसलन, इस लेख की शुरुआत में मोबाइल नंबर को जिन सेवाओं से लिंक करने की बात मैंने कही, उससे भी आपकी निजता का मसला उसी तरह जुड़ा है, जिस तरह टोकनाइजेशन से पहले आधार से जुड़ा था। हाल में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई के एक एजेंट के हवाले से बताया गया है कि सामाजिक सुरक्षा वाले नंबर से कहीं अधिक खतरनाक मोबाइल नंबर होते हैं, क्योंकि इससे दस गुना अधिक डाटाबेस जुड़ा होता है।


आधार की संरचना लोचदार है और उसमें इनोवेशन की संभावना कायम है। यूआईडीएआई जनता की चिंताओं को समझता है, जिसके लिए हमें उसकी सराहना करनी चाहिए। यह समझने की जरूरत है कि त्वरित प्रमाणीकरण की सुविधा के साथ 1.3 अरब भारतीयों को एक यूनीक व सुरक्षित पहचान देना ऐसी कोशिश है, जो लगातार मजबूत बन रही है। नौ वर्षों में आधार को लेकर जो कुछ हुआ है, वह किसी क्रांति से कम है क्या? (ये लेखक के अपने विचार हैं)