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एनजीओ को विदेशी धन का हक- डा.भरत झुनझुनवाला

कुछ महीने पहले इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा दी गयी रपट के अनुसार, भारत के विकास में कुछ विदेशी धन से पोषित एनजीओ बाधा बन रहे हैं. एनजीओ द्वारा प्राप्त धन का दुरुपयोग रोकने के लिए सरकार ने हाल में आदेश दिया है कि इनके द्वारा 20,000 से अधिक का भुगतान चेक द्वारा ही किया जायेगा. ऐसा करने से एनजीओ के लिए धन का गैरकानूनी उपयोग करना कठिन हो जायेगा.

तमाम देशों में एनजीओ ने मानव-राहत के उल्लेखनीय कार्य किये हैं. रवांडा के नरसंहार के दौरान लगभग 200 एनजीओ द्वारा मौलिक जन सुविधाएं लोगों को मुहैया करायी गयी थीं. ये विदेशी धन से पोषित थे. अपने देश में विदेशी धन से शिक्षा एवं स्वास्थ मुहैया करानेवाली तमाम संस्थाएं चल रही हैं. दूसरी तरफ एनजीओ के आवरण के पीछे विदेशी धन का उपयोग देश की सुरक्षा में सेंध लगाने के लिए भी किया जा रहा है, जिसका लक्ष्य विशेष राजनीतिक पार्टी नहीं, पूरा देश होता है. ऐसी गतिविधियों के लिए विदेशी धन के प्रवेश को रोकना चाहिए. आज तमाम सरकारों के विरोध में विदेशी धन सक्रिय है. रूस में चुनावों पर नजर रखनेवाली संस्था गोलोस को विदेशी धन दिया जा रहा है.

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित एमनेस्टी इंटरनेशनल तमाम देशों में तानाशाहों का विरोध करनेवाले लोगों को मदद पहुंचाती रही है. कुछ वर्ष पहले अमेरिका के सियेटल शहर में डब्ल्यूटीओ के विरुद्ध तमाम संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लामबंद हो गये थे और उस सम्मेलन को रोकने में सफल हुए थे. 1971 के बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में भारत ने बांग्लादेश को मदद पहुंचायी थी. म्यांमार में अहिंसक क्रांति करनेवाली आंग सान सू की को विदेशी धन से पोषित बताया जाता है.

इन प्रकरणों पर पाठकों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं. यह इस बात पर निर्भर करता है कि मेजबान शासक को एक पाठक किस भूमिका में देखता है. बांग्लादेश के पाकिस्तानी शासकों को अच्छा मानें, तो भारत द्वारा मदद गलत ठहराया जायेगा. मेजबान देश को स्पष्ट रूप से अच्छा या बुरा ठहराना कठिन है. इस अनिश्चित स्थिति में हमें तय करना है कि विदेशी मदद को स्वीकृति दी जाये या नहीं? विदेशी धन का समर्थन करने पर लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर बनाने के लिए इसका उपयोग हो सकता है. विदेशी धन का विरोध करने पर तानाशाही सरकारों के अत्याचारों से परेशान जनता का हम स्वाहा होने देते हैं.

मेरी समझ से तानाशाही सरकारों का विरोध करना ज्यादा जरूरी है. वहीं लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि विदेशी धन से पोषित संस्थाओं की अवांछित गतिविधियों को जनता के सामने पेश करे. मसलन, इंटेलिजेंस ब्यूरो की रपट में कहा गया है कि वैश्विक संस्था ग्रीनपीस के द्वारा कोयला तथा परमाणु बिजली परियोजनाओं का निरंतर विरोध किया जा रहा है. यह संस्था वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण का कार्य करती है. इसके आधार पर सरकार ने ग्रीनपीस द्वारा विदेशी धन प्राप्त करने पर रोक लगा दी. ग्रीनपीस ने हाइकोर्ट में याचिका लगा कर सरकार के इस आदेश को चुनौती दी है, जिसकी सुनवाई चल रही है. ग्रीनपीस द्वारा उठाये जा रहे प्रश्नों का सरकार जनता को उत्तर दे. यदि ग्रीनपीस कहती है कि जंगल कटने से आदिवासियों का जीवन नष्ट हो रहा है, जैविक विविधता नष्ट हो रही है और धरती का तापमान बढ़ रहा है, तो सरकार इन बिंदुओं पर जनता को सही तथ्यों से अवगत कराये.

लोकतंत्र अंतत: जनता की समझ पर टिका है. कानूनी हथकंडों के स्थान पर जनता को समझा कर ग्रीनपीस को निष्प्रभावी बनाया जा सकता है. यदि विदेशी धन से पोषित संस्था जनता के विरुद्घ कार्य कर रही है, तो इसका निर्णय करने का अधिकार जनता को है, न कि सरकार को. संभव है कि सरकार बिजली कंपनी की गुलाम हो. संभव है कि केंद्रीय मंत्री के निजी स्वार्थ इन कंपनियों से जुड़े हों. ऐसे में ग्रीनपीस पर प्रतिबंध देश हित में नहीं, बल्कि मंत्री हित में लगाया गया माना जायेगा.

लोकतंत्र में गलत कार्य में लिप्त संस्थाओं का भंडाफोड़ करने की पर्याप्त गुंजाइश है. अत: जनता के सामने भ्रष्ट एनजीओ का भंडाफोड़ करना चाहिए. यदि संदेह के आधार पर प्रतिबंध लगायेंगे, तो दोहरा नुकसान होगा. हम सही काम करनेवाली विदेशी संस्थाओं को बंद कर देंगे, जैसे ग्रीनपीस यदि जंगल बचा रही है, तो हम जंगल कटने देंगे. दूसरे, विदेशी धन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार मेजबान सरकार को देकर हम तानाशाहों को निरीह जनता को रौंदने के लिए खुला मैदान उपलब्ध करा देंगे. पूंजी का ग्लोबलाइजेशन हो चुका है. इसलिए पूंजी के विरोधियों का भी ग्लोबलाइजेशन होने देना चाहिए. कोर्ट रूम में एक पक्ष को प्रवेश ही न करने दिया जाये, तो कानूनी कार्यवाही ढकोसला रह जाती है. ठीक इसी प्रकार विदेशी पूंजी को प्रवेश देने एवं विदेशी पूंजी के विरोधियों पर प्रतिबंध लगाने से लोकतंत्र ढकोसला रह जाता है.