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उदारीकरण के बाद बनीं आर्थिक नीतियों से ग़रीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती गई- सचिन कुमार जैन

विकास की पूरी बहस आर्थिक विकास के इर्द-गिर्द सीमित हो गई है. आख़िर इस आर्थिक विकास ने हमें एक ऐसी चमक दी है, जो हमारी आंखों में पड़ती है और फिर हमें असमानता दिखाई देना बंद हो जाती है.

वर्तमान विकास मिथ्या सकारात्मकता का सबसे ज़्यादा निर्माण करती है. वर्ष 2018 की फोर्ब्स की रिपोर्ट (जो केवल दुनिया के अमीरों के काम, जीवन शैली और कमाई पर अध्ययन-प्रकाशन करती है) के मुताबिक भारत के 100 अरबपतियों (जिनकी संपदा रुपये में नहीं डॉलर में मापी जाती है) की कुल संपदा 32,964 अरब रुपये (492 अरब डॉलर) थी.

वर्ष 2017 के अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक भारत की औसतन प्रति व्यक्ति आय 1,12,764 रुपये प्रति वर्ष थी. इस हिसाब से सबसे ज़्यादा संपदा संपन्न 100 लोगों की कुल संपदा का मतलब है 29.23 करोड़ लोगों की एक साल की कमाई.

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में कुल परिवारों की संख्या की 24.5 करोड़ थी. इसका मतलब है कि 100 अरबपति देश की पूरी जनसंख्या की एक साल की कमाई से भी ज़्यादा संपदा पर क़ब्ज़ा रखते हैं.

फोर्ब्स की रिपोर्ट बताती है कि जिस साल (वर्ष 2017-18) में रुपये की कीमत गिर रही थी, बेरोज़गारी बढ़ रही थी. किसान आत्महत्या कर रहा था, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के आगाज़ ने अर्थव्यवस्था को झटका दिया था; उस साल भारत के 2.5 लाख सबसे अमीर परिवारों ने 2200 करोड़ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कमाई की.

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