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इस स्वायत्तता से क्या होगा -- रोहित कौशिक

हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जेएनयू, बीएचयू, एएमयू समेत देश के बासठ उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता देने का निर्णय लिया है। इस निर्णय के अनुसार पांच केंद्रीय विश्वविद्यालयों, इक्कीस राज्य विश्वविद्यालयों, चौबीस डीम्ड विश्वविद्यालयों तथा दो निजी विश्वविद्यालयों को अपने फैसले लेने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। सरकार का दावा है कि इन संस्थानों की शैक्षिक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है। सरकार की मंशा और दावा अपनी जगह ठीक हो सकते हैं लेकिन इन संस्थानों को स्वायत्तता देने के बाद जो नए तरीके की चुनौतियां पेश होंगी, क्या सरकार ने उन पर भी विचार किया है? सरकार के इस निर्णय से ये सभी शिक्षण संस्थान अपने हिसाब से पाठ्यक्रम तैयार कर सकेंगे, नए विभाग बना सकेंगे, अपने नए परिसर खोल सकेंगे तथा अपनी फीस खुद तय कर सकेंगे। सरकार का मानना है कि वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के इस माहौल में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा आमूल और क्रांतिकारी परिवर्तन लाए बिना गुणवत्तापरक शिक्षा प्रदान नहीं की जा सकती। सरकार के इस फैसले का विभिन्न स्तरों पर विरोध हो रहा है। अनेक बुद्धिजीवियों का मानना है कि सरकार के इस कदम से शिक्षण संस्थाओं के व्यवसायीकरण की आशंका बढ़ जाएगी। आज जेएनयू जैसे स्तरीय शिक्षण संस्थानों में आम भारतीय बच्चों का हित संरक्षित है। क्या सरकार की इस पहल के बाद इन संस्थानों का पारंपरिक ढांचा सुरक्षित रह पाएगा?


दरअसल, वर्तमान शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को यह आश्वासन ही नहीं दे पा रही है कि शिक्षा पर लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी उन्हें सुरक्षित रोजगार मिल पाएगा या नहीं। आज शिक्षा तंत्र में अनेक विसंगतियां आ गई हैं। एक ओर शिक्षा के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की लालसा शिक्षा को व्यापार का रूप दे रही है तो दूसरी ओर शिक्षा जगत से जुड़े माफियाओं ने शिक्षा को एक मजाक बना कर रख दिया है। आज युवाओं में एक बौखलाहट जन्म ले रही है। मानसिक तनाव के चलते विद्यार्थियों में आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। अंग्रेजों ने भारत में जिस शिक्षा प्रणाली की शुरुआत की थी उसके पीछे उनकी अपनी विभिन्न आवश्यकताएं थीं। आजादी के बाद कुछ हद तक इस शिक्षा नीति की खीमियों को दूर करने के प्रयास किए गए लेकिन ये प्रयास पर्याप्त सिद्ध नहीं हुए। एक बार फिर शिक्षा नीति में परिवर्तन की कोशिशें हो रही हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारे नीति-निर्माता शिक्षा नीति में परिवर्तन करने की हड़बड़ाहट में कुछ ऐसे निर्णय ले रहे हैं जो शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को ठेस पहुंचा रहे हैं। उच्च शिक्षा की मौजूदा हालत किसी से छिपी नहीं है। आज भी देश के अधिकतर विश्वविद्यालय पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। विश्वविद्यालयों में न तो काम करने का तरीका बदला है और न ही वहां काम करने वाले लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव आया है। कहने को शिक्षा नीति में काफी बदलाव हुए हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हम अब भी लीक पीट रहे हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जिस तरह की गंदी राजनीति पसरी हुई है उसका सीधा असर शिक्षा पर पड़ रहा है। जहां एक ओर शिक्षकों के विभिन्न गुट छात्रों से मिलकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में रहते हैं वहीं दूसरी ओर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विभिन्न विभागों के बीच आपसी खींचतान शिक्षा मंदिरों का माहौल खराब कर रही है।


