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उपेक्षा की मार झेल रहा एक जिला-- योगेन्द्र यादव

पिछले सप्ताह से यह सवाल मेरे मन में बार-बार घूम रहा है. पिछले सप्ताह नीति आयोग ने देश के सबसे पिछड़े 101 जिलों की सूची जारी की. इस सूची में सबसे ऊपर यानी देश का सबसे पिछड़ा जिला होने का श्रेय हरियाणा के मेवात जिले को जाता है (आजकल इसका सरकारी नाम जिला मुख्यालय के नाम पर नुहू कर दिया गया है). बिहार के अररिया, छत्तीसगढ़ के सुकमा, उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती और तेलंगाना के असिफाबद जिलों से भी पिछड़ा जिला है मेवात. गौरतलब है कि हरियाणा का कोई और जिला इस 101 की सूची में कहीं नहीं है.

दिल्ली की नाक के नीचे खड़ा मेवात, गुड़गांव की हाईटेक सिटी से सटा हुआ मेवात, दिल्ली एनसीआर की चकाचौंध के बीच बुझा हुआ मेवात. हरियाणा का 2005 में बना एक नया जिला. आबादी सिर्फ 11 लाख थी.

नाम के वास्ते कुछ छोटे-छोटे शहर हैं, जैसे नुहू, फिरोजपुर झिरका, पुनहाना आदि, लेकिन 88 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है. मेवात नाम इसे मेव समुदाय से जोड़ता है, जो राजस्थान में भी बसा है. कुछ दलित और शहरी हिंदू भी हैं, लेकिन 80 प्रतिशत आबादी मेव मुस्लिम समाज की है.

मेवात के पिछड़ेपन का अनुमान लगाने के लिए आपको आंकड़े देखने की जरूरत नहीं है. बस गाड़ी में गुड़गांव जिले को पार करते ही सड़क के हालात से आपको पता लग जाता है कि आप मेवात में आ गये हैं. आंखें इधर-उधर घुमाइए, चारों तरफ बदहाली, नंग-धड़ंग घूमते हुए कमजोर बच्चे, चारों ओर बेरोजगार नौजवानों का झुंड. नुहू शहर में खड़े होकर आप कह नहीं सकते कि यह हरियाणा के किसी जिले का मुख्यालय है.
आज से 12 साल पहले सच्चर समिति ने पाया था कि देश का सबसे पिछड़ा मुस्लिम समुदाय बिहार या उत्तर प्रदेश में नहीं, बल्कि हरियाणा के मेवात में है.

फिर भी नीति आयोग द्वारा पूरे देशभर के जिलों की समीक्षा के बाद जारी की गयी इस रिपोर्ट को पढ़कर अनुभव की पुष्टि हुई. अपनी इस सूची में नीति आयोग ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के तमाम आंकड़ों को शामिल किया है. इस दृष्टि से मेवात को 26 प्रतिशत अंक मिले हैं. यानी अगर देश के सबसे विकसित जिलों से मेवात की तुलना की जाए, तो वह विकास की तराजू में उनसे एक चौथाई ही है.

शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों में मेवात की अवस्था दयनीय है. आज भी इस जिले में कुल साक्षरता सिर्फ 56 प्रतिशत है और महिलाओं में तो महज 36 प्रतिशत ही. जिले के लगभग 70 प्रतिशत बच्चे एनीमिया का शिकार है.

सिर्फ 27 प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण हुआ है. यहां का किसान मुश्किल से एक फसल ले पाता है, उसका भी दाम सही नहीं मिलता. मवेशी पालन यहां ग्रामीण जीवन का आधार है. हरियाणा के किसी भी जिले की तुलना में यहां गोपालन ज्यादा होता है, लेकिन अब वह भी ठप होने के कगार पर है.

इसकी वजह क्या है? मेवात पिछड़ गया या पछाड़ दिया गया? सरकारी मुहावरे के हिसाब से मेवात खुद पिछड़ गया. न जाने कैसे बाकी सब जिले विकास की सड़क पर चल निकले, मगर मेवात जहां का तहां खड़ा रह गया.

