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एक दिल्ली और दो 'जन्तर-मन्तर'- अलका आर्य

हाल ही में मैं दिल्ली की तपती गर्मी को पीठ दिखाते हुए संसद से कुछ ही फासले पर स्थित जंतर-मंतर गई तो मन में पहला सवाल यही उठा कि क्या यह वही स्थान है, जहां 16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया गैंगरेप कांड के बाद भारी संख्या में लोगों ने लगातार कई दिनों तक सरकार व व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया था?

सवाल की वजह : उसी जंतर-मंतर पर खूंटे गए एक तंबू में बलात्कार की शिकार चार दलित किशोरियां बीते कई दिनों से अपने गांव भागाणा के 80-90 लोगों के साथ धरने पर बैठी हुई हैं। ताकतवर जाति के लोगों द्वारा निचली जाति की लड़कियों/महिलाओं पर ढहाए जाने वाले बर्बर जुल्म व दबंगई की भुक्तभोगी इन बहादुर किशोरियों के साथ कैंडल मार्च में कुल जमा दो सौ लोग दिखाई दिए।

महिला सुरक्षा के मुद्दे पर तकरीबन डेढ़ साल पहले आंदोलित होने वाले लोगों ने तब क्या आंदोलन को उच्च व निचली जाति की महिलाओं के खांचे में बांट दिया था? यह घटना उच्च व उच्च मध्यवर्ग के लोगों की कमजोर जातियों के प्रति पारंपरिक सोच और सामाजिक व्यवहार की एक बार फिर पुष्टि करती है। गौरतलब है कि 23 मार्च की शाम हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव की इन चार दलित किशाोरियों (जो रिश्ते में बहनें भी हैं) को कुछ दबंग जाति के युवक अगवा कर पंजाब के बठिंडा ले गए और उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।

किशोरियों के परिजनों ने अगले दिन गांव के सरपंच के समक्ष अपनी लड़कियों के गायब होने की गुहार लगाई। सरपंच को इस घटना की पहले से जानकारी थी और यह भी पता था कि लड़कियां पंजाब में हैं। परिजनों द्वारा पुलिस के पास जाने की धमकी देने पर सरपंच उन्हें लेकर बठिंडा पहुंचा, जहां पर ये लड़कियां मिलीं। रास्ते में सरपंच ने उन्हें धमकाया कि थाने में मत जाना, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा। मगर पीड़ित परिवार की ओर से रिपोर्ट दर्ज कराई गई, जिसके बाद पुलिस ने दस में से पांच आरोपियों को तो पकड़ लिया, पर बाकी आरोपी और इस साजिश में साथ देने वाला सरपंच व उसका एक और साथी खुले घूम रहे हैं।

धरने पर बैठे पीड़ित दलित परिवार बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी, फास्ट ट्रैक अदालत में मामले की सुनवाई और पीड़िताओं के लिए उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं। उनकी यह भी मांग है कि भगाणा गांव के सभी बहिष्‍कृत परिवारों के लिए गुड़गांव या फरीदाबाद में आवासीय प्लॉट और पीड़ित चारों किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई और उसके बाद रोजगार का बंदोबस्त किया जाए। भगाणा गांव में दो साल पहले कई दलित परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर उन्हें गांव छोड़ने को मजबूर कर दिया गया था। अब जो परिवार जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हैं, वे भी वहां लौटना नहीं चाहते, क्योंकि वे अपने घर की लड़कियों/महिलाओं की सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद हैं और उन्हें लौटने पर झूठे मामलों में फंसाए जाने की आशंका है।

एक अहम बात यह है कि चुनाव में भाजपा व कांग्रेस जैसे प्रमुख दलों ने महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तो बहुत लगाए, मगर ठोस कुछ भी हासिल नहीं हुआ। इन तकरीरों में महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को जिस सतही तरह से उछाला गया, उससे यही संदेश गया कि राजनेता सिर्फ इस पर राजनीति कर रहे हैं। होना तो यह चाहिए था कि कांग्रेस, भाजपा समेत अन्य दल महिला सुरक्षा का एक ब्लूप्रिंट तैयार करके उसे अपने-अपने घोषणा-पत्रों के साथ नत्थी करते और फिर उस पर सार्थक बहस होती।

हरियाणा में कांग्रेस के दस साल के शासनकाल में दलितों पर अत्याचार एक बड़ा मुद्दा है। पर चुनाव में यह मुद्दा कहीं पीछे छूट गया। इस सूबे की राजनीति की तासीर ही ऐसी है कि राजनेता दबंगई के खिलाफ बोलने का साहस नहीं दिखाते। हिसार से हरियाणा जनहित पार्टी के सांसद कुलदीप बिश्नोई ने अपने ही संसदीय क्षेत्र की इन चार पीड़ित दलित किशोरियों से मुलाकात करना तक मुनासिब नहीं समझा।

16 दिसंबर की घटना के बाद महिला सुरक्षा संबंधी कानून को यूपीए-2 सरकार ने चौतरफा दबाव के बाद अधिक कड़ा तो बना दिया, पर राजनीति करने वालों की मानसिकता में कोई उल्लेखनीय बदलाव दिखाई नहीं देता। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना में दलितों की सक्रिय भागीदारी का सवाल राजनीतिक भी है। जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे एक पुरुष ने राजनीतिक व्यवस्था व जातिगत ढांचे के प्रति जिन शब्दों में अपने गुस्से का इजहार किया, वह सरकार व समाज को आगाह करने वाला है। व्यवस्था की संवेदनहीनता से आहत उस पुरुष कहना था - 'ऐसा लगता है कि अब हमें हथियार उठा लेने चाहिए।"

जंतर-मंतर पर जब मैं इन चारों पीड़ित किशोरियों से रूबरू हुई तो उन्होंने अपना चेहरा दुपट्टे से ढंक रखा था और महज आंखें ही बिना ढंकी थीं। इनमें से तीन ने आठवीं जमात के बाद स्कूल जाना इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि दबंग जाति के लड़के उन पर अश्लील फब्तियां कसते थे। और चौथी लड़की की तो पांचवी की परीक्षा चल रही थी, जिस दिन उसके साथ यह हादसा हुआ। इनकी उम्र सुरक्षित माहौल में पढ़ने-खेलने की है। लिहाजा यह कल्पना कर मन सिहर जाता है कि कहीं ये भी व्यवस्था से निराश होकर अपने ढंके चेहरों के साथ हाथों में हथियार ना उठा लें!