इस दौर में शिक्षकों को अच्छा-खासा वेतनमान मिल रहा है, इसके बावजूद वे नैतिकता को ताक पर रख कर किसी भी तरह अधिक से अधिक पैसा कमाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। लालच के इस माहौल में एक शिक्षक के लिए अपना हित सर्वोपरि हो गया है जबकि छात्र-हित की सोच कम होती जा रही है। शायद यही कारण है कि आज गुरु के रूप में अध्यापक की प्रतिष्ठा कम होती जा रही है। कुछ अपवादों को छोड़ कर, आज शोध के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह शोध की गरिमा और सार्थकता के कतई अनुरू नहीं है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में उपकरण तो हैं लेकिन इनमें से अधिकांश उपकरण सुचारुरूप से कार्य नहीं करते हैं। जिन प्रयोगशालाओं में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के प्रयोग भी ठीक ढंग से नहीं हो सकते, उन प्रयोगशालाओं में पीएचडी के शोध हो रहे हैं । ऐसी स्थिति में शोध का क्या स्तर होगा यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। एक ओर उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है तो दूसरी ओर नए-नए क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं। लेकिन इस स्थिति के बावजूद युवाओं को नौकरी पाने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। युवाओं के पास डिग्रियां तो हैं लेकिन व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। दरअसल, रोजगार के विकल्पों का चुनाव कब और कैसे हो, यह भी एक समस्या है। सही विकल्प न चुन पाने के कारण अनेक विद्यार्थी अपनी प्रतिभा का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं। आज जब विद्यार्थियों को यह पता चलता है कि खास पाठ्यक्रम पढ़ने वाले युवाओं को अच्छी नौकरियां मिल रही हैं तो सभी उस ओर भागने लगते हैं। भले ही विद्यार्थियों की रुचि उस खास विषय या पाठयक्रम में न हो लेकिन उन्हें तो भेड़चाल में शामिल होना है, सो नतीजा ढाक के तीन पात ही रहता है। हम इस बात का आकलन नहीं कर पाते हैं कि इस खास पाठ्यक्रम को पढ़ कर कुछ वर्षों बाद जब विद्यार्थी बाहर निकलेंगे तो इसकी कितनी मांग रहेगी।


आज शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों को इस बात का आकलन करना होगा कि आने वाले वर्षों में किस तरह के शिक्षितों की आवश्यकता होगी तभी इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हर साल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अनेक फर्जी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की सूची जारी करता है लेकिन राजनीतिक संरक्षण के चलते इन संस्थानों का अस्तित्व बना रहता है और लाखों विद्यार्थी इन फर्जी संस्थानों के चक्कर में पड़ कर अपने भविष्य को खतरे में डाल देते हैं । शिक्षा समाज को रास्ता दिखाती है। यह शिक्षा ही है जो समझ और वैज्ञानिक सोच को विकसित कर समाज और राष्ट्र के विकास को गति प्रदान करती है। शिक्षा के द्वारा ही सुदृढ़ सामाजिक और आर्थिक विकास की कल्पना की जा सकती है। शिक्षा के द्वारा ही वैयक्तिक और साथ ही सामूहिक चेतना को उन्नत बनाया जा सकता है। शिक्षा ही वर्तमान चुनौतियों और भावी जरूरतों के अनुरूप नागरिक तैयार करने का माध्यम है। लेकिन व्यावसायिकता और आपाधापी के इस दौर में यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या शिक्षा उपरोक्तउद्देश्यों की पूर्ति कर पा रही है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा-व्यवस्था पर विचार करने के लिए अनेक समितियों का गठन हुआ। इन सभी समितियों ने मूल्य आधारित शैक्षिक प्रणाली विकसित करने पर बल दिया। लेकिन आजादी के बाद शिक्षा-व्यवस्था की स्थिति लगातार खराब होती चली गई। शिक्षा जगत में पनपी इन विसंगतियों को देखते हुए कुछ शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता देने की पहल कितनी कारगर सिद्ध होगी, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि अगर इस स्वायत्तता पर ठीक से निगरानी नहीं रखी गई तो ये शिक्षण संस्थान हमारे सामने नई तरह की चुनौतियां पेश करेंगे।