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उम्मीदें बजट 2020: कस्बों के अस्पताल दुरुस्त हो जाएं तो बड़े अस्पतालों पर कम पड़े बोझ

लखनऊ। सरकारी अस्पतालों में लगने वाली लंबी-लंबी लाइनें, प्राइवेट अस्पतालों के बढ़ते खर्चे के बीच सभी की निगाहें देश के अगले बजट पर हैं। क्या प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की हालत सुधारने के लिए बजट में खास व्यवस्था होगी? देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं पर जारी होने वाली रिपोर्ट 'नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2018' के अनुसार देश में 37,725 सरकारी अस्पतालों में 7,39,024 बेड हैं। करीब 10 हजार लोगों पर सिर्फ एक एलोपैथि‍क डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार प्रति 1000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की जर्जर हालत, और मरीजों और डाक्टरों के अधिक अनुपात के बावजूद भारत अपनी कुल जीडीपी का मात्र 1.4 फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है। जबकि वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का मानक जीडीपी का 6 फीसदी माना गया है। "देश में डॉक्टरों की बहुत कमी है, जिसका खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ रहा है। सरकार भी डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने की जगह बड़े-बड़े अस्पताल खोल रही है। जब नर्सिंग स्टाफ और डॉक्टर नहीं रहेंगे तब तक मरीज का इलाज कौन करेगा? सरकार को प्राथमिक स्वास्थ्य पर बहुत जोर देने की जरूरत है। जब तक बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत नहीं होंगी तक तब कुछ ठीक नहीं होने वाला है," संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ में नेफ्रोलॉजी विभाग में डॉ. नारायण प्रसाद कहते हैं।

केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2017 में लागू की गई नई 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति' के तहत 2025 तक औसत आयु को 67.5 वर्ष से बढाकर 70 वर्ष करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने का लक्ष्य रखा गया। वर्ष 2018-19 के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के लिए आवंटन 62,398 करोड़ रुपए था, जो 2017-18 के संशोधित अनुमान 51,550.85 रुपए से 2.5 प्रतिशत ही ज्यादा है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली 'पैदल फौज' की समस्याएं भी दूर करने के लिए बजट में विशेष प्रावधान करने होंगे। जब तक स्वास्थ्य क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम करने वालों को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक अच्छे परिणाम नहीं मिलेंगे। "दरअसल, देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य का जो संदेश है, वह ज्यादातर लोगों के पास पहुंच ही नहीं पाता। जब तक फ्रंट लाइन वर्कर आशा, एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को सक्रिया नहीं किया जाएगा, तब तक सरकार की किसी भी स्वास्थ्य योजना का लाभ ग्रामीण तबके को नहीं मिल सकता। इसके लिए सरकार को चाहिए कि इनके वेतन में बढोतरी करें, क्योंकि इन्हें बहुत कम वेतन मिलता है और काम बहुत लिया जाता है," स्वास्थ्य मुददे पर काम करने वालीं वरिष्ठ पत्रकार पत्रलेखा चटर्जी कहती हैं। आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए आयुष्मान भारत जैसी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की ओर ध्यान कम ही गया। भारत में जन स्वास्थ्य की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है, इसके बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे कम खर्च करने वाले देशों में भारत का भी नाम है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च के मामले भारत अपने पड़ोसियों से भी पीछे है। इस मामले में हम मालदीव (9.4 फीसदी, भूटान (2.5 फीसदी), श्रीलंका (1.6 फीसदी) से भी पीछे हैं।

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