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इस साल कम वृद्धि का आधार ही आर्थिक सूखे की समाप्ति को सुनिश्चित करेगा

भारतीय रिज़र्व बैंक, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विभिन्न रेटिंग एजेंसियां, निवेश बैंक और कई अन्य संस्थान आर्थिक वृद्धि के अपने पूर्वानुमानों में दनादन संशोधन कर रहे हैं. इनमें से लगभग सभी को इस वित्तीय वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर छह प्रतिशत या इससे दशमलव एक या दो प्रतिशत कम-ज़्यादा रहने का भरोसा है. अधिकांश प्रेक्षक इस दर को निराशाजनक मानते हैं क्योंकि अभी कुछ ही दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण में, रिज़र्व बैंक की रिपोर्टों में और अन्य जगहों पर घोषित पूर्वानुमानों में जीडीपी वृद्धि दर सात प्रतिशत के आसपास रहने की भविष्यवाणी की गई थी. निश्चय ही छह प्रतिशत पिछले साल के 6.8 प्रतिशत, -जो कि अपेक्षित से कम था- के मुकाबले काफी कम है. हम 2012-13 के बाद सबसे धीमे आर्थिक विकास के दौर से गुजर रहे हैं.


वैसे, इस साल के लिए विकास दर के मामूली छह प्रतिशत रहने की भविष्यवाणी को भी आशावाद ही माना जाएगा, क्योंकि पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर महज पांच प्रतिशत रही थी और दूसरी तिमाही में भी आशाजनक ख़बरें कम ही आई हैं. जबकि पूरे साल के लिए छह प्रतिशत की दर होने के वास्ते अक्टूबर-मार्च अवधि में विकास दर सात प्रतिशत होनी चाहिए. इस संख्या पर भला कौन दांव लगाएगा, जब वास्तविक आंकड़ों के अनुसार निर्यात और आयात लगातार कम हो रहे हैं, कारों की बिक्री में गिरावट जारी है और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक ने एक बार फिर उत्पादन में कमी दर्ज की है. साथ ही, कर राजस्व का स्तर (खास कर वस्तु और सेवा कर से) बजट अनुमानों के मुकाबले कम चल रहा है, टैक्स ब्रेक को छोड़ दें तो कॉरपोरेट जगत से निराशाजनक परिणाम ही आ रहे हैं, ऋण की उपलब्धता कम है, ईंधन की खपत के रुझानों से विकास की गति टूटने के संकेत मिलते हैं, रिहाइशी ज़मीन-जायदाद की बिक्री में भारी गिरावट का दौर जारी है, पूंजीगत वस्तुओं के ऑर्डर नहीं के बराबर आ रहे हैं और रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों की बिक्री धीमी पड़ी है.

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