अगर आप हरियाणा में अफसरों और नेताओं से पूछें, तो मेवात के पिछड़ेपन के लिए खुद मेव समाज को दोष देनेवाले बहुत मिल जायेंगे. मेव समाज के खिलाफ आस-पड़ोस में खूब पूर्वाग्रह मिल जायेंगे. दिल्ली में अगर किसी और इलाके के लोग चोरी या गुंडागर्दी करें, तो उसे कुछ व्यक्तियों या एक गिरोह का काम बताया जायेगा.

पर अगर यही काम मेवात के लड़के करें, तो मीडिया इसे मेवाती गैंग की करतूत बताकर बदनाम करेगा. परंतु, अगर ध्यान से देखें, तो मेव समाज मेवात के पिछड़ेपन का शिकार है, गुनहगार नहीं. दुनियाभर में जो भी समुदाय पिछड़ेपन के दंश सहता है, वह साथ में इस तोहमत को भी झेलता है.

सच यह है कि मेवात का पिछड़ापन संयोग नहीं है. यह नियोजित पिछड़ापन है. इस पिछड़ेपन की बुनियाद में ऐतिहासिक घटनाएं हैं, सामाजिक पूर्वाग्रह हैं और राजनीतिक बेरुखी है. मेवाती समाज शायद देश का एकमात्र समुदाय है, जिसने पहले मुगल आक्रमणकारियों से लोहा लिया और फिर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. मुगल राजाओं और ब्रिटिश साम्राज्य ने इसकी सजा मेवात को दी. आजाद भारत में उस ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने का अवसर आया था.

विभाजन के समय जब दंगों और हिंसा के कारण मेव भारत छोड़कर पाकिस्तान की ओर जा रहे थे, उस समय स्वयं महात्मा गांधी ने मेवात आकर मेव समाज से अनुरोध किया था कि वह भारत ही में रहे. लेकिन, आजादी के बाद ना तो वह ऐतिहासिक अन्याय याद रहा, न ही गांधीजी का वायदा. हर सरकार ने मेवात के साथ सौतेला बरताव किया.

अगर आज मेवात शिक्षा और स्वास्थ्य में पिछड़ा हुआ है, तो उसकी वजह पिछले 70 साल की सरकारी बेरुखी है. आज भी इस जिले में पूरे हरियाणा की तुलना में स्कूलों और अध्यापकों की संख्या बहुत कम है, अस्पतालों और डॉक्टरों की संख्या बेहद कम है.

आज भी मेवात में ट्रांसफर होने को काला पानी समझा जाता है. आज भी इस इलाके में न तो कोई विवि है, न ही यहां के लोगों ने ट्रेन का मुंह देखा है. सूखा इलाका होने के बावजूद सिंचाई की व्यवस्था नगण्य है. जो मुख्य नहर गुजरती है, वह दिल्ली से गंदगी और केमिकल लेकर आती है.

मेवात के लोगों को लगता है कि इस सौतेले बरताव की जड़ में उनका अल्पसंख्यक होना है. मेव समाज की त्रासदी यह है कि देश के अधिकांश मुसलमानों ने उन्हें पूरा मुसलमान नहीं माना और हिंदू समाज में उन्हें हिंदुस्तानी के रूप में स्वीकार नहीं किया. मेवात इस दोहरी उपेक्षा की मार झेल रहा है. आज भी हरियाणा के अफसरों-नेताओं में मेव समाज के प्रति तिरस्कार और पूर्वाग्रह देखा जा सकता है.

दुर्भाग्यवश खुद मेव समाज का नेतृत्व भी समाज के दुख-दर्द से कटा रहा है. चंद ठेकेदारों के हाथ में मेवात का राजनीतिक नेतृत्व रहा, जिन्होंने मेवात के लिए कुछ नहीं किया. अब एक नयी पीढ़ी का नेतृत्व उभर रहा है. यह नयी पीढ़ी सड़क और कागज दोनों की लड़ाई करना जानती है. यह पीढ़ी समाज के पुराने ठेकेदारों को चुनौती दे रही है.

पिछले 16 साल में न जाने कितनी बार इस इलाके की बदहाली पर बोल चुका हूं. युवा साथियों के साथ बैठकर न जाने कितनी योजनाएं बनायी है. न जाने कितनी बार सोचा है कि आंख बंद होने से पहले इसके लिए कुछ करना है. नीति आयोग के प्रयास में तो पता नहीं कितना भरोसा है, लेकिन मेवात की नयी पीढ़ी से मुझे बड़ी आस